योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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नहीं. अपनी, कल्पना ही अपने को बन्धन करती है । जैसे अपनी परछाहीं में बालक भूत की कल्पना करता है और आप ही डरता है, वैसे ही अपनी कल्पना ही अविद्यारूप भासित होती है। पर जब तक विचार नहीं होता तभी तक भासित होती है, विचार करने से उसका अत्यन्त अभाव हो जाता है। जैसे रस्सी में सर्प दिखता है और रस्सी के ज्ञान से सर्प का अत्यन्त अभाव हो जाता है। जैसे किसी स्थान में भ्रम से मनुष्य भासित होता है, वैसे ही आत्मा में भ्रम से अविद्यारूप जगत् भासित होता है । जैसे आकाश के फूल और खरगोश के सींग कुछ वस्तु नहीं, वैसे ही अविद्या भी कुछ वस्तु नहीं। जैसे स्वप्न में बन्ध्या का पुत्र दिखे तो भी भ्रममात्र है। और स्वप्न में अपने मरने का अनुभव हो, वह भी भ्रम है, वैसे ही अविद्यारूप जगत् दिखता है तो भी असत्य है, प्रमाणरूप नहीं । प्रमाण उसे कहते हैं, जो यथार्थ ज्ञान का साधक हो, पर यह जो प्रत्यक्ष प्रमाण यथार्थ नहीं, क्योंकि वस्तुरूप आत्मा है, वह ज्यों का त्यों नहीं दिखता। सीपी में रूपे के समान उलटा भासित होता है। यह प्रत्यक्ष अनुभव भी होता है, तो भी असतरूप है—इसे प्रमाणरूप क्योंकर जानें।
हे भगवन्! यह जगत् और कुछ वस्तु नहीं, केवल कल्पनामात्र है । जैसे-जैसे आत्मा में संकल्प दृढ़ होता है, वैसे ही वैसे जगत् भासित होता है । जैसे जो पुरुष स्वर्ग में बैठा हो, उसके हृदय में यदि कोई चिन्ता उपजे, तो उसको स्वर्ग भी नरकरूप हो जाता है, क्योंकि भावना नरक की हो जाती है । हे भगवन् ! यह जगत् केवल वासनामात्र है । आत्मा में जगत् कुछ आरम्भ-परिणाम से नहीं बना, यह जगत् केवल चित्त में है । जैसे पत्थर की शिला में शिल्पी पुतलियों की कल्पना करता है, सो जैसी कल्पना है वैसी ही भासित होती है-शिला से भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही आत्मा में चित्त ने जगत् के पदार्थ रचे हैं। जैसी-जैसी भावना करता है, वैसी ही वैसी यह देखता है। आत्मा में जगत् न हुआ है और न आगे होगा । ब्रह्मसत्ता केवल अपने आपमें स्थित है । वह स्वच्छ, अद्वैत, परम मौनरूप तथा द्वैत और एक की कल्पना से