योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1702, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें६०० * योगवाशिष्ठ *
जाता है, क्योंकि अभ्यास की दृढ़ता से शत्रु भी मित्र दिखने लगते हैं। जो सबमें समता का अभ्यास करता है, वही दृढ़ होता है और समताभाव से कभी चलायमान नहीं होता । हे राम ! एक राजा था, उसने अपने शरीर का मांस काटकर भूखे को दिया, परन्तु समता से चलायमान न हुआ; ज्यों का त्यों रहा । एक पुरुष को उसकी पुत्री अति प्यारी थी । उसने उसे किसी को दिया, जिसने शत्रु को दे दी, परन्तु वह ज्यों का त्यों रहा । एक और राजा था, जिसकी स्त्री अति प्यारी थी। पर उसने उसका कुछ व्यभिचार सुना और मार डाला, परन्तु समतारूप धर्म को न त्यागा ।
हे राम ! जब राजा के घर में मङ्गल उत्सव होता है, तब वह अपने नगर को भूषणों और वस्त्रों से सजाता और प्रसन्न होता है । यही अवस्था राजा जनक की देखी थी । एक समय उन्होंने सब स्थानों को अति प्रज्वलित अग्नि से जलते देखा, पर अपने समताभाव से चलायमान न हुए । एक और राजा था । उसने राज्य भी और को दे दिया और आप राज्य बिना विचरता रहा । परन्तु समताभाव से चलायमान न हुआ । हे राम ! एक दैत्य था, उसको देवताओं का राज्य मिला और फिर नष्ट भी हो गया, परन्तु दोनों भावों में वह सम ही रहा । एक बालक था, उसने चन्द्रमा को लड्डू जानकर फूँक मारी, परन्तु वह ज्यों का त्यों रहा । हे राम ! इसी प्रकार मैंने अनेक देखे हैं, जिनको सम्यक् आत्मज्ञान प्राप्त हुआ है और वे सुख-दुःख से चलायमान नहीं हुए । हे राम ! ज्ञानी और अज्ञानी का प्रारब्धभोग तुल्य है । परन्तु अज्ञानी रागद्वेष से तपता है, और ज्ञानी दृढ़ समझ के कारण संतप्त नहीं होता । सब अवस्थाओं में उसको समभाव होता है । जो फल आत्मपद का साक्षात् होने से प्राप्त होता है, वह तप, तीर्थ, दान और यज्ञ से भी नहीं प्राप्त होता । जब अपना विचार उत्पन्न होता है, तब सब भ्रान्ति निवृत्त हो जाती है और सब जगत् आत्मरूप ही दिखता है । इसी दृष्टि को लिये हुए ज्ञानी प्राकृत आचार में विचरते हैं, परन्तु निश्चय में सदा निर्गुण हैं । राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! ऐसी अद्वैत-