योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
८८८ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
है, वह कार्यकर्ता दिखता है, तो भी निश्चय ही कुछ नहीं करता, और अशान्तरूप दिखता है, तो भी सदा शान्तरूप है । हे मुनीश्वर ! अज्ञान मध्याह्न का सूर्य है और जगत् की सत्यता दिन है । जगत् के भाव-अभाव पदार्थ उसका प्रकाश है और तृष्णा मरुस्थल है, जिसमें अज्ञानी जीव पथिक हैं । उनको यह दिन और मार्ग निवृत्त नहीं होता । जो ज्ञानवान् स्वभाव में स्थित हैं, उनको न संसार का सत्यतारूपी दिन भासित होता है और न तृष्णारूपी मरुस्थल दिखता है । वे संसार की ओर से सो रहे हैं । ऐसी अद्वैतसत्ता उनको भास हुई है, जहाँ सत्य और असत्य, दोनों नहीं हैं, इस कारण उन्हें जगत् की कल्पना नहीं भासित होती । हे मुनीश्वर ! अब मैं जागा हूँ और सब जगत् मुझको अपना ही दिखता है । मैं निर्वाणरूप, निराकार, निरिच्छ और स्वभावसत्तारूप हूँ ? अब मुझको कोई दुःख नहीं है । हे मुनीश्वर ! उस पद को मैंने पाया है, जिसके पाने से तृष्णा कभी नहीं उपजती । जैसे पाषाण की शिला में प्राण नहीं उगते, वैसे ही मुझमें तृष्णा नहीं जगती । मुझको सब आत्मरूप ही भासित होता है । यह जो जीव है, उसमें जीवत्व कुछ नहीं है । जीवत्व भ्रान्ति सिद्ध है । सब आत्मस्वरूप है । मुझको तो निरालम्ब सत्ता अपनी ही भासित होती है ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे रामविश्रांतिवर्णनं नाम द्विशताधिकचतुःसप्ततिमस्सर्गः ॥ २०४ ॥
राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! आत्मा में अनन्तसृष्टि उपजती हैं । जैसे मेघ की बूँदों को गिनती नहीं होती, वैसे ही परमात्मा में सृष्टियों की गिनती नहीं हो सकती । जैसे एक रत्न की असंख्य किरणें होती हैं वैसे ही परमात्मा में असंख्य सृष्टियाँ हैं; कई परस्पर मिलती और कई नहीं मिलती हैं; परन्तु स्वरूप से सब एकरूप हैं । जैसे समुद्र में लहरें उठती हैं तो उनमें कई नूतन भिन्न-भिन्न और ही प्रकार की उठती हैं, कई परस्पर सदृश ज्ञात होती हैं और कई नहीं होतीं, और जैसे एक ही ज्वाला के बहुत दीपक होते हैं, उनमें कोई अन्योन्य परस्पर मिलते हैं और नहीं भी मिलते; पर स्वरूप से सब एकरूप हैं, वैसे ही आत्मा में
❇ निर्वाण प्रकरण ❇
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अनन्त जगत् फुरते हैं, परन्तु सब परस्पर एकरूप हैं। यदि नाना प्रकार का जगत् देख पड़ा तो उसमें वही रूप हुआ, और कोई कारण तो नहीं है? जैसे शून्य के आदि में निराकार सत्ता होती है और उर्मी में सूर्यादिक पदार्थ प्रकट होते हैं, सो वे भी वही रूप प्रकट भासित भी होते हैं, परन्तु निराकार होते हैं, वैसे ही यह जगत् भी अकारण निराकार है। हे मुनीश्वर ! अब मैंने ज्यों का त्यों जाना है। जैसे स्वप्न में मरे हुए बोलते हैं, जीते हुए मृतक देख पड़ते हैं, और सब पदार्थ विपरीत भासित होते हैं, परन्तु जब जाग उठे तब सब ज्यों के त्यों दिखते हैं, वैसे ही मैं जाग उठा हूँ, अब मुझको विपर्यय नहीं भासित होता—यथाभूतार्थ मुझको अब सब आत्मा ही भासित होता है। हे मुनीश्वर ! जो ज्ञानवान् पुरुष हैं, वे परमसमाधि में स्थित हैं। उनको उत्थान कदापि नहीं होता, अर्थात् स्वरूप से भिन्न नहीं भासित होता। वे व्यवहार करते दिखते हैं, परन्तु व्यवहार से रहित हैं, क्योंकि उनको कुछ अभिलाषा नहीं रहती। वे बिना अभिलाषा चेष्टा करते हैं, पर उनको हृदय से कुछ कर्तृत्व का अभिमान नहीं फुरता। इसी का नाम परम समाधि है। जब बोध की प्राप्ति होती है, तब कोई तृष्णा नहीं रहती, और सब पदार्थ नीरस हो जाते हैं, क्योंकि आत्मपद परमानन्दरूप और तृष्णा से रहित है। उर्मी का नाम मोक्ष और निर्वाण है, जिसमें उत्थान कोई नहीं।
हे मुनीश्वर ! आत्मानन्द ऐसा पद है, जिसके आनन्द की ओर ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि सभी ज्ञानवानों की वृत्ति सदा दौड़ती है, संसार के पदार्थों की ओर नहीं दौड़ती। जिस पुरुष को शान्त-शीतल स्थान प्राप्त हुआ है, वह फिर ज्येष्ठ-आषाढ़ की धूप नहीं चाहता कि मरुस्थल में दौड़े। वैसे ही ज्ञानवान् की वृत्ति अन्य किसी आनन्द की ओर नहीं जाती। हे मुनीश्वर ! मैंने निश्चय किया है कि तृष्णा का-सा ताप कोई नहीं, और अतृष्णा की-सी शान्ति कोई नहीं है। यदि कोई पुरुष परमेश्वर्य को प्राप्त हुआ हो, पर उसके हृदय में तृष्णा जलती हो तो वह कृपण, दरिद्री और आपदा का घर है। और जो निर्धन दिखता हो, परन्तु उसके हृदय में तृष्णा न हो तो वह परमेश्वर्य
८६० योगवाशिष्ट
से सम्पन्न और परम सम्पदा की खान है । बड़ा पण्डित हो परन्तु तृष्णा सहित हो, उसे परम मूर्ख जानिये । उसको बोध की प्राप्ति कदापि न होगी । जैसे चित्र की अग्नि शीत को नहीं दूर करती, वैसे ही उसकी मूर्खता को पण्डित भी नष्ट नहीं कर सकता । हे मुनीश्वर ! सहस्रों में कोई विरला पुरुष तृष्णा से रहित होता है । जैसे पिंजड़े में पड़ा सिंह पिंजड़े को तोड़कर निकले, वैसे कोई विरला ही तृष्णा के जाल को तोड़कर निकल पाता है । जो पण्डित स्वरूप का विचार कर वितृष्ण नहीं होता और अतीत होकर वितृष्ण नहीं होता तो वे पण्डित और अतीत, दोनों मूर्ख हैं । ज्यों-ज्यों तृष्णा को घटावेगा, त्यों-त्यों जाग्रतरूप बोध उदय होगा । जैसे ज्यों-ज्यों रात्रि क्षीण होती है, त्यों-त्यों दिन का प्रकाश होता है और ज्यों-ज्यों रात्रि की वृद्धि होती है, त्यों-त्यों दिन क्षीण होता है, वैसे ही ज्यों-ज्यों तृष्णा बढ़ती जायगी, त्यों-त्यों बोध की प्राप्ति कठिन होगी और ज्यों-ज्यों तृष्णा घटती जायगी, त्यों-त्यों बोध की प्राप्ति सुगम होगी । हे मुनीश्वर ! अब मैं उस पद को प्राप्त हुआ हूँ, जो अच्युत, निराकार और द्वैत था । एक की कल्पना से रहित है । उस पद को मैंने आत्मरूप जाना है और अब मैं निशङ्क हुआ हूँ । जिस पद के पाने से कोई इच्छा नहीं रहती, वही परमानन्दरूप आत्मपद है ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे रामविश्रान्तिवर्णनं- नाम द्विशताधिकपञ्चचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ २४५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! बड़ा कल्याण हुआ, जो तुम आत्मज्ञान पाकर जागे हो । ऐसे परम पावन वचन तुमने कहे हैं, जिनको सुनने में पाप का नाश होता है । ये वचन अज्ञानरूपी अन्धकार के नाशक सूर्य हैं और तन-मन के ताप का नाश करनेवाली चन्द्रमा की किरणें हैं । हे राम ! जो पुरुष अपने स्वभाव में स्थित है, उनकी व्यवहार और समाधि में एक ही दशा होती है । वे अनेक प्रकार की चेष्टा करते भी देख पड़ते हैं, परन्तु उनके निश्चय में कर्तृत्व का अभिमान नहीं जगता । वे सदा परमध्यान में स्थित हैं । जैसे पत्थर की शिला में स्पन्दन नहीं
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ८६१
जगता, वैसे ही उनको कुछ कर्तृत्व बुद्धि नहीं उपजती, क्योंकि उनके हृदय में देहाभिमान नहीं रहा है और वे चिन्मात्र स्वरूप में स्थित हुए हैं। वह आत्मपद परम शान्तरूप और द्वैत-कलना से रहित, एक है। ऐसा जो पद है, उसे ज्ञानवान् आत्मज्ञान से जानता है। इसी को निर्वाण और इसी को मोक्ष कहते हैं। हे राम! ऐसा जो पद है, उसमें मैं सदा स्थित हूँ। ब्रह्मा, विष्णु आदि जो ज्ञानवान् हैं, वे भी उसी पद में स्थित हैं। वे नाना प्रकार की चेष्टा करते भी दिखते हैं, परन्तु सदा शान्तरूप हैं। उनको क्रिया और समाधि में एक ही आत्मपद का निश्चय रहता है। जैसे वायु स्पन्दन और निस्पन्द में एक ही है और जल और तरङ्ग ठहरने में एक ही है, वैसे ही ज्ञानी दोनों में सम है। जैसे आकाश और शून्यता में भेद नहीं वैसे ही आत्मा और जगत् में भेद नहीं है।
राम ने पूछा, हे भगवन्! तुम्हारी कृपा से मुझको कोई कलना नहीं फुरती। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र से लेकर तृण तक जो कुछ जगत् है, वह सब मुझको आकाशरूप भासित होता है। सर्वदा सब प्रकार में अपने आपमें स्थित, अच्युत और अद्वैतरूप हूँ। मुझमें जगत् की कलना कोई नहीं। चित्तसंवेदन द्वारा मैं ही जगतरूप भासित होता हूँ, पर स्वरूप से कभी चलायमान नहीं होता। मैं अचेत्य चिन्मात्र-स्वरूप हूँ। अपने से भिन्न मुझको कुछ नहीं भासित होता। वशिष्ठजी बोले, हे राम! मैं जानता हूँ कि तुम जागे हो, परन्तु अपने दृढ़बोध के लिए मुझसे फिर प्रश्न करो कि "यह जगत् है नहीं तो दिखता क्या है?" राम बोले, हे भगवन्! मैं तुमसे तो तब पूछूँ जो मुझको जगत् का आकार दिखता हो। मुझको तो जगत् कुछ दिखता ही नहीं। जैसे संकल्प का अभाव होने पर संकल्प की चेष्टा भी नहीं भासित होती; जैसे बाजीगर की माया का अभाव होने पर बाजी नहीं रहती; अथवा स्वप्न के अभाव होने पर स्वप्न की सृष्टि नहीं दिखती और भविष्यत्कथा के पुरुष नहीं भासित होते; वैसे ही मुझको जगत् नहीं दिखता; तब फिर मैं किसका संशय उठाऊँ? आदि में जो संवेदन फुरा है, वह विराट् पुरुष होकर स्थित हुआ है, और उसी ने आगे देश, काल, पदार्थ,
८६२ ☸ योगवासिष्ठ ☸
स्थावर-जङ्गम जगत् को रचा है—उसी के समष्टि शरीर का नाम विराट् है। जैसे स्वप्न का पर्वत हो, वैसे ही यह विराट् पुरुष आकाशरूप है। जब वह आप ही आकाशरूप है, तब उसका रचा जगत् मैं क्यों पूछूँ? जैसे स्वप्न की मृत्तिका आकाशरूप है, अर्थात् जो उपजी ही अनउपजी है, तो उसके पात्रों को मैं क्यों पूछूँ? इसलिए न कोई विराट् है और न उसका जगत् है, मिथ्या ही विराट् है और मिथ्या ही उसकी चेष्टा है। केवल आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। न कोई जगत् है और न कोई उसका विराट् है। जैसे स्वप्न का पर्वत आभासमात्र होता है, वैसे ही यह जगत् आकार दिखता है।
जैसे बीज से वृक्ष होता है, वैसे ही ब्रह्म से जगत् प्रकट हुआ है। बल्कि, यह भी कैसे कहिये? बीज तो साकार होता है और उसमें वृक्ष का सद्भाव रहता है, जो परिणाम से वृक्ष होता है, पर आत्मा ऐसे कैसे हो? वह तो निराकार है और उसमें जगत् नहीं है, क्योंकि वह निर्विकार, अद्वैत और निर्वेद है। उसको जगत् का कारण कैसे कहिये? न कोई जाग्रत है, न स्वप्न है और न सुषुप्ति है। ये अवस्थाएँ भी आकाशमात्र हैं। आत्मा परिणाम भाव को नहीं प्राप्त होता। वह तो सदा अपने आपमें स्थित है। हे मुनीश्वर! मैं, तुम, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, सब आकाशरूप हैं और अब मुझको सब आत्मा ही भासित होता है। हे मुनीश्वर! एक सविकल्पज्ञान है और दूसरा निर्विकल्पज्ञान। सो वह आकाश सदृश अचेत्य चिन्मात्र है। जो दृश्य के सम्बन्ध से रहित है, उसे आकाश-मा निर्मल जानो। वही निर्विकल्पज्ञान है। जिनको यह ज्ञान प्राप्त हुआ है, वे महापुरुष हैं, उनको मेरा नमस्कार है। और जिनको दृश्य का संयोग है, वे सविकल्प ज्ञानी हैं। वे संसारी हैं और उनकी विषमता सहित जगत् भिन्न-भिन्न दिखता है। परन्तु तो भी भिन्न कुछ नहीं है। जैसे समुद्र में नाना प्रकार के तरंग उठते हैं, वे सभी जल-स्वरूप होते हैं, वैसे ही भिन्न-भिन्न जीव और उनका ज्ञान है। तो भी मुझको अपना ही रूप भासित होता है।
जैसे अवयवी को सब अङ्ग अपने ही लगते हैं, वैसे ही सब जगत्
⚛ निर्वाण प्रकरण ⚛ ८६३
मुझको अपना ही केवल अद्वैतरूप भासित होता है, और जगत् की कोई कलना नहीं फुरती। जैसे स्वप्न से जागे को स्वप्न की सृष्टि नहीं फुरती, कल्पना से रहित आप ही अद्वैत भासित होता है, वैसे ही मुझको जगत् कल्पना से रहित अपना ही आप भासित होता है। हे मुनीश्वर ! निगम आदि जो शास्त्र में उनका उल्लंघन कर मैंने ये वचन कहे हैं, परन्तु जो मेरे हृदय में है वही कहा है। जो कुछ हृदय में होता है, वही बाहर वाणी से कहा जाता है। जैसे जो बीज बोया है, उसी का अंकुर निकलता है, बीज के बिना अंकुर नहीं निकलता, वैसे ही जो कुछ मेरे हृदय में है, वही वाणी से कहता हूँ। यह विद्या सब प्रमाणों से सिद्ध है। हे मुनीश्वर ! जिसको यह दशा प्राप्त है, वही इसे जानता है और कोई नहीं जान सकता। जैसे जिसने मद्यपान किया है, वही उन्मत्तता को जानता है, और कोई नहीं जान सकता, वैसे ही जो ज्ञानवान् है, वही आत्मरस को जानता है, और कोई नहीं जानता। उस आत्मरस के पाने से फिर कोई कल्पना नहीं रहती। हे मुनीश्वर ! मैं आत्मा, अजन्मा, अविनाशी और परमशान्तरूप हूँ। उभय-एक की कल्पना से रहित, अ-चेत, चिन्मात्र हूँ। जगद्रूप हुए की तरह भी मैं भासित होता हूँ, पर निराभास हूँ। मुझमें आभास की कोई वस्तु नहीं; क्योंकि निराकार हूँ। इस प्रकार मैंने अपने को यथार्थ चिन्मात्र जाना है।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे रामविश्रान्तिवर्णनं नाम द्विशताधिकषट्सप्ततितमसर्गः ॥ २७६ ॥
वाल्मीकिजी बोले, हे भरद्वाज ! इस प्रकार कहकर रामचन्द्र एक मुहूर्तभर चुप हो गये, अर्थात् उन्होंने परमात्मपद में विश्रान्ति पाई, उनकी इन्द्रियों की और मन की वृत्ति का आत्मपद में उपशम हुआ। उसके उपरान्त जान बूझकर कमलनयन राम ने लीला के लिए यों प्रश्न किया—हे संशयरूपी मेघ के नाशक शरत्काल ! मुझको एक हलका सा संशय हुआ है, उसे दूर करो । हे मुनीश्वर ! आत्मपद अव्यक्त और अचिन्त्य है, अर्थात् इन्द्रियों का और मन का विषय नहीं है। वह मन के चिन्तन में भी नहीं आता। जो बड़े महापुरुष हैं, वे
८६४ ❁ योगवाशिष्ठ ❁
भी उसे वाणी से कह नहीं सकते। तो ऐसा अ-चेत चिन्मात्र आत्मतत्त्व शास्त्र से कैसे जाना जा सकता है? शास्त्र तो अविच्छेद प्रतियोगी करके कहते हैं, सो वह सविकल्प है। पर सविकल्प से निर्विकल्प पद कैसे जाना जाता है? उसे फिर गुरु और शास्त्र से कैसे जानिये? विकल्परूप शास्त्र हैं। उनमें भी चार अर्थ मिलता है। परन्तु विकल्प परिच्छेद प्रतियोगी जो उसके साथ हैं, उनसे सर्वात्मा क्योंकर जानिये? वशिष्ठजी बोले, हे राम! वह न गुरु और शास्त्र से जाना जाता है और न गुरु और शास्त्र के बिना भी जाना जाता है। हे राम! नाना प्रकार के जो विकल्परूप शास्त्र हैं, उनसे निर्विकल्परूप कैसे जानता है, सो यह भी सुनो। हे राम! व्यवधान देश के किटक-जाति के कुछ लोग थे, जो गृहस्थी में रहते थे। निदान एक समय उन पर आपदा पड़ी और वे चिन्ता से दुर्बल होने लगे। उन्हें भोजन भी न जुरता। जैसे वसन्त-ऋतु की मञ्जरी ज्येष्ठ-आषाढ़ की धूप से सूख जाती है, जैसे जल से निकला कमल सूख जाता है, वैसे ही किटक सम्पदारूपी जल से निकलकर आपदारूपी धूप में सूख गये। तब उन्होंने विचार किया कि किसी प्रकार हमारा पेट भरे, इसलिए हम वन में जाकर लकड़ी चुनें, जिससे हमारा कष्ट दूर हो।
हे राम! यों विचार कर वे वन में गये और लकड़ियाँ ले आये। इसी प्रकार वे लकड़ियाँ ले आते और बाजार में बेचकर पेट भरते थे। जब कुछ काल व्यतीत हुआ, तब उनमें से किसी एक ने चन्दन की लकड़ी पहचानी और उससे विशेष द्रव्य पाया। इसी प्रकार एक को ढूँढ़ते-ढूँढ़ते रत्न प्राप्त हुए। इस प्रकार उनको विशेष ऐश्वर्य प्राप्त हुआ, इसलिए उन्होंने लकड़ी बेचना छोड़ दिया। वे फिर यह सोचकर और स्थान ढूँढ़ने लगे कि इस से भी विशेष कुछ फायदा मिले। वन की पृथ्वी को खोदते-खोदते उनको चिन्तामणि मिली, इसलिए वे बड़े ऐश्वर्य-शाली हो गये। जैसे ब्रह्मा, इन्द्रादिक हैं, वैसे ही हो गये। हे राम! जिन्होंने उद्यम करके वन का सेवन किया था, उनको बड़ा सुख प्राप्त हुआ। लकड़ियाँ उठाते-उठाते उनका उदर पूर्ण हुआ और दुःख निवृत्त
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ८६५
हुआ। जिनको चन्दन की लकड़ी प्राप्त हुई, उनका उदर पूर्ण होने से और भी सन्ताप मिटे। और जिनको चिन्तामणि प्राप्त हुई, उनके सब सन्ताप मिट गये और वे परमैश्वर्यमान् हुए। परन्तु सबको वन से प्राप्त हुआ और जो वन के निकट उद्यम करने न गये, घर ही बैठे रहे, उन्होंने दुःखित होकर प्राणों को त्याग दिया, परन्तु सुख न पाया।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे चिन्तामणिप्राप्तिर्नाम द्विशताधिकसप्तसप्ततितमस्सर्गः ॥ २२७ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! यह जो तुमने किटक का वृत्तान्त कहा उसका तात्पर्य मैंने कुछ न जाना। वे किटक कौन-कौन थे; वह वन क्या था और आपदा क्या थी, सो कृपा करके प्रकट कहो। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ये सब जीव जो तुम देखते हो, वे किटक हैं। उन पर अज्ञानरूपी आपदा पड़ी है। आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक तापों की चिन्ता से वे जलते हैं। आध्यात्मिक काम-क्रोधादिक मानस दुःख हैं। वात, पित्त, कफ आदिक आधिभौतिक देह के दुःख हैं। और आधिदैविक वे दुःख हैं, जो ग्रहों से अनिच्छित प्राप्त हैं। हे राम ! उनमें प्रयत्न करके जो जीव शास्त्ररूपी वन में गये वे सुखी हुए और जो अर्थी सुख के निमित्त शास्त्ररूपी वन को सेवते हैं, उनको सत्य कर्मरूपी लकड़ियाँ प्राप्त होती हैं, जिनसे नरकरूपी उदरपूर्ति का जो दुःख था, वह निवृत्त होता है और वे स्वर्गरूपी सुख पाते हैं। फिर शास्त्ररूपी वन का सेवन करते-करते उपासनारूपी चन्दनवृक्ष प्राप्त होता है, उससे और दुःख भी निवृत्त होते हैं और वे विशेष सुख पाते हैं। जब जीव अपने इष्टदेव की सेवा करता है, तब स्वर्गादिक विशेष सुख पाता है और अपने स्थान को प्राप्त होता है। फिर जब शास्त्ररूपी वन को ढूँढ़ता है, तब विचाररूपी रत्नविशेष पाता है। जब सत्य-असत्य का विचार प्राप्त होता है, तब सब दुःख नष्ट हो जाते हैं। यह जो सुख प्राप्त होता है, वह शास्त्र से ही होता है। जैसे चन्दन और लकड़ियाँ आदि पदार्थ वन में प्रकट थे और चिन्तामणि गुप्त थी, वैसे ही और शास्त्रों में धर्म, अर्थ और काम प्रकट है, पर ज्ञानरूपी चिन्तामणि गुप्त है। जब
८६६ ❊ योगवासिष्ठ ❊
जीव दूसरे शास्त्ररूपी वन को वैराग्य और अभ्यासरूपी यत्न से खोजे, तब आत्मज्ञानरूपी चिन्तामणि पाता है ।
हे राम ! वन में ही उसने चिन्तामणि पाई थी, क्योंकि वहाँ चिन्तामणि का वन था । परन्तु जब अभ्यास किया था, तब पाई थी और उसी वन में पाई थी । वैसे ही गुरु और शास्त्र का भी जब मिट्टी के खोदने के समान अभ्यास करता है, तब आप चिन्तामणि ही सदृश आत्मप्रकाश होता है । जैसे मिट्टी के खोदने से चिन्तामणि का प्रकाश नहीं उपजता, क्योंकि चिन्तामणि तो पहले ही प्रकाशरूप थी, खोदने से केवल आवरण दूर हुआ, तब आप ही निकल आई, वैसे ही गुरु और शास्त्रों के वचन के अभ्यास से अन्तःकरण जब शुद्ध होता है, तब आत्मसत्ता स्वतः प्रकट होती है । गुरु और शास्त्र हृदय की मलीनता दूर करते हैं, और जब मलिनता दूर होती है, तब आत्मसत्ता स्वाभाविक प्रकाशित होती है । इससे गुरु और शास्त्रों से मलीनता दूर होती है परन्तु इनकी कल्पना भी द्वैत में होती है । वह कल्पना द्वैत संसार का नाश करनेवाली है । परमार्थ की अपेक्षा शास्त्र और गुरु भी द्वैत कल्पना है, और अज्ञानी की अपेक्षा गुरु और शास्त्र कृतार्थ करते हैं और इनके अभ्यास से जीव आत्मपद पाता है । प्रथम अज्ञानी शास्त्र का भोग के निमित्त सेवन करते हैं और शास्त्र में भोग का अर्थ जानते हैं, जैसे लकड़ियों के लिए वे किटक वन का सेवन करते थे । शास्त्र में सब कुछ है । जैसा जिसको रुचि के अनुसार अभ्यास होता है वैसे ही पदार्थ उसको उससे प्राप्त होते हैं । शास्त्र एक ही है, परन्तु पदार्थों में भेद है । जैसे पौंड़े के रस से गुड़, शकर और मिसरी बनती है, वैसे ही शास्त्र एक है, उसमें पदार्थ भिन्न-भिन्न हैं । जिस-जिस अर्थ के पाने के लिए कोई यत्न करेगा, उसी को पावेगा । शास्त्र में भोग भी हैं और मोक्ष भी है । अज्ञानी भोग के निमित्त यत्न करते हैं, परन्तु वे भी धन्य हैं, क्योंकि शास्त्र का तो सेवन करने लगे । उन्हें कभी किसी काल में आत्मपदरूपी चिन्तामणि भी प्राप्त होगी । परन्तु आत्मपद पाने के लिए ही शास्त्र श्रवण करना चाहिए । सुन-सुनकर अभ्यास द्वारा आत्मपद
८६८ योगवाशिष्ठ
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह सम्पूर्ण सिद्धान्त मैंने तुमसे विस्तारपूर्वक कहा है । इसको सुनने और बारम्बार विचारने से मूढ़ भी निरावरण होंगे । फिर उत्तम पुरुष के निगावरण होने में क्या आश्चर्य है । हे राम ! यह में भी जानता हूँ कि तुम विदितवेद्य हुए हो । प्रथम मैंने उत्पत्तिप्रकरण में तुमसे कहा है कि जगत् की उत्पत्ति चित्तसंवेदन से हुई है । फिर स्थितिप्रकरण में कहा है कि जगत् की स्थिति इस प्रकार हुई है । उत्पत्ति यह कि चित्तसंवेदन के फुरने से जगत् उपजा है और संवेदन फुरने की दृढ़ता से ही उसकी स्थिति हुई है । उसके उपरान्त उपशमप्रकरण में कहा है कि मन इस प्रकार स्फुरण रहित होता है । जब चित्त का उपशम हुआ, तब परम कल्याण हुआ । मन के फुरने का नाम संसार है । जब मन का उपशम हो जाता है, तब संसार की कल्पना मिट जाती है । यह सब विस्तारपूर्वक कहा है । परन्तु अब जानता हूँ कि तुम बोधवान् हुए हो । हे राम ! मैंने तुमसे पहले भी आत्मज्ञान का उपाय कहा है और जिनको ज्ञान प्राप्त हुआ है उनके लक्षण भी कहे हैं । अब फिर भी संक्षेप से कहता हूँ । प्रथम बालअवस्था में सज्जनों का संग करना और सत्शास्त्रों को विचारना चाहिए । इस शुभ आचार से, अभ्यास द्वारा, जब आत्मपद की प्राप्ति होती है, तब समता होती है और मनुष्य सबका सुहृद् हो जाता है । सौहार्द परमानन्द का जनक है और जननी की तरह सदा संग रहता है । जैसे सुन्दर पुरुष को देखकर उसकी स्त्री प्रसन्न होती है और उसके लिए प्राण का देना भी स्वीकार करती है, पर उस पुरुष को नहीं त्यागती, वैसे ही जिस ज्ञानवान् पुरुष की ब्रह्म लक्ष्मी से सुन्दर कान्ति है, उसकी समता, मुदिता और सुहृदतारूपी स्त्री नहीं त्यागती; सदा उसके हृदयरूपी कण्ठ में लगी रहती है और वह पुरुष सदा प्रसन्न रहता है ।
हे राम ! जिसको देवताओं का राज्य प्राप्त होता है वह भी ऐसा प्रसन्न नहीं होता और जिसको सुन्दर स्त्रियाँ प्राप्त होती हैं, वह भी ऐसा प्रसन्न नहीं होता, जैसा ज्ञानवान् प्रसन्न होता है । हे राम ! समता तो द्विधारूपी अन्धकार का नाशक सूर्य है । वह तीनों तापरूपी
💥 निर्वाण प्रकरण 💥 ८६६
उष्णता का नाश करने को पूर्णमासी का चन्द्रमा है । सुहृदता और समता सौभाग्यरूपी जल का नीचा स्थान है । जैसे जल नीचे स्थान में स्वाभाविक ही चला जाता है, वैसे ही सुहृदता में सौभाग्य स्वाभाविक होता है । जैसे चन्द्रमा की किरणों के अमृत से चकोर तृप्त होता है, वैसे ही आत्मारूपी चन्द्रमा की समता और सुहृदतारूपी किरणों को पाकर ब्रह्मादिक चकोर तृप्त होकर आनन्दित होते और जीते हैं। हे राम ! वह ज्ञानवान् ऐसी कान्ति से पूर्ण है, जो कभी क्षीण नहीं होती । पूर्णमासी के चन्द्रमा में भी उपाधि दिखती है, परन्तु ज्ञानवान् के मुख में वैसी भी उपाधि नहीं । जैसी उत्तम चिन्तामणि की कान्ति होती है, वैसी ही ज्ञानवान् की कान्ति होती है, जो रागद्वेष से कभी क्षीण नहीं होती । वह सदा प्रसन्न रहता है । हे राम ! समता ही मानों सौभाग्यरूपी कमल की व्यानि है । समदृष्टि पुरुष ऐसे आनन्द के लिए जगत् में विचरता है और प्राकृत आचार को करता है । वह भोजन करता है, ग्रहण करता है, या कुछ लेता-देता है । सब लोग उसके कर्तृत्व की स्तुति करते हैं । हे राम ! ऐसा पुरुष ब्रह्मादिक का भी पूजनीय है । सभी उसका मान करते हैं, सब उसके दर्शन की इच्छा करते हैं और दर्शन करके प्रसन्न होते हैं ।
जैसे सूर्य के उदय होने पर सूर्यमुखी कमल खिल आते हैं और सब उल्लास को प्राप्त होते हैं, वैसे ही उसका दर्शन करके सब आह्लादित होते हैं । वह शुभ आचार ही करता है । जो कुछ अन्यथा भी कर बैठता है तो भी लोग उसकी निन्दा नहीं करते, क्योंकि वे जानते हैं कि यह समदर्शी है । समता से वह सबका सुहृद होता है शत्रु भी उसके मित्र हो जाते हैं । जिनमें समताभाव उदय हुआ है, उनको अग्नि जला नहीं सकती; जल नहीं डुबा सकता और वायु नहीं सुखा सकती । वह जैसी इच्छा करे वैसी ही सिद्धि होती है । हे राम ! जिसको समता प्राप्त हुई है, वह पुरुष निरुपम हो जाता है, और उसको कोई संसार की उपमा नहीं दे सकता । जिसको समता नहीं प्राप्त हुई, वह सबके संग सुहृदता का अभ्यास करे तो जो उसका शत्रु हो वह भी मित्र हो
६०० * योगवाशिष्ठ *
जाता है, क्योंकि अभ्यास की दृढ़ता से शत्रु भी मित्र दिखने लगते हैं। जो सबमें समता का अभ्यास करता है, वही दृढ़ होता है और समताभाव से कभी चलायमान नहीं होता । हे राम ! एक राजा था, उसने अपने शरीर का मांस काटकर भूखे को दिया, परन्तु समता से चलायमान न हुआ; ज्यों का त्यों रहा । एक पुरुष को उसकी पुत्री अति प्यारी थी । उसने उसे किसी को दिया, जिसने शत्रु को दे दी, परन्तु वह ज्यों का त्यों रहा । एक और राजा था, जिसकी स्त्री अति प्यारी थी। पर उसने उसका कुछ व्यभिचार सुना और मार डाला, परन्तु समतारूप धर्म को न त्यागा ।
हे राम ! जब राजा के घर में मङ्गल उत्सव होता है, तब वह अपने नगर को भूषणों और वस्त्रों से सजाता और प्रसन्न होता है । यही अवस्था राजा जनक की देखी थी । एक समय उन्होंने सब स्थानों को अति प्रज्वलित अग्नि से जलते देखा, पर अपने समताभाव से चलायमान न हुए । एक और राजा था । उसने राज्य भी और को दे दिया और आप राज्य बिना विचरता रहा । परन्तु समताभाव से चलायमान न हुआ । हे राम ! एक दैत्य था, उसको देवताओं का राज्य मिला और फिर नष्ट भी हो गया, परन्तु दोनों भावों में वह सम ही रहा । एक बालक था, उसने चन्द्रमा को लड्डू जानकर फूँक मारी, परन्तु वह ज्यों का त्यों रहा । हे राम ! इसी प्रकार मैंने अनेक देखे हैं, जिनको सम्यक् आत्मज्ञान प्राप्त हुआ है और वे सुख-दुःख से चलायमान नहीं हुए । हे राम ! ज्ञानी और अज्ञानी का प्रारब्धभोग तुल्य है । परन्तु अज्ञानी रागद्वेष से तपता है, और ज्ञानी दृढ़ समझ के कारण संतप्त नहीं होता । सब अवस्थाओं में उसको समभाव होता है । जो फल आत्मपद का साक्षात् होने से प्राप्त होता है, वह तप, तीर्थ, दान और यज्ञ से भी नहीं प्राप्त होता । जब अपना विचार उत्पन्न होता है, तब सब भ्रान्ति निवृत्त हो जाती है और सब जगत् आत्मरूप ही दिखता है । इसी दृष्टि को लिये हुए ज्ञानी प्राकृत आचार में विचरते हैं, परन्तु निश्चय में सदा निर्गुण हैं । राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! ऐसी अद्वैत-
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दृष्टिनिष्ठा जिनको प्राप्त हुई है, उनको कर्म करने से क्या प्रयोजन है ? वे त्याग क्यों नहीं करते ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो पुरुष अद्वैतनिष्ठ है, उनके हृदय से त्याग-ग्रहण की भ्रान्ति चली जाती है । वे उस भ्रम से रहित होकर प्रारब्ध के अनुसार चेष्टा करते हैं। हे राम ! जो कुछ स्वाभाविक क्रिया उनकी होती है, उसका त्याग वे नहीं करते । उसमें उनको ज्ञान प्राप्त हुआ है । वे आचार करते हैं—और को ग्रहण नहीं करते और उसका त्याग नहीं करते ।
हे राम ! जिनको गृहस्थी में ज्ञान प्राप्त हुआ है, वे गृहस्थी ही में रहते हैं और उसका त्याग नहीं करते—जैसे मैं हूँ। जिनको राज्य में ज्ञान प्राप्त हुआ है, वे राज्य ही में रहे हैं—जैसे तुम हो । जो ब्राह्मण को ज्ञान प्राप्त हुआ है तो वे ब्राह्मण ही के कर्मों में निष्ठा रहे हैं। इसी प्रकार क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र जिस वर्णाश्रम में किसी को ज्ञान प्राप्त हुआ है, वह ही कर्म करता है । हे राम ! कुछ ज्ञानवान् गृहस्थी ही में रहे हैं, कुछ राज्य ही करते हैं, कुछ संन्यासी हो रहे हैं, कुछ वन में विचरते फिरते हैं, कुछ पर्वत कन्दरा में ध्यानावस्थित हो रहे हैं, कुछ नगरों में रहते रहे हैं, कुछ मथुरा, केदारनाथ, प्रयाग, जगन्नाथ, इत्यादि तीर्थों में रहे हैं, कुछ देवता का पूजन, कुछ कर्म, कुछ तीर्थ और अग्निहोत्र करते हैं और कुछ मेरी तरह जप करते हैं। कुछ अस्ताचल पर्वत में, कुछ उदयाचल पर्वत में और कुछ मन्दराचल, हिमाचल इत्यादि पर्वतों में विचरते रहे हैं। कुछ शास्त्रविहित कर्म करते रहे हैं, कुछ अवधूत हो रहे हैं; कुछ भिक्षा माँग-माँग भोजन करते रहे हैं, कुछ कठोर वचन बोलते रहे हैं, कुछ अज्ञानी की तरह विचरते रहे हैं और कुछ विद्याध्ययन इत्यादि नाना प्रकार की चेष्टा करते रहे हैं, क्योंकि उनको ये चेष्टाएँ स्वाभाविक प्राप्त हुई हैं। वे यत्न से कुछ नहीं करते । हे राम ! वे शुभकर्म करें अथवा अशुभकर्म करें, परन्तु कोई क्रिया उनका बन्धन नहीं करती । पर जो अज्ञानी हैं वे जैसे कर्म करेंगे, वैसे ही फल को भोगेंगे । जो पुण्यकर्म करेंगे तो स्वर्गसुख भोगेंगे, और पाप से नरक-दुःख भोगेंगे। जो कामना से रहित शुभकर्म करेगा, उसका अन्तः-
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कारण शुद्ध होगा। वह सन्तों के संग और सतशास्त्रों से शुद्ध होगा।
हे राम ! जो अर्धप्रबुद्ध हैं, वे जो पाप करने लग जावें और आत्म-अभ्यास त्याग दें तो वे दोनों मार्गों से भ्रष्ट हो जाते हैं—न स्वर्ग को जाते हैं और न आत्मपद को प्राप्त होते हैं। तप, दान, तीर्थादि के सेवन से भी आत्मपद नहीं प्राप्त होता। जब विचार उपजता है और आत्मपद का अभ्यास होता है, तभी आत्मपद मिलता है, और जब आत्मपद प्राप्त होता है, तब मनुष्य निशङ्क हो जाता है। चेष्टाव्यवहार करता भी दीखता है, पर उसका चित्त शान्त हो जाता है। जैसे ताँबे को जब पारस का स्पर्श कराइए, तब वह सुवर्ण हो जाता है। आकार उसका वैसा ही रहता है, परन्तु ताँबे के भाव का अभाव हो जाता है। वैसे ही जब चित्त को आत्मपद का स्पर्श होता है, तब चित्त शान्त हो जाता है। परन्तु चेष्टा उसी प्रकार होती है और जगत् की सत्यता नष्ट हो जाती है। हे राम ! अब तुम जागे हो और निशङ्क हुए हो। तुम्हारा रागद्वेष नष्ट हो गया है। तुम निर्विकार आत्मपद को प्राप्त हुए हो। जन्म, मृत्यु, बढ़ना, घटना, युवा और वृद्ध होना, इन सब विकारों से रहित आत्म-पद को तुमने पाया है। सबका अधिष्ठान परम शुद्ध चैतन्य तुमको प्राप्त हुआ है। हे राम ! जो कुछ मुझको कहना था, वह तुमसे मैंने कहा। यह सार का सार आत्मपद है। जो कुछ जानने योग्य था, वह तुमने जाना। इसके उपरान्त न कुछ कहना रहा और न कुछ जानना रहा—यहाँ तक कहना और जानना है। अब तुम निशङ्क होकर विचरो। तुमको कोई संशय नहीं रहा। तुमने क्षय और अतिशय से रहित पद पाया है, अर्थात् तुमने अविनाशी और सबसे उत्तम पद पाया है।
वाल्मीकिजी बोले, हे साधु ! मुनि शार्दूल वशिष्ठजी जब इस प्रकार कहकर चुप हो रहे, तब सब सभा जो बैठी थी, वह परम निर्विकल्प पद में स्थित हो गई। जैसे वायु से रहित कमल फूल पर भौंरे स्थिर होते हैं, वैसे चित्तरूपी भ्रमर आत्मपदरूपी कमल के रस को लेते हुए स्थिर हो रहे। सबके सब ब्रह्म को जानकर ब्रह्मरूप हुए, और ब्रह्म
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ही में स्थित हुए। जितने मृग निकट थे, वे भी तृण का खाना छोड़कर अचल हो गये। दूसरे पशु-पक्षी भी सुनकर निस्पन्द हो रहे। स्त्रियाँ जो बालकों संयुक्त चपल थीं, वे सुनकर जड़वत् हो गई। पहले जीवन्मुक्त सिद्धों के गण मोक्ष का उपाय सुनने को आये थे उन्होंने और देवता तथा सिद्धों ने तमाल, कदम्ब, पारिजात, कल्पवृक्ष इत्यादि दिव्य वृक्षों के फूलों की वर्षा की। नगाड़े, भेरी और शंख बजने लगे। सब लोग वशिष्ठजी की स्तुति करने लगे। निदान बड़ा कोलाहल हुआ, जिससे दशों दिशा पूर्ण हो गई, ऊपर से देवताओं और सिद्धों के नगाड़ों के शब्द हुए, जिनसे पर्वत गूँज उठे और दिव्य फूलों की ऐसी सुगन्ध फैली, मानों पवन भी प्रसन्न हुआ है। तब सिद्धों ने कहा, हे वशिष्ठजी ! हमने भी अनेक मोक्ष के उपाय सुने और उच्चार कहे हैं, परन्तु जैसा तुमने कहा है, वैसा न पहले सुना है, न गाया है और न कहा है। जो तुम्हारे मुखारविन्द से श्रवण किया है, उससे हम परम सिद्धान्त को जान गये हैं। इसके श्रवण से पशु, पक्षी और मृग भी कृतार्थ हुए हैं, फिर मनुष्यों का क्या कहना। वे तो कृतार्थ ही हुए हैं। निष्पाप ज्ञान पाकर वे अवश्य मुक्त होंगे।
वाल्मीकिजी बोले, हे साधु ! ऐसे कहकर उन्होंने फिर फूलों की वर्षा की और वशिष्ठजी के चन्दन का लेप किया। जब इस प्रकार वे पूजा कर चुके, तब और जो लोग निकट बैठे थे, वे परम विस्मय को प्राप्त हुए कि ऐसा परम उपदेश वशिष्ठजी ने किया। तब राजा दशरथ उठ खड़े हुए और हाथ जोड़कर वशिष्ठजी को नमस्कार करके बोले, हे भगवन् ! तुम्हारी कृपा से हम छः ऐश्वर्यों से सम्पन्न हुए हैं। हे भगवन् ! तुमने सम्पूर्ण शास्त्र सुनाया है, जिसको सुनकर हम पूजनीय हुए हैं। इसलिए हे देव ! हम तुम्हारा पूजन किस सामग्री से करें ? ऐसा कोई पदार्थ पृथ्वी, आकाश और देवताओं के लोकों में भी नहीं दिखता, जो तुम्हारी पूजा के योग्य हो—सब पदार्थ कल्पित हैं। और जो सत्य पदार्थ से पूजा करें तो सत्य तुमहीं से पाया है। इससे ऐसा पदार्थ कोई नहीं, जो तुम्हारी पूजा के योग्य हो। तथापि अपनी-अपनी शक्ति के
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अनुसार हम पूजन करते हैं। तुम क्रोध न करना और हँसी भी न करना। हे मुनीश्वर ! मैं राजा दशरथ, अपने अन्तःपुर की सब स्त्रियाँ अपने चारों पुत्र, अपने सम्पूर्ण राज्य और सम्पूर्ण प्रजासहित जो कुछ मैंने लोक में यश पाया और परलोक के निमित्त पुण्य किया है, वह सब तुम्हारे चरणों में अर्पण करता हूँ। हे साधु ! इस प्रकार कहकर राजा दशरथ वशिष्ठजी के चरणों पर गिरे।
तब वशिष्ठजी बोले, हे राजन् ! तुम धन्य हो। जिनको ऐसी श्रद्धा है। परन्तु हम तो ब्राह्मण हैं। हमको राज्य क्या करना है, और हम राज्य का व्यवहार क्या जानें। कभी ब्राह्मण ने राज्य किया है ? राजा तो क्षत्रिय ही होते हैं। इसलिए तुमही राज्य कर सकोगे। यह जो तुम्हारा शरीर है, उसे मैं अपना ही जानता हूँ। और इन तुम्हारे चारों पुत्रों को मैं पहले ही से अपने जानता हूँ। मैं तो तुम्हारे प्रणाम से ही सन्तुष्ट हूँ। यह राज्य का प्रसाद मैंने तुमको ही दिया। फिर वाल्मीकिजी बोले कि जब इस प्रकार वशिष्ठजी ने कहा, तब राजा दशरथ ने फिर कहा कि हे स्वामी ! तुम्हारे योग्य कोई पदार्थ नहीं है। तुम ब्रह्माण्ड के ईश्वर हो। बल्कि तुमसे ऐसे वचन कहते भी मुझको लज्जा आती है। परन्तु योग्यता के निमित्त तुम्हारे आगे विनती की है कि मैंने मोक्ष-उपाय शास्त्र तुमसे श्रवण किया है, इसलिए अपनी शक्ति के अनुसार तुम्हारा पूजन करूँ। तब वशिष्ठजी ने कहा, बैठो, और राजा बैठ गये। फिर राम ने निरभिमान होकर कहा, हे संशयरूपी तिमिर के नाशक सूर्य ! तुम्हारा पूजन हम किस वस्तु से करें ? घर में कोई पदार्थ अपना नहीं है। हे गुरुजी ! मेरे पास और कुछ नहीं है, केवल एक नमस्कार ही है। ऐसे कहकर वे चरणों पर गिरे। उनके नेत्रों से जल बहने लगा। वे बार-बार उठते और आत्मानन्द-प्राप्ति के उत्साह से फिर गिर पड़ते थे। निदान जब वशिष्ठजी ने कहा कि बैठ जाओ तब रामजी भी बैठ गये। फिर लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, राजर्षि और ब्रह्मर्षि आदि सब अर्घ्य-पाद्य से पूजन करने लगे। सबने फूलों की वर्षा की, जिससे वशिष्ठजी का शरीर ढक गया। जब वशिष्ठजी ने हाथ से फूल हटाये, तब मुख देख-
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पड़ने लगा। जैसे बादलों के दूर होने पर चन्द्रमा दिखता है, वैसे ही मुख दीखने लगा। फिर वशिष्ठजी ने व्यास, वामदेव, विश्वामित्र, नारद, भृगु, अत्रि इत्यादि जो मुनि बैठे थे, उनसे कहा, हे साधु! जो कुछ मैंने सिद्धान्त के वचन कहे हैं, इनमें न्यून या अधिक जो कुछ हो, वह अब तुम कहो। जैसे जैसा स्वर्ण होता है, वैसा ही अग्नि में दिखाई देता है, वैसे ही तुम कहो। तब सबने कहा, हे मुनीश्वर! ये तुमने परम सारांश वचन कहे हैं। जो तुम्हारे कथन को न्यून या अधिक जानकर उनकी निन्दा करेगा, वह महापतित होगा। ये वचन परमपद देनेवाले हैं। हे मुनीश्वर! हमारे हृदय में भी जो कुछ जन्म-जन्मान्तर का मैल था, वह नष्ट हो गया। हम तो पूर्ण ज्ञानवान् थे, परन्तु पूर्वजन्म जो लिये हैं, इनकी स्मृति हमारे चित्त में थी कि अमुक जन्म हमने इस प्रकार पाया था और अमुक जन्म इस प्रकार पाया था, वह सब स्मृति अब नष्ट हुई है। जैसे अग्नि में डाला सुवर्ण शुद्ध होता है, वैसे ही तुम्हारे वचनों से हमारा स्मृतिरूप मल नष्ट हुआ है। अब हम जानते हैं कि न कोई जन्म था और न हमने कोई जन्म पाया है—हम अपने ही आपमें स्थित हैं। हे मुनीश्वर! तुम सम्पूर्ण विश्व के गुरु और ज्ञान-अवतार हो, इसलिए तुमको हमारा नमस्कार है। राजा दशरथ भी धन्य हैं जिनके संयोग से हमने मोक्ष उपाय सुना है। और यह रामजी, साक्षात् विष्णु भगवान् हैं।
इतना कह फिर वाल्मीकिजी बोले, कि इसी प्रकार ऋषीश्वर और मुनीश्वर वशिष्ठजी को परमगुरु जानकर स्तुति करने लगे। रामजी को विष्णु भगवान् जानकर उनकी भी स्तुति की और राजा दशरथ की भी स्तुति की, जिनके घर में विष्णु भगवान् ने अवतार लिया। फिर वशिष्ठजी की अर्घ्य पाद्य से पूजा करने लगे। आकाश के सिद्ध बोले, हे वशिष्ठजी! तुमको हमारा नमस्कार है। तुम गुरु के भी गुरु हो। हे प्रभो! जो कुछ तुमने उपदेश किया है और जो कुछ उसमें युक्ति कही है, वह अर्थात् ऐसे वचन वागीश्वरी भी कदाचित् न कह सकें। तुमको बारम्बार नमस्कार है। और चतुर्द्वीप पृथ्वी के शासक
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राजा दशरथ को भी नमस्कार है, जिनके प्रसंग से हमने ज्ञान और युक्ति सुनी। राम विष्णु भगवान् नारायण हैं। ये चारों भाई परमात्मा हैं। इनको हमारा प्रणाम है। ये चारों भाई ईश्वर हैं। इन पर विष्णु भगवान् की दया है। ये जीवन्मुक्त अवस्था धारणकर बैठे हैं। वशिष्ठजी परमगुरु हैं और विश्वामित्र तप की मूर्ति हैं। वाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार जब सिद्ध कह चुके, तब वे फूलों की वर्षा करने लगे। जैसे हिमालय पर्वत पर बर्फ की वर्षा होती है और वह बर्फ से परिपूर्ण हो जाता है, वैसे ही वशिष्ठजी पुष्पों से लद गये। आकाशचारी जो ब्रह्मलोक के वासी थे, उन्होंने भी उनपर पुष्पों की वर्षा की। सभा में जो ब्रह्मर्षि आदि बैठे थे, उनका भी यथायोग्य पूजन किया। इस प्रकार जब सिद्ध पूजन कर चुके, तब कई ध्याननिष्ठ हो रहे सबके चित्त शरत्काल के आकाशसदृश निर्मल हो गये और वे अपने स्वभाव में स्थित हुए। जैसे स्वप्न की सृष्टि का कौतुक देखकर कोई जाग उठे और हँसे, तैसे ही वे हँसने लगे।
तब वशिष्ठजी ने राम से कहा, हे रघुवंशरूपी आकाश के चन्द्रमा! तुम अब किस दशा में स्थित हो और क्या जानते हो? राम बोले, हे भगवन्! सब धर्मज्ञान के समुद्र! तुम्हारी कृपा से मैं अब अपने रूप में स्थित हूँ, और कोई कल्पना मुझे नहीं रही अब मैं परम शान्ति पा गया हूँ। मुझको शेष विशेष कोई नहीं दिखता, केवल अपना रूप ही पूर्ण दिखता है—अब मुझको कोई संशय नहीं रहा, और इच्छा भी कुछ नहीं रहा। मैंने अब परम निर्विकल्प पद पाया है और कोई कल्पना मुझे नहीं फुरती। जैसे नील, पीत आदि उपाधि से रहित स्फटिक प्रकाश पाता है, तैसे ही मैं निरुपाधि स्थित हूँ, और संकल्प-विकल्प उपाधि का अभाव हो गया है। अब मैं परम शुद्ध हो गया हूँ, मेरा चित्त शान्त हो गया है। मेरी चेष्टा पूर्ववत् होगी, पर निश्चय में कुछ न उत्थान होगा। जैसे शिला में प्राण नहीं जगते, तैसे ही मुझको द्वैत कल्पना कुछ नहीं फुरती। हे मुनीश्वर! अब मुझको सब आकाशरूप दिखता है। शान्तरूप होकर परम निर्वाण हूँ। भिन्नभाव से जगत्
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मुझको कुछ नहीं भासित होता—सब अपना रूप ही दिखता है। अब जो कुछ तुम कहो, वही करूँ। अब मुझको कोई शोक नहीं रहा। राज्य करना, भोजन, छादन, बैठना, चलना, पान करना आदि कर्म जैसे तुम कहो, वैसे ही करूँ। तुम्हारे प्रसाद से मुझको सब समान है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विश्रामप्रकटीकरणं नाम द्विशताधिकैकोनाशीतितमस्सर्गः ॥ २७६ ॥
वाल्मीकिजी बोले, हे भरद्वाज ! जब रामजी ने ऐसे कहा, तब वशिष्ठजी बोले, हे राम ! बड़ा कल्याण और प्रसन्नता की बात जो तुम अपने आपमें स्थित हुए हो। अब तुमने यथार्थ जाना है। अब और जो कुछ सुनने की इच्छा हो, सो कहो। राम बोले, हे संशयरूपी अन्धकार के नाशक सूर्य और संशयरूपी वृक्षों के नाशक कुठार ! अब तुम्हारे प्रसाद से मैं परमविश्रान्ति को प्राप्त हुआ हूँ और जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति की कल्पना से रहित हूँ। जाग्रत् जगत् भी मुझको सुषुप्ति-सा भासित होता है। और कुछ श्रवण करने की मुझे इच्छा नहीं रही। अब परम-ध्यान मुझको प्राप्त हुआ है, अर्थात् आत्मा से भिन्न कुछ वस्तु नहीं दिखती। मैं आत्मा, अज, अविनाशी, शान्तरूप और अनन्त, सदा अपने आपमें स्थित हूँ। ऐसे मुझको मेरा नमस्कार है अब प्रलयकाल का पवन चले, समुद्र उमड़े और नाना प्रकार के क्षोभ हों तो भी मेरा चित्त स्वरूप से चलायमान न होगा। जो त्रिलोकी का राज्य मुझे प्राप्त हो, तो भी मेरे चित्त में हर्ष न उपजेगा। मैं सत्तासमान में स्थित हूँ।
वाल्मीकिजी बोले, हे भरद्वाज ! जब इस प्रकार राम ने कहा, तब मध्याह्न का सूर्य सिर पर आ गया। राजा जो रत्न और मणियों के भूषण पहिनकर बैठे थे, उन मणियों की कान्ति किरणों से अति विशेष हुई और सूर्य के साथ एक हो गई-मानों ऐसे वचन सुनकर नृत्य करती हो। तब वशिष्ठजी ने कहा, हे राम ! अब हम जाते हैं, क्योंकि मध्याह्न की उपासना का समय है। अगर कुछ तुम्हें पूछना हो वह कल फिर पूछना।
तब राजा दशरथ पुत्रोंसहित उठ खड़े हुए और वशिष्ठजी का बहुत पूजन किया। जो ऋषीश्वर, मुनीश्वर और ब्राह्मण थे, उनका भी
६०८ ✻ योगवाशिष्ठ ✻
यथायोग्य पूजन किया और मोतो और हीरों की माला, मोहरें, रुपये, घोड़े, गज, वस्त्र भूषण आदि जो ऐश्वर्य का सामग्रो है, वह अर्पण की। जो विरक्त संन्यासी थे, उनको प्रणाम करके प्रसन्न किया, और जो राजर्षि थे, उनका भी पूजन किया। तब वशिष्ठजी उठ खड़े हुए। परस्पर सबने नमस्कार किया और मध्याह्न के नौवत-नगाड़े बजने लगे। सब श्रोता उठकर विचरने लगे। कोई चले जाते थे और कोई शीश हिलाते, कोई हाथ की उँगली नचाते, नेत्रों की भौंह मटकाते परस्पर चर्चा करते जाते थे। इस प्रकार सब अपने स्थानों को गये। वशिष्ठजी सन्ध्या-उपासना करने लगे। दूसरे दिन जब श्रोता विचार-पूर्वक रात्रि को व्यतीतकर सूर्य की किरणों के निकलते ही आ पहुँचे। गगनचारी, सत्यलोक के रहनेवाले, ऋषि और देवता, भूमिवासी राजर्षि, ब्रह्मर्षि और जो श्रोता थे, वे सब आकर अपने-अपने स्थान पर बैठ गये। सबने परस्पर नमस्कार किया।
तब रामजी हाथ जोड़कर उठ खड़े हुए और बोले हे भगवन् ! अब जो कुछ मुझको सुनना और जानना रहा है, वह तुम ही कृपा करके कहो। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो कुछ सुनने योग्य था, वह तुमने सुन लिया है। अब तुम कृतकृत्य हुए हो और सब रघुवंशियों का कुल तुमने तारा है। जो आगे होंगे, उन सबको भी तुमने कृतकृत्य कर दिया है। अब तुम परमपद को प्राप्त हुए हो। अब जो कुछ तुमको पूछने की इच्छा हो, वह भी पूछ लो। हे राम ! जो सत्तासमान में स्थित हुए हो तो विश्वामित्र के साथ जाकर इनका कार्य करो और जो कुछ पूछने की इच्छा हो, वह पूछ लो। राम ने पूछा, हे भगवन् ! पहले मैं अपने को इस देह से युक्त परिच्छिन्नरूप देखता था, पर अब अपने से भिन्न मुझे कुछ नहीं दिखता—सब अपना ही रूप दिखता है। हे मुनीश्वर ! अब इस शरीर से मुझको कुछ प्रयोजन नहीं रहा। जैसे फूल से सुगन्ध लेकर पवन चला जाता है और फूल से उसका प्रयोजन नहीं रहता, वैसे ही इस देह में जो कुछ सार था, वह पाकर मैं अपने में स्थित हूँ। शरीर से मुझको कुछ प्रयोजन नहीं रहा। अब राज्य भोगने से कुछ सुख-दुःख नहीं है