योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ६१७
रहता है। फिर जब उसमें स्वप्न की सृष्टि दिखती है तो उस सृष्टि में कई चेतन दिखते हैं, कई मृतक दिखते हैं, कई जड़ दिखते हैं और स्थावर-जङ्गम नाना प्रकार की सृष्टि दिखती है। परन्तु वह और कुछ नहीं, वही चिन्मात्र स्वरूप है, जो अनुभवरूप हो भासित होता है। कहीं चेतन बोलते और चलते दिखते हैं, परन्तु है वही। जो चेतनता न होती तो कैसे दिखते ? जिससे भासित होते हैं, उसी से सब चेतन हैं। वैसे ही इस जगत् में भी कहीं प्राणी बोलते, चलते दिखते हैं और कहीं शव दिखते हैं, परन्तु सब वही चिन्मात्रसत्ता है। जैसा-जैसा संकल्प उसमें उठता है, वैसा ही दिखता है।
हे राजन् ! जैसे प्रथम प्रलय से सृष्टि उत्पन्न हुई थी, वैसे ही उत्पन्न होती है। यह सृष्टि किसी का कार्य नहीं, और किसी का कारण भी नहीं—बिना कारण उपजी भासित होती है। हे राजन् ! जो महाप्रलय में शेष रहता है, वह चिन्मात्र है। उस चिन्मात्रसत्ता से जो प्रथम शुद्ध संवेदन उपजा है, वह विराट्रूप ब्रह्मा होकर स्थित हुआ, और उसी ने जगत् की कल्पना की है। उसमें उसने नीति रची है कि यह पदार्थ इस प्रकार हो, वैसा ही चित्तसंवेदन में दृढ़ होकर भासित हुआ है। उसी का नाम जगत् है। वही आत्मसत्ता किंचनरूप होकर जगतरूप दिखती है। हे राजन्, जैसे तुम्हारे संकल्प और स्वप्न की सृष्टि का आदि शुद्ध आत्मसत्ता थी और वही फुरने से पदार्थरूप होकर भासित होती है, वैसे ही इसे भी जानो। पर वास्तव में न कोई कार्य है और न कोई कारण। जैसे स्वप्न की सृष्टि अकारण होती है, वैसे ही यह जगत् भी अकारण और आदि-अन्त के विचार से रहित है। जो वर्तमान प्रत्यक्ष प्रमाण को मानते हैं, उनको कार्य और कारण प्रत्यक्ष दिखते हैं और उनके वचन भी निरर्थक हैं। जैसे अन्धे कूप के मेढक शब्द करते हैं, वैसे ही वे भी निरर्थक प्रत्यक्ष प्रमाण से कार्यकारण के संबंध में वाद करते हैं। उनको हमारे वचन सुनने का अधिकार नहीं और हमारे लिए भी उनके वचन सुनने के योग्य नहीं हैं।
हे राजन् ! जिस शास्त्र के सुनने और जिस गुरु के मिलने से सम्पूर्ण