योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1707, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ६०५
पड़ने लगा। जैसे बादलों के दूर होने पर चन्द्रमा दिखता है, वैसे ही मुख दीखने लगा। फिर वशिष्ठजी ने व्यास, वामदेव, विश्वामित्र, नारद, भृगु, अत्रि इत्यादि जो मुनि बैठे थे, उनसे कहा, हे साधु! जो कुछ मैंने सिद्धान्त के वचन कहे हैं, इनमें न्यून या अधिक जो कुछ हो, वह अब तुम कहो। जैसे जैसा स्वर्ण होता है, वैसा ही अग्नि में दिखाई देता है, वैसे ही तुम कहो। तब सबने कहा, हे मुनीश्वर! ये तुमने परम सारांश वचन कहे हैं। जो तुम्हारे कथन को न्यून या अधिक जानकर उनकी निन्दा करेगा, वह महापतित होगा। ये वचन परमपद देनेवाले हैं। हे मुनीश्वर! हमारे हृदय में भी जो कुछ जन्म-जन्मान्तर का मैल था, वह नष्ट हो गया। हम तो पूर्ण ज्ञानवान् थे, परन्तु पूर्वजन्म जो लिये हैं, इनकी स्मृति हमारे चित्त में थी कि अमुक जन्म हमने इस प्रकार पाया था और अमुक जन्म इस प्रकार पाया था, वह सब स्मृति अब नष्ट हुई है। जैसे अग्नि में डाला सुवर्ण शुद्ध होता है, वैसे ही तुम्हारे वचनों से हमारा स्मृतिरूप मल नष्ट हुआ है। अब हम जानते हैं कि न कोई जन्म था और न हमने कोई जन्म पाया है—हम अपने ही आपमें स्थित हैं। हे मुनीश्वर! तुम सम्पूर्ण विश्व के गुरु और ज्ञान-अवतार हो, इसलिए तुमको हमारा नमस्कार है। राजा दशरथ भी धन्य हैं जिनके संयोग से हमने मोक्ष उपाय सुना है। और यह रामजी, साक्षात् विष्णु भगवान् हैं।
इतना कह फिर वाल्मीकिजी बोले, कि इसी प्रकार ऋषीश्वर और मुनीश्वर वशिष्ठजी को परमगुरु जानकर स्तुति करने लगे। रामजी को विष्णु भगवान् जानकर उनकी भी स्तुति की और राजा दशरथ की भी स्तुति की, जिनके घर में विष्णु भगवान् ने अवतार लिया। फिर वशिष्ठजी की अर्घ्य पाद्य से पूजा करने लगे। आकाश के सिद्ध बोले, हे वशिष्ठजी! तुमको हमारा नमस्कार है। तुम गुरु के भी गुरु हो। हे प्रभो! जो कुछ तुमने उपदेश किया है और जो कुछ उसमें युक्ति कही है, वह अर्थात् ऐसे वचन वागीश्वरी भी कदाचित् न कह सकें। तुमको बारम्बार नमस्कार है। और चतुर्द्वीप पृथ्वी के शासक