योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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है। तो जिस शरीर से भोगता है, उस शरीर का कारण तो कोई नहीं हुआ? जो तुम कहो कि पुण्य और पाप ही उस शरीर का कारण हैं, तो पुण्य-पाप तो आप ही निराकार हैं। उनसे साकरूप शरीर कैसे उपजे? जो तुम कहो कि परलोक कोई नहीं और पुण्य-पाप भी कुछ नहीं, तो श्रुति और पुराणों के वचनों से विरोध होता है, क्योंकि वे सभी वर्णन करते हैं कि जीव मरकर परलोक जाता है और जैसे कर्म किये हैं वैसा ही फल भोगता है। जिस शरीर से कर्मफल भोगता है, उसका कारण तो कोई नहीं है? और न कोई पिता है, न माता है। फिर वह शरीर कैसे उत्पन्न हुआ? तीसरा प्रश्न यह है कि जब यह जीव परलोक में जाता है तो उसके लिए दान-पुण्य करता है। तो उस दान-पुण्य का फल उसको कैसे प्राप्त होता है? चतुर्थ प्रश्न यह है कि महाप्रलय के पश्चात् जो ब्रह्मा उत्पन्न हुआ है, उसका नाम स्वयंभू कैसे हुआ? जो महाप्रलय में न उपजा हो और अपने आप ही उपजे, वह स्वयंभू कहलाता है। पर महाप्रलय में तो केवल 'अद्वैत' शेष रहा था। उससे जो उत्पन्न हुआ, उसे स्वयंभू कैसे कहिये? जो कहो कि स्वयंभू अपने आपसे उपजता है, तो अपना आप आत्मा है, जो सबका अपना आप है। अब क्यों नहीं उससे ब्रह्मा उत्पन्न होता है?
पाँचवाँ प्रश्न यह है कि एक पुरुष था, मान लीजिए, जिसका एक मित्र और एक शत्रु था। उन दोनों ने प्रयागक्षेत्र में जाकर करवट* ली। मित्र ने यह वाञ्छा की कि मेरा मित्र चिरकाल जीता रहे और चिरंजीवी हो और शत्रु ने यह संकल्प किया कि मेरा शत्रु इसी समय मर जावे। हे मुनीश्वर! एक ही समय में दो फल कैसे हों? छठा प्रश्न यह है कि सहस्रों मनुष्य ध्यान लगाये बैठे हैं कि हम इसी आकाश के चन्द्रमा हों। तो एक ही आकाश में सहस्रों चन्द्रमा कैसे होंगे। सप्तम प्रश्न यह है कि सहस्रों पुरुष यही ध्यान लगाये बैठे हैं कि एक सुन्दर स्त्री जो बैठा है, वह हमको मिले; पर वह स्त्री पतिव्रता है। उसके सहस्र भर्ता एक काल में कैसे होंगे? अष्टम प्रश्न यह है कि एक पुरुष था,
* काशी-करवट—किसी कामना की पूर्ति के लिए प्राण त्याग को करवट लेना कहा जाता था।