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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1703, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1703

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ६०१

दृष्टिनिष्ठा जिनको प्राप्त हुई है, उनको कर्म करने से क्या प्रयोजन है ? वे त्याग क्यों नहीं करते ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो पुरुष अद्वैतनिष्ठ है, उनके हृदय से त्याग-ग्रहण की भ्रान्ति चली जाती है । वे उस भ्रम से रहित होकर प्रारब्ध के अनुसार चेष्टा करते हैं। हे राम ! जो कुछ स्वाभाविक क्रिया उनकी होती है, उसका त्याग वे नहीं करते । उसमें उनको ज्ञान प्राप्त हुआ है । वे आचार करते हैं—और को ग्रहण नहीं करते और उसका त्याग नहीं करते ।

हे राम ! जिनको गृहस्थी में ज्ञान प्राप्त हुआ है, वे गृहस्थी ही में रहते हैं और उसका त्याग नहीं करते—जैसे मैं हूँ। जिनको राज्य में ज्ञान प्राप्त हुआ है, वे राज्य ही में रहे हैं—जैसे तुम हो । जो ब्राह्मण को ज्ञान प्राप्त हुआ है तो वे ब्राह्मण ही के कर्मों में निष्ठा रहे हैं। इसी प्रकार क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र जिस वर्णाश्रम में किसी को ज्ञान प्राप्त हुआ है, वह ही कर्म करता है । हे राम ! कुछ ज्ञानवान् गृहस्थी ही में रहे हैं, कुछ राज्य ही करते हैं, कुछ संन्यासी हो रहे हैं, कुछ वन में विचरते फिरते हैं, कुछ पर्वत कन्दरा में ध्यानावस्थित हो रहे हैं, कुछ नगरों में रहते रहे हैं, कुछ मथुरा, केदारनाथ, प्रयाग, जगन्नाथ, इत्यादि तीर्थों में रहे हैं, कुछ देवता का पूजन, कुछ कर्म, कुछ तीर्थ और अग्निहोत्र करते हैं और कुछ मेरी तरह जप करते हैं। कुछ अस्ताचल पर्वत में, कुछ उदयाचल पर्वत में और कुछ मन्दराचल, हिमाचल इत्यादि पर्वतों में विचरते रहे हैं। कुछ शास्त्रविहित कर्म करते रहे हैं, कुछ अवधूत हो रहे हैं; कुछ भिक्षा माँग-माँग भोजन करते रहे हैं, कुछ कठोर वचन बोलते रहे हैं, कुछ अज्ञानी की तरह विचरते रहे हैं और कुछ विद्याध्ययन इत्यादि नाना प्रकार की चेष्टा करते रहे हैं, क्योंकि उनको ये चेष्टाएँ स्वाभाविक प्राप्त हुई हैं। वे यत्न से कुछ नहीं करते । हे राम ! वे शुभकर्म करें अथवा अशुभकर्म करें, परन्तु कोई क्रिया उनका बन्धन नहीं करती । पर जो अज्ञानी हैं वे जैसे कर्म करेंगे, वैसे ही फल को भोगेंगे । जो पुण्यकर्म करेंगे तो स्वर्गसुख भोगेंगे, और पाप से नरक-दुःख भोगेंगे। जो कामना से रहित शुभकर्म करेगा, उसका अन्तः-

योगवाशिष्ठ महारामायण · पृष्ठ 1703, कुल 1734 में से · BharatKosha