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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1718, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1718

६१६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

उसको किसी ने वर दिया कि तुम जाकर मृतक हो और सप्तद्वीप का राज्य करो, और किसी ने शाप दिया कि तेरा जीव अपने ही घर में रहेगा और मरने पर बाहर न जावेगा । तो ये दोनों बातें एक ही काल में कैसे होंगी ? नवम प्रश्न यह है कि एक काष्ठ का खम्भा था, उसको एक ने कहा कि यह सुवर्ण का हो जायगा और वह सुवर्ण का हो गया; तो सुवर्ण कैसे उत्पन्न हुआ ? उसका कारण कोई न था—कारण बिना कार्य कैसे उत्पन्न हुआ ? जैसा अन्न का बीज बोते हैं, वैसा ही अन्न उत्पन्न होता है, और अन्न नहीं उगता । तो काष्ठ से स्वर्ण कैसे उत्पन्न हुआ ? जो कहो, संकल्प से उपजा, तो हम भी संकल्प करते हैं कि अमुक कार्य ऐसे हो, पर वह क्यों नहीं होता ? इसलिए जाना जाता है कि संकल्प से भी कुछ उत्पन्न नहीं होता । हे मुनीश्वर ! जिस प्रकार यह वृत्तान्त है सो कहो । एक कहते हैं कि पहले असत् ही था । तो असत् से जगत् की उत्पत्ति कैसे हुई ? यह मुझको संशय है, इसको दूर करो । जो कोई सन्त के निकट आता है तो सत्संग निष्फल नहीं जाता, इसलिए कृपा करके कहो ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे प्रश्नवर्णनं नाम द्विशताधिकत्र्यशीतितमसर्गः ॥ २८३ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब इस प्रकार उसने मुझसे अपने संशयों का समूह कहा, तब मैंने उससे कहा, हे राजन् ! ये सब संशय जो तुझको हैं, उन्हें मैं दूर करूँगा, जैसे सारे अन्धकार को सूर्य नष्ट करते हैं । हे राजन् ! यह सब जगत् जो तुमको दिखता है, वह ब्रह्मरूप है और सदा अपने आपमें स्थित है । जब उसमें चित्त स्फुरता है तब वहाँ चित्त संवेदन जगतरूप होकर दिखता है । इसमें जो कुछ आकार दिखते हैं, वे सब चिन्मात्ररूप हैं । न कोई कार्य है और न कारण । और जो तुम प्रत्यक्ष प्रमाण से संशय करो कि सब चिन्मात्ररूप है तो जब यह शरीर मृतक हो जाता है, तब चेतना क्यों नहीं; चाहिए कि उस काल में भी उसमें ज्ञान हो । हे राजन् ! इसका उत्तर यह है कि जब जाग्रत का अन्त होता है, पर स्वप्न नहीं आता, तब शुद्ध चिन्मात्र