योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1711, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ [६०४]
इन्द्रियों के इष्ट अनिष्ट में मुझको कुछ हर्ष-शोक नहीं है। मैं अब सबसे उत्तमपद को प्राप्त हुआ हूँ। मैं सब कल्पना से रहित अविनाशी, अव्यक्त-रूप सब से निरन्तर सदा अपने आपमें स्थित और निराकार और निर्विकार हूँ। जो कुछ पाने योग्य था, वह मैंने पा लिया है, और जो कुछ सुनने योग्य था, वह सुना है, और जो कुछ तुमको कहना था, वह कहा है। अब तुम्हारी वाणी सफल हुई है। जैसे कोई रोगी को औषध देता है तो उस औषध से उसका रोग चला जाता है और उसका कल्याण होता है, वैसे ही तुम्हारी वाणी से मेरा संशयरूप रोग गया है। मैं अपने ज्ञान से तृप्त हुआ हूँ। अब निःशङ्क होकर अपने रूप में स्थित हूँ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे निर्वाणवर्णनं नाम द्विशताधिकाशीतितमसर्गः ॥ २८० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे महाबाहु राम ! तुम मेरे परम वचन सुनो। दृढ़ अभ्यास के लिए मैं फिर कहता हूँ। जैसे शीशे को ज्यों-ज्यों मार्जन करते हैं त्यों-त्यों उज्ज्वल होता है, वैसे ही बारम्बार सुनने से अभ्यास दृढ़ होता है। जितना कुछ जगत् दिखता है, वह सब चिदानन्दस्वरूप है। भासित भी वही वस्तु होती है, जो पहले भानरूप होती है। वह भानरूप चेतन है। इससे जो पदार्थ भासित होते हैं, वे सब चेतनरूप हैं। और जो भिन्न-भिन्न पदार्थ द्वैत की कल्पना से भासित होते हैं, वे भी वास्तव में भानरूप चेतन हैं। जैसे जो कुछ उच्चारण करते हैं, वह सब शब्द है, पर शब्दरूप एक है, पर अर्थ से भिन्न-भिन्न भासित होते हैं। जब अर्थ की कल्पना त्याग दीजिए, तब वही शब्द है, और जो अर्थ कीजिये कि यह जल है, यह पृथ्वी है, यह अग्नि है इत्यादि अनेक शब्द और अर्थ होते हैं। पर अर्थ-रहित शब्द एक ही है। वैसे ही यह सब चेतन है, पर चित्त की कल्पना से भिन्न-भिन्न पदार्थ भासित होते हैं, और कुछ वस्तु नहीं। और जो भासित होता है, वह उसी का आभास है। हे राम ! आभास भी अधिष्ठानसत्ता भासित होती है। ज्ञान में भेद है, पर स्वरूप ज्ञान में भी भेद नहीं, जिससे अर्थ भासित