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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1691, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1691

८८८ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

है, वह कार्यकर्ता दिखता है, तो भी निश्चय ही कुछ नहीं करता, और अशान्तरूप दिखता है, तो भी सदा शान्तरूप है । हे मुनीश्वर ! अज्ञान मध्याह्न का सूर्य है और जगत् की सत्यता दिन है । जगत् के भाव-अभाव पदार्थ उसका प्रकाश है और तृष्णा मरुस्थल है, जिसमें अज्ञानी जीव पथिक हैं । उनको यह दिन और मार्ग निवृत्त नहीं होता । जो ज्ञानवान् स्वभाव में स्थित हैं, उनको न संसार का सत्यतारूपी दिन भासित होता है और न तृष्णारूपी मरुस्थल दिखता है । वे संसार की ओर से सो रहे हैं । ऐसी अद्वैतसत्ता उनको भास हुई है, जहाँ सत्य और असत्य, दोनों नहीं हैं, इस कारण उन्हें जगत् की कल्पना नहीं भासित होती । हे मुनीश्वर ! अब मैं जागा हूँ और सब जगत् मुझको अपना ही दिखता है । मैं निर्वाणरूप, निराकार, निरिच्छ और स्वभावसत्तारूप हूँ ? अब मुझको कोई दुःख नहीं है । हे मुनीश्वर ! उस पद को मैंने पाया है, जिसके पाने से तृष्णा कभी नहीं उपजती । जैसे पाषाण की शिला में प्राण नहीं उगते, वैसे ही मुझमें तृष्णा नहीं जगती । मुझको सब आत्मरूप ही भासित होता है । यह जो जीव है, उसमें जीवत्व कुछ नहीं है । जीवत्व भ्रान्ति सिद्ध है । सब आत्मस्वरूप है । मुझको तो निरालम्ब सत्ता अपनी ही भासित होती है ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे रामविश्रांतिवर्णनं नाम द्विशताधिकचतुःसप्ततिमस्सर्गः ॥ २०४ ॥

राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! आत्मा में अनन्तसृष्टि उपजती हैं । जैसे मेघ की बूँदों को गिनती नहीं होती, वैसे ही परमात्मा में सृष्टियों की गिनती नहीं हो सकती । जैसे एक रत्न की असंख्य किरणें होती हैं वैसे ही परमात्मा में असंख्य सृष्टियाँ हैं; कई परस्पर मिलती और कई नहीं मिलती हैं; परन्तु स्वरूप से सब एकरूप हैं । जैसे समुद्र में लहरें उठती हैं तो उनमें कई नूतन भिन्न-भिन्न और ही प्रकार की उठती हैं, कई परस्पर सदृश ज्ञात होती हैं और कई नहीं होतीं, और जैसे एक ही ज्वाला के बहुत दीपक होते हैं, उनमें कोई अन्योन्य परस्पर मिलते हैं और नहीं भी मिलते; पर स्वरूप से सब एकरूप हैं, वैसे ही आत्मा में