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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1705, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1705

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ६०३

ही में स्थित हुए। जितने मृग निकट थे, वे भी तृण का खाना छोड़कर अचल हो गये। दूसरे पशु-पक्षी भी सुनकर निस्पन्द हो रहे। स्त्रियाँ जो बालकों संयुक्त चपल थीं, वे सुनकर जड़वत् हो गई। पहले जीवन्मुक्त सिद्धों के गण मोक्ष का उपाय सुनने को आये थे उन्होंने और देवता तथा सिद्धों ने तमाल, कदम्ब, पारिजात, कल्पवृक्ष इत्यादि दिव्य वृक्षों के फूलों की वर्षा की। नगाड़े, भेरी और शंख बजने लगे। सब लोग वशिष्ठजी की स्तुति करने लगे। निदान बड़ा कोलाहल हुआ, जिससे दशों दिशा पूर्ण हो गई, ऊपर से देवताओं और सिद्धों के नगाड़ों के शब्द हुए, जिनसे पर्वत गूँज उठे और दिव्य फूलों की ऐसी सुगन्ध फैली, मानों पवन भी प्रसन्न हुआ है। तब सिद्धों ने कहा, हे वशिष्ठजी ! हमने भी अनेक मोक्ष के उपाय सुने और उच्चार कहे हैं, परन्तु जैसा तुमने कहा है, वैसा न पहले सुना है, न गाया है और न कहा है। जो तुम्हारे मुखारविन्द से श्रवण किया है, उससे हम परम सिद्धान्त को जान गये हैं। इसके श्रवण से पशु, पक्षी और मृग भी कृतार्थ हुए हैं, फिर मनुष्यों का क्या कहना। वे तो कृतार्थ ही हुए हैं। निष्पाप ज्ञान पाकर वे अवश्य मुक्त होंगे।

वाल्मीकिजी बोले, हे साधु ! ऐसे कहकर उन्होंने फिर फूलों की वर्षा की और वशिष्ठजी के चन्दन का लेप किया। जब इस प्रकार वे पूजा कर चुके, तब और जो लोग निकट बैठे थे, वे परम विस्मय को प्राप्त हुए कि ऐसा परम उपदेश वशिष्ठजी ने किया। तब राजा दशरथ उठ खड़े हुए और हाथ जोड़कर वशिष्ठजी को नमस्कार करके बोले, हे भगवन् ! तुम्हारी कृपा से हम छः ऐश्वर्यों से सम्पन्न हुए हैं। हे भगवन् ! तुमने सम्पूर्ण शास्त्र सुनाया है, जिसको सुनकर हम पूजनीय हुए हैं। इसलिए हे देव ! हम तुम्हारा पूजन किस सामग्री से करें ? ऐसा कोई पदार्थ पृथ्वी, आकाश और देवताओं के लोकों में भी नहीं दिखता, जो तुम्हारी पूजा के योग्य हो—सब पदार्थ कल्पित हैं। और जो सत्य पदार्थ से पूजा करें तो सत्य तुमहीं से पाया है। इससे ऐसा पदार्थ कोई नहीं, जो तुम्हारी पूजा के योग्य हो। तथापि अपनी-अपनी शक्ति के