योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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होते हैं। ज्ञानरूप अनुभवसत्ता है। इसमें जिस अर्थ का आभास होता है, उसी को जीव जानता है। जैसे एक ही रस्सी है, उसमें सर्प का भ्रम करे तो सर्प तो कुछ नहीं, वह रस्सी ही है, वैसे ही अर्थ-भेद ग्रहण कीजिये तो भेद है, नहीं तो ज्ञान ही है। सब पदार्थ जो दिखते हैं, वे सब ज्ञानरूप ही हैं, और कुछ बना नहीं। हे राम! स्वप्न का दृष्टान्त मैंने तुमको जताने के लिए कहा है, वास्तव में स्वप्न भी कोई नहीं। अद्वैतसत्ता ही अपने आपमें स्थित है। जैसे समुद्र सदा जलरूप है, पर द्रवता से तरङ्ग बुलबुले दिखते हैं, सो वे नानारूप नहीं, पर जल ही नाना भासित होता है, वैसे ही सब जगत् अनानारूप है, पर नाना-रूप भासित होता है। तुम अपने स्वप्न को विचारकर देखो कि तुम्हारा अनुभव ही नाना प्रकार का होकर भासित होता है, परन्तु कुछ हुआ नहीं, वैसे ही यह जाग्रत् जगत् भी तुम्हारा अपना ही रूप है, दूसरा कुछ नहीं, सदा निराकार, निर्विकार और आकाशरूप आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है।
राम ने पूछा, हे भगवन्! जो अद्वैतसत्ता निराकार, निर्विकार और सदा अपने आपमें स्थित है तो पृथ्वी कहाँ से उपजी है, जल कैसे उपजा है और अग्नि, वायु, आकाश, पुण्य, पाप इत्यादिक कल्पना चिदाकाश में कैसे उपजी है? मेरे दृढ़बोध के लिए कहिए। वशिष्ठजी बोले, हे राम! अच्छा यह तुम कहो कि स्वप्न में पृथ्वी कहाँ से उपज आती है और जल, वायु, अग्नि, आकाश, पाप, पुण्य, देश, काल, पदार्थ कहाँ से उपजते हैं? रामजी बोले, हे मुनीश्वर! स्वप्न में जो पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, देश, काल, पदार्थ दिखते हैं, वे सब आत्मरूप होते हैं। आत्मसत्ता ही ज्यों की त्यों होती है, वह तत्त्ववेत्ताओं को ज्यों की त्यों भासित होती है। पर जो असम्यक्दर्शी हैं, उनको भिन्न-भिन्न पदार्थ दिखते हैं। भासित होना दोनों का समान होता है, परन्तु जिसकी वृत्ति यथाभूत अर्थ को ग्रहण करती है, उसको ज्यों की त्यों आत्मसत्ता दिखती है, पर जिसकी वृत्ति यथाभूत अर्थ नहीं ग्रहण करती, उसको वही वस्तु और रूप होकर दिखती है। हे मुनीश्वर!