योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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है। वही सत्ता जगतरूप होकर दिखता है। जैसे जल ही तरङ्गरूप होकर दिखता है, वैसे ही ब्रह्म ही जगतरूप होकर दिखता है। हे राम! यह जगत् ब्रह्म का हृदय है, अर्थात् उसी का स्वभाव है। ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं। ज्ञानी को सर्वदा ऐसे ही दिखता है। जैसे स्वप्न से जागकर सब अपना रूप ही भासित होता है, वैसे ही यह जगत् अपना रूप है।
इति श्रीयोग० जगदभाववर्णनं नाम द्विशताधिकद्व्यशीति- तमस्सर्गः ॥ ॥ २८२ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! इस जगत् का कारण कोई नहीं। जब जगत् ही नहीं तो कारण कैसे हो, और कारण नहीं तो जगत् कैसे हो? इसमें सब ब्रह्म ही है। इसी विषय पर एक उपाख्यान है, उसे सुनो। हे राम! कुशद्वीप के पूर्व और पश्चिम दिशा के बीच सुवर्ण की ऐलवती नगरी महा उज्ज्वलरूप है। उसमें बड़े-बड़े ऊँचे खम्भे बने हैं, मानो पृथ्वी और आकाश को उन्होंने ही भर दिया है। उस नगरी का एक प्राक्पति राजा था। एक समय में आकाशमार्ग से शीघ्र वेग से उसके घर में आया। उसने भली प्रकार अर्घ्य-पाद्य से प्रीतिपूर्वक मेरा पूजन किया और सिंहासन पर बैठाया। फिर मुझसे एक महाप्रश्न किया, जिस प्रश्न से बड़ा और कठिन कोई प्रश्न नहीं हो सकता। राजा बोले, हे भगवन्! तुम संशयरूपी तम के नाशक सूर्य हो। मुझको एक संशय है, उसे दूर करो। हे मुनीश्वर! प्रथम तो यह प्रश्न है कि जब महाप्रलय होता है तब कार्य कारण और सब शब्द की कल्पना का अभाव हो जाना है। उसके बाद महाआकाशसत्ता शेष रहती है, जिसमें वाणी की भी गति नहीं। वह अवाच्य पद है। तब उससे फिर सृष्टि कैसे उत्पन्न होती है? वहाँ उपादानकारण और निमित्तकारण तो कोई नहीं रहता, तब सृष्टि कैसे होती है? श्रुति और पुराणों में सुनता हूँ कि महाप्रलय से फिर सृष्टि उत्पन्न होती है।
दूसरा प्रश्न यह है कि जम्बूद्वीप में कोई मृतक हुआ अथवा किसी और ठौर गया हुआ मृतक हुआ, तो उसका वह शरीर तो वहीं भस्म हो जाता है, पर वह परलोक में पुण्य-पाप का फल सुख-दुःख भोगता