योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1709, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें- निर्वाण प्रकरण * ६०७
मुझको कुछ नहीं भासित होता—सब अपना रूप ही दिखता है। अब जो कुछ तुम कहो, वही करूँ। अब मुझको कोई शोक नहीं रहा। राज्य करना, भोजन, छादन, बैठना, चलना, पान करना आदि कर्म जैसे तुम कहो, वैसे ही करूँ। तुम्हारे प्रसाद से मुझको सब समान है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विश्रामप्रकटीकरणं नाम द्विशताधिकैकोनाशीतितमस्सर्गः ॥ २७६ ॥
वाल्मीकिजी बोले, हे भरद्वाज ! जब रामजी ने ऐसे कहा, तब वशिष्ठजी बोले, हे राम ! बड़ा कल्याण और प्रसन्नता की बात जो तुम अपने आपमें स्थित हुए हो। अब तुमने यथार्थ जाना है। अब और जो कुछ सुनने की इच्छा हो, सो कहो। राम बोले, हे संशयरूपी अन्धकार के नाशक सूर्य और संशयरूपी वृक्षों के नाशक कुठार ! अब तुम्हारे प्रसाद से मैं परमविश्रान्ति को प्राप्त हुआ हूँ और जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति की कल्पना से रहित हूँ। जाग्रत् जगत् भी मुझको सुषुप्ति-सा भासित होता है। और कुछ श्रवण करने की मुझे इच्छा नहीं रही। अब परम-ध्यान मुझको प्राप्त हुआ है, अर्थात् आत्मा से भिन्न कुछ वस्तु नहीं दिखती। मैं आत्मा, अज, अविनाशी, शान्तरूप और अनन्त, सदा अपने आपमें स्थित हूँ। ऐसे मुझको मेरा नमस्कार है अब प्रलयकाल का पवन चले, समुद्र उमड़े और नाना प्रकार के क्षोभ हों तो भी मेरा चित्त स्वरूप से चलायमान न होगा। जो त्रिलोकी का राज्य मुझे प्राप्त हो, तो भी मेरे चित्त में हर्ष न उपजेगा। मैं सत्तासमान में स्थित हूँ।
वाल्मीकिजी बोले, हे भरद्वाज ! जब इस प्रकार राम ने कहा, तब मध्याह्न का सूर्य सिर पर आ गया। राजा जो रत्न और मणियों के भूषण पहिनकर बैठे थे, उन मणियों की कान्ति किरणों से अति विशेष हुई और सूर्य के साथ एक हो गई-मानों ऐसे वचन सुनकर नृत्य करती हो। तब वशिष्ठजी ने कहा, हे राम ! अब हम जाते हैं, क्योंकि मध्याह्न की उपासना का समय है। अगर कुछ तुम्हें पूछना हो वह कल फिर पूछना।
तब राजा दशरथ पुत्रोंसहित उठ खड़े हुए और वशिष्ठजी का बहुत पूजन किया। जो ऋषीश्वर, मुनीश्वर और ब्राह्मण थे, उनका भी