योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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अनुसार हम पूजन करते हैं। तुम क्रोध न करना और हँसी भी न करना। हे मुनीश्वर ! मैं राजा दशरथ, अपने अन्तःपुर की सब स्त्रियाँ अपने चारों पुत्र, अपने सम्पूर्ण राज्य और सम्पूर्ण प्रजासहित जो कुछ मैंने लोक में यश पाया और परलोक के निमित्त पुण्य किया है, वह सब तुम्हारे चरणों में अर्पण करता हूँ। हे साधु ! इस प्रकार कहकर राजा दशरथ वशिष्ठजी के चरणों पर गिरे।
तब वशिष्ठजी बोले, हे राजन् ! तुम धन्य हो। जिनको ऐसी श्रद्धा है। परन्तु हम तो ब्राह्मण हैं। हमको राज्य क्या करना है, और हम राज्य का व्यवहार क्या जानें। कभी ब्राह्मण ने राज्य किया है ? राजा तो क्षत्रिय ही होते हैं। इसलिए तुमही राज्य कर सकोगे। यह जो तुम्हारा शरीर है, उसे मैं अपना ही जानता हूँ। और इन तुम्हारे चारों पुत्रों को मैं पहले ही से अपने जानता हूँ। मैं तो तुम्हारे प्रणाम से ही सन्तुष्ट हूँ। यह राज्य का प्रसाद मैंने तुमको ही दिया। फिर वाल्मीकिजी बोले कि जब इस प्रकार वशिष्ठजी ने कहा, तब राजा दशरथ ने फिर कहा कि हे स्वामी ! तुम्हारे योग्य कोई पदार्थ नहीं है। तुम ब्रह्माण्ड के ईश्वर हो। बल्कि तुमसे ऐसे वचन कहते भी मुझको लज्जा आती है। परन्तु योग्यता के निमित्त तुम्हारे आगे विनती की है कि मैंने मोक्ष-उपाय शास्त्र तुमसे श्रवण किया है, इसलिए अपनी शक्ति के अनुसार तुम्हारा पूजन करूँ। तब वशिष्ठजी ने कहा, बैठो, और राजा बैठ गये। फिर राम ने निरभिमान होकर कहा, हे संशयरूपी तिमिर के नाशक सूर्य ! तुम्हारा पूजन हम किस वस्तु से करें ? घर में कोई पदार्थ अपना नहीं है। हे गुरुजी ! मेरे पास और कुछ नहीं है, केवल एक नमस्कार ही है। ऐसे कहकर वे चरणों पर गिरे। उनके नेत्रों से जल बहने लगा। वे बार-बार उठते और आत्मानन्द-प्राप्ति के उत्साह से फिर गिर पड़ते थे। निदान जब वशिष्ठजी ने कहा कि बैठ जाओ तब रामजी भी बैठ गये। फिर लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, राजर्षि और ब्रह्मर्षि आदि सब अर्घ्य-पाद्य से पूजन करने लगे। सबने फूलों की वर्षा की, जिससे वशिष्ठजी का शरीर ढक गया। जब वशिष्ठजी ने हाथ से फूल हटाये, तब मुख देख-