योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1714, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें६१२ ॐ योगवाशिष्ठ ॐ
जीव स्वप्न में शरीरों का अनुभव करता है, पर वे कुछ आकार तो नहीं होते, केवल आकाशरूप होते हैं, वैसे ही यह जगत् भी निराकार है, परन्तु फुरने से आकार होकर भासित होता है। जिन तत्त्वों से शरीर होता है; वे तत्त्व ही नहीं उपजे तो शरीर की उत्पत्ति कैसे कहूँ? हे राम! और जगत् कुछ उपजा नहीं, ब्रह्म ही किञ्चन से जगतरूप भासता है। जैसे जल और द्रवता में भेद नहीं, और जैसे आकाश और शून्यता में भेद नहीं, वैसे ही ब्रह्म और जगत् में भेद नहीं है। संवेदन में अर्थ-संकेत है। जब संवेदन न फुरे, तब अर्थसंकेत न हो। भिन्न-भिन्न वस्तु एक ही सत्ता के नाम हैं। भिन्न-भिन्न नाम तब भासित होते हैं, जब वेदन जगता है, नहीं तो शब्द कल्पित जल के तुल्य है—वास्तव में वस्तु से भेद नहीं है। जैसे वायु और स्पन्दन में भेद नहीं है। स्पन्दन भासित होती है, निस्पन्द नहीं, परन्तु दोनों वायु के ही रूप हैं, वैसे ही स्पन्दन से ब्रह्म में किञ्चन जगत् दिखता है और जब संवेदन नहीं फुरता तब जगत् नहीं भासित होता। परन्तु दोनों रूप ब्रह्म के ही हैं। ब्रह्म और जगत् में भेद कुछ नहीं है। जैसे एक निद्रा के दो रूप होते हैं—एक स्वप्न और दूसरा सुषुप्ति—परन्तु दोनों एक निद्रा के ही पर्याय हैं वैसे ही जगत् का होना और न भासित होना एक ही ब्रह्म की दोनों संज्ञा हैं। चाहे ब्रह्म कहो और चाहे जगत् कहो, ब्रह्म और जगत् में भेद कुछ नहीं, ब्रह्म ही जगतरूप होकर भासित होता है।
जैसे निर्मल अनुभव से स्वप्न में शिला प्रकट होती है, पर वह शिला तो स्वप्न में कुछ उपजी नहीं, अपना अनुभव ही शिलारूप दिखता है, वैसे ही ये सब आकार जो दिखते हैं, वे आकाशरूप हैं और आत्मसत्ता ही आकाशरूप जगत् होकर दिखती है। जगत् कुछ उपजा नहीं और न सत्य है, न असत्य है, न आना है, न जाना है, केवल आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। राम ने पूछा, हे मुनीश्वर! पहले तुमने मुझसे अनेक सृष्टियाँ कही हैं। कई जल में, कई अग्नि में, कई पृथ्वी में, कई वायु में, कई पहाड़ और पत्थरों में और कई आकाश में पक्षी सी इत्यादि नाना प्रकार की सृष्टियाँ तुमने कही हैं। अब यह प्रश्न है कि हमारी