योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1715, कुल 1734 में से
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सृष्टि किससे उत्पन्न हुई है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! तुम तो वही प्रश्न करते हो, जो अपूर्व होता है, जो पहले देखा-सुना न हो और जगत् में जाना भी न हो । इस जगत् की उत्पत्ति वेदपुराण तो यों ही कहते हैं और लोक में भी प्रसिद्ध है कि ब्रह्मा से हुई है, पर वास्तव में चिदाकाशरूप है, कुछ उपजी नहीं । ये दोनों प्रकार मैंने तुमसे कहे हैं । पर उनको तुम सुनकर भी प्रश्न करते हो, इसलिए तुम्हारा प्रश्न ही नहीं बनता । राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! यह सृष्टि कितनी है, कहाँ तक चली जाती है और कितने काल तक रहेगी ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जितनी सृष्टि तुम जानते हो, वह है नहीं—ब्रह्म ही ब्रह्म में स्थित है—और सृष्टियाँ बहुत हैं, परन्तु वास्तव में कुछ हुई नहीं । वे आदि, अन्त और मध्य से रहित हैं । वही ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है । ये जितनी सृष्टियाँ हैं, सो आभासमात्र हैं । ब्रह्म आदि, अन्त और मध्य से रहित है, उसका आभास भी वैसा ही है ।
जैसे जितना वृक्ष होता है उतनी ही छाया होती है, वैसे ही ब्रह्म का आभास सृष्टि है और वास्तव में पूछो तो आभास भी कोई नहीं, ब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है और वही अपने को जगतरूप देखता है—ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं । जैसे स्वप्न के पुर में पर्वत, नदी आयुध आदि नाना प्रकार के व्यवहार के रूप रखकर आत्मसत्ता ही स्थित होती है, और कुछ नहीं बना, और जैसे संकल्पनगर दिखता है, वैसे ही इस जगत् को भी जानो, क्योंकि और कुछ बना नहीं, आत्मसत्ता ही जगतरूप होकर भासित होती है । जगत् यदि किसी कारण से उपजा होता तो सत् होता है । पर इसका कारण कोई नहीं पाया जाता, इसलिए असत् है । इसका न कोई निमित्तकारण और न समवायकारण पाया जाता है । हे राम ! जो किसी कारण से न उपजा हो और दिखे, उसको स्वप्न-पुर सदृश आकाशमात्र जानो । जिसमें आभास भासित होता है, वह अधिष्ठान सत्ता है । जैसे रस्सी में सर्प दिखता है, वह सर्प नहीं, रस्सी ही सर्परूप होकर दिखती है, वैसे ही जगत् का अधिष्ठान ब्रह्मसत्ता सत्य है और शुद्ध, निर्दुःख, अच्युत, विज्ञान सदा अपने आपमें स्थित