योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ८८५
द्रष्टा किसका, और जो द्रष्टा ही नहीं तो दृश्य किसका ? इसलिए यह समझो कि निर्विकार ब्रह्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है । यद्यपि आकार भी दिखते हैं, तो भी वह निराकार है—आत्मसत्ता ही संवेदन से आकाररूप होकर भासित होती है । जैसे खम्भे में चितेरा पुतलियों की कल्पना करता है कि इतनी पुतलियाँ खम्भे में निकलेंगी तो उसको वे खोदे बिना ही प्रत्यक्ष दिखती हैं, वैसे ही खोदे बिना ही ब्रह्मरूपी खम्भे में मनरूपी चितेरा ये पुतलियाँ देखता है । अतएव हुआ कुछ नहीं । हे राम ! इन मेरे वचनों को तुम स्वप्न और संकल्प दृष्टान्त से देखो कि अनुभवरूप ही आकार होकर भासित होता है—अनुभव से भिन्न कुछ नहीं । इस मेरे वचनरूपी उपदेश को हृदय में धारण करो और अज्ञानियों के वचनों को त्याग दो ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विद्यावादबोधोपदेशो नाम द्विशताधिकद्विसप्ततितमसर्गः ॥ २७२ ॥
राम बोले, हे भगवन् ! बड़ा आश्चर्य है कि मैं अज्ञान से जगत् को देखता था । जगत् तो कुछ वस्तु नहीं, सब ब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है । यह जगत् भ्रम से भासित होता है । अब मैंने जाना कि यह जगत् वास्तव में न पहले था और न आगे होगा । सब शान्त निरालम्ब विज्ञानघनसत्ता है । और भ्रान्ति भी कुछ वस्तु नहीं, निर्विकार शान्तरूप ब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है जैसे स्वर्ग, परलोक, स्वप्न और संकल्पपुर के आदि में अद्वैतचिन्मात्रसत्ता होती है और उसका आभास संवेदन स्पन्दन फुरता है तो अनेक पदार्थों सहित जगत् भासित हो आता है, सो वह अनुभवरूप है, उसमे भिन्न कुछ सत् नहीं, वैसे ही यह जगत् अनुभवरूप है । हे प्रभो ! अब मैंने तुम्हारी कृपा से ऐसे निश्चय किया है कि जगत् अविचार सिद्ध है । विचार करने से निवृत्त हो जाता । जैसे खरगोश के सींग और आकाश के फूल असत् होते हैं, वैसे ही जगत् असत् है । बड़ा आश्चर्य है कि असतरूप अविद्या ने जगत् को मोहित किया था । अब मैंने जाना कि अविद्या कुछ वस्तु