योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1708, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें६०६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
राजा दशरथ को भी नमस्कार है, जिनके प्रसंग से हमने ज्ञान और युक्ति सुनी। राम विष्णु भगवान् नारायण हैं। ये चारों भाई परमात्मा हैं। इनको हमारा प्रणाम है। ये चारों भाई ईश्वर हैं। इन पर विष्णु भगवान् की दया है। ये जीवन्मुक्त अवस्था धारणकर बैठे हैं। वशिष्ठजी परमगुरु हैं और विश्वामित्र तप की मूर्ति हैं। वाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार जब सिद्ध कह चुके, तब वे फूलों की वर्षा करने लगे। जैसे हिमालय पर्वत पर बर्फ की वर्षा होती है और वह बर्फ से परिपूर्ण हो जाता है, वैसे ही वशिष्ठजी पुष्पों से लद गये। आकाशचारी जो ब्रह्मलोक के वासी थे, उन्होंने भी उनपर पुष्पों की वर्षा की। सभा में जो ब्रह्मर्षि आदि बैठे थे, उनका भी यथायोग्य पूजन किया। इस प्रकार जब सिद्ध पूजन कर चुके, तब कई ध्याननिष्ठ हो रहे सबके चित्त शरत्काल के आकाशसदृश निर्मल हो गये और वे अपने स्वभाव में स्थित हुए। जैसे स्वप्न की सृष्टि का कौतुक देखकर कोई जाग उठे और हँसे, तैसे ही वे हँसने लगे।
तब वशिष्ठजी ने राम से कहा, हे रघुवंशरूपी आकाश के चन्द्रमा! तुम अब किस दशा में स्थित हो और क्या जानते हो? राम बोले, हे भगवन्! सब धर्मज्ञान के समुद्र! तुम्हारी कृपा से मैं अब अपने रूप में स्थित हूँ, और कोई कल्पना मुझे नहीं रही अब मैं परम शान्ति पा गया हूँ। मुझको शेष विशेष कोई नहीं दिखता, केवल अपना रूप ही पूर्ण दिखता है—अब मुझको कोई संशय नहीं रहा, और इच्छा भी कुछ नहीं रहा। मैंने अब परम निर्विकल्प पद पाया है और कोई कल्पना मुझे नहीं फुरती। जैसे नील, पीत आदि उपाधि से रहित स्फटिक प्रकाश पाता है, तैसे ही मैं निरुपाधि स्थित हूँ, और संकल्प-विकल्प उपाधि का अभाव हो गया है। अब मैं परम शुद्ध हो गया हूँ, मेरा चित्त शान्त हो गया है। मेरी चेष्टा पूर्ववत् होगी, पर निश्चय में कुछ न उत्थान होगा। जैसे शिला में प्राण नहीं जगते, तैसे ही मुझको द्वैत कल्पना कुछ नहीं फुरती। हे मुनीश्वर! अब मुझको सब आकाशरूप दिखता है। शान्तरूप होकर परम निर्वाण हूँ। भिन्नभाव से जगत्