योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1690, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ८८७
रहित है और मुनीश्वरों से सेवनीय है। ऐसा पद मैंने पाया है, अब मैं अपने आपमें स्थित और सब दुःखों से रहित हूँ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे रामविश्रान्तिवर्णनं नाम द्विशताधिकत्रिसप्ततितमसर्गः ॥ २७३ ॥
राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! आदि, अन्त और मध्य से रहित जो पद है और जिसको जानना मुनियों के लिए कठिन है, वह पद मैंने पाया है। एक और द्वैत की कल्पना जो शास्त्रों और वेदों में कही है, वह मेरी मिट गई है। अब मैं परमशान्त होकर निःशङ्क हुआ हूँ। मुझको कोई दुःख नहीं रहा। सब जगत् मुझे आत्मरूप ही दिखता है। हे भगवन् ! अब मैंने जाना कि न कोई अविद्या है, न विद्या है, न सुख है और न दुःख है। मैं सर्वदा अपने आत्मपद में स्थित हूँ। मैंने पाने योग्य पद पाया है, जो पहले भी प्राप्त था। जो कहते हैं कि हम उस पद को नहीं जानते, उनको भी वह प्राप्त है, परन्तु वे अज्ञान से नहीं जानते। वह पद और किसी उपाय से नहीं जाना जा सकता, अपने आप जाना जाता है। यह भी नहीं है कि किसी साधन से जनाइये और जानने योग्य और हो। वह तो आप ही बोधरूप है। न कोई भ्रान्ति है, न जगत् है। सब आत्मा ही है। हे मुनीश्वर ! अज्ञान और ज्ञान भी ऐसे हैं, जैसे स्वप्न की सृष्टि हो। जैसे उसमें अन्धकार दिखता है, उसका तब नाश होता है, जब सूर्य उदय हो। जब स्वप्न से जाग उठे, तब न अन्धकार रहता है और न प्रकाश ही रहता है। वैसे ही आत्मपद में जागने से ज्ञान और अज्ञान, दोनों का अभाव हो जाता है और द्वितीय की कल्पना मिट जाती है। जब संवेदन फुरता है, तब जगत् भासित होता है, परन्तु जगत् आत्मा से भिन्न नहीं है। जैसे आकाश और शून्यता में कुछ भेद नहीं, वैसे ही आत्मा और जगत् में भेद नहीं है। जैसे शिला का भीतर जड़ीभूत होता है, वैसे ही आत्मा का रूप जगत् है। जैसे जल और तरंग में भेद नहीं, वैसे ही आत्मा और जगत् अभिन्न रूप है।
हे मुनीश्वर ! जिस पुरुष को इस प्रकार आत्मा में अहंप्रतीति हुई