योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❉ निर्वाण प्रकरण ❉ ६११
जगत् कुछ बना नहीं; वही आत्मसत्ता स्थित है। जब कठोररूप का संवेदन फुरता है, तब पृथ्वी और पहाड़ के रूप में भासित होती है। जब द्रवता का स्पन्दन फुरता है, तब जलरूप दिखता है। जब उष्णरूप का संवेदन फुरता है, तब अग्नि भासित होती है इसी प्रकार वायु, आकाश आदिक पदार्थों में जैसे फुरना होता है, वैसे ही दिखता है। जैसे जल तरङ्गरूप दिखता है, परन्तु जल से भिन्न कुछ नहीं, जल ही रूप है, वैसे ही आत्मसत्ता जगतरूप दिखती है, पर वही रूप है। जगत् कुछ वस्तु नहीं। ये सब गुण और क्रिया आकाश में हैं, वास्तव में कुछ नहीं, क्योंकि कारणरहित असत्यरूप है। यह अहं त्वं आदि सब जगत् आकाशरूप है, कुछ बना नहीं। आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। और कोई आधार नहीं है। अद्वैतसत्ता सदा अपने आपमें स्थित है। और नानारूप भासित होती है। जब चित्त संवेदन फुरता है, तब पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, पदार्थ, देश, काल होकर भासित होता है। कहीं सब आत्मा का ज्ञान फुरता है और कहीं परिच्छिन्नता भासित होती है, परन्तु वास्तव में कुछ बना नहीं, वही वस्तु है। जैसे उसमें फुरना होता है, वैसे ही होकर भासित होता है। अनुभवसत्ता परम आकाशरूप है, जिसमें आकाश भी आकाशरूप है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे चिदाकाशजगदेकताप्रतिपादनं नाम द्विशताधिकैकाशीतितमसर्गः ॥ २८१ ॥
रामजी बोले, हे भगवन् ! अब यह प्रश्न है कि जो जाग्रत् और स्वप्न में कुछ भेद नहीं और परम आकाशरूप है तो उस सत्ता का जाग्रत् और स्वप्न के शरीर से कैसे संयोग है। वह तो निरवयव और निराकार है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ये सब आकार जो तुमको दिखते हैं, वे सब आकाशरूप हैं और आकाश में आकाश ही स्थित है। सर्ग के आदि में आकार का अभाव था। वही अब भी जानो कि उपजा कोई नहीं, परम आकाशसत्ता अपने आपमें स्थित है। जब उस अद्वैतसत्ता चिन्मात्र में चित्त किञ्चन होता है; तब वही सच्चा आकार की नाईं दिखती है, परन्तु कुछ हुआ नहीं, आकाश ही रूप है। जैसे