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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1704, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1704

६०२ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

कारण शुद्ध होगा। वह सन्तों के संग और सतशास्त्रों से शुद्ध होगा।

हे राम ! जो अर्धप्रबुद्ध हैं, वे जो पाप करने लग जावें और आत्म-अभ्यास त्याग दें तो वे दोनों मार्गों से भ्रष्ट हो जाते हैं—न स्वर्ग को जाते हैं और न आत्मपद को प्राप्त होते हैं। तप, दान, तीर्थादि के सेवन से भी आत्मपद नहीं प्राप्त होता। जब विचार उपजता है और आत्मपद का अभ्यास होता है, तभी आत्मपद मिलता है, और जब आत्मपद प्राप्त होता है, तब मनुष्य निशङ्क हो जाता है। चेष्टाव्यवहार करता भी दीखता है, पर उसका चित्त शान्त हो जाता है। जैसे ताँबे को जब पारस का स्पर्श कराइए, तब वह सुवर्ण हो जाता है। आकार उसका वैसा ही रहता है, परन्तु ताँबे के भाव का अभाव हो जाता है। वैसे ही जब चित्त को आत्मपद का स्पर्श होता है, तब चित्त शान्त हो जाता है। परन्तु चेष्टा उसी प्रकार होती है और जगत् की सत्यता नष्ट हो जाती है। हे राम ! अब तुम जागे हो और निशङ्क हुए हो। तुम्हारा रागद्वेष नष्ट हो गया है। तुम निर्विकार आत्मपद को प्राप्त हुए हो। जन्म, मृत्यु, बढ़ना, घटना, युवा और वृद्ध होना, इन सब विकारों से रहित आत्म-पद को तुमने पाया है। सबका अधिष्ठान परम शुद्ध चैतन्य तुमको प्राप्त हुआ है। हे राम ! जो कुछ मुझको कहना था, वह तुमसे मैंने कहा। यह सार का सार आत्मपद है। जो कुछ जानने योग्य था, वह तुमने जाना। इसके उपरान्त न कुछ कहना रहा और न कुछ जानना रहा—यहाँ तक कहना और जानना है। अब तुम निशङ्क होकर विचरो। तुमको कोई संशय नहीं रहा। तुमने क्षय और अतिशय से रहित पद पाया है, अर्थात् तुमने अविनाशी और सबसे उत्तम पद पाया है।

वाल्मीकिजी बोले, हे साधु ! मुनि शार्दूल वशिष्ठजी जब इस प्रकार कहकर चुप हो रहे, तब सब सभा जो बैठी थी, वह परम निर्विकल्प पद में स्थित हो गई। जैसे वायु से रहित कमल फूल पर भौंरे स्थिर होते हैं, वैसे चित्तरूपी भ्रमर आत्मपदरूपी कमल के रस को लेते हुए स्थिर हो रहे। सबके सब ब्रह्म को जानकर ब्रह्मरूप हुए, और ब्रह्म