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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1710, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1710

६०८ ✻ योगवाशिष्ठ ✻

यथायोग्य पूजन किया और मोतो और हीरों की माला, मोहरें, रुपये, घोड़े, गज, वस्त्र भूषण आदि जो ऐश्वर्य का सामग्रो है, वह अर्पण की। जो विरक्त संन्यासी थे, उनको प्रणाम करके प्रसन्न किया, और जो राजर्षि थे, उनका भी पूजन किया। तब वशिष्ठजी उठ खड़े हुए। परस्पर सबने नमस्कार किया और मध्याह्न के नौवत-नगाड़े बजने लगे। सब श्रोता उठकर विचरने लगे। कोई चले जाते थे और कोई शीश हिलाते, कोई हाथ की उँगली नचाते, नेत्रों की भौंह मटकाते परस्पर चर्चा करते जाते थे। इस प्रकार सब अपने स्थानों को गये। वशिष्ठजी सन्ध्या-उपासना करने लगे। दूसरे दिन जब श्रोता विचार-पूर्वक रात्रि को व्यतीतकर सूर्य की किरणों के निकलते ही आ पहुँचे। गगनचारी, सत्यलोक के रहनेवाले, ऋषि और देवता, भूमिवासी राजर्षि, ब्रह्मर्षि और जो श्रोता थे, वे सब आकर अपने-अपने स्थान पर बैठ गये। सबने परस्पर नमस्कार किया।

तब रामजी हाथ जोड़कर उठ खड़े हुए और बोले हे भगवन् ! अब जो कुछ मुझको सुनना और जानना रहा है, वह तुम ही कृपा करके कहो। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो कुछ सुनने योग्य था, वह तुमने सुन लिया है। अब तुम कृतकृत्य हुए हो और सब रघुवंशियों का कुल तुमने तारा है। जो आगे होंगे, उन सबको भी तुमने कृतकृत्य कर दिया है। अब तुम परमपद को प्राप्त हुए हो। अब जो कुछ तुमको पूछने की इच्छा हो, वह भी पूछ लो। हे राम ! जो सत्तासमान में स्थित हुए हो तो विश्वामित्र के साथ जाकर इनका कार्य करो और जो कुछ पूछने की इच्छा हो, वह पूछ लो। राम ने पूछा, हे भगवन् ! पहले मैं अपने को इस देह से युक्त परिच्छिन्नरूप देखता था, पर अब अपने से भिन्न मुझे कुछ नहीं दिखता—सब अपना ही रूप दिखता है। हे मुनीश्वर ! अब इस शरीर से मुझको कुछ प्रयोजन नहीं रहा। जैसे फूल से सुगन्ध लेकर पवन चला जाता है और फूल से उसका प्रयोजन नहीं रहता, वैसे ही इस देह में जो कुछ सार था, वह पाकर मैं अपने में स्थित हूँ। शरीर से मुझको कुछ प्रयोजन नहीं रहा। अब राज्य भोगने से कुछ सुख-दुःख नहीं है

योगवाशिष्ठ महारामायण · पृष्ठ 1710, कुल 1734 में से · BharatKosha