योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1720, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें६१ = ॐ योगवासिष्ठ ॐ
संशय निवृत्त न हों, उस शास्त्र और गुरु का कहना भी अन्धकूप के मेढक की टरटर जैसा व्यर्थ है। जो परमार्थसत्ता से विमुख हैं, उनका यह भ्रम अपने में भासित होता है। ऐसे लोग शरीर के मृतक होने पर अपने को मरना जानते हैं और फिर जब वासना के अनुसार शरीर उपजना और जीना है, तब मानते हैं कि अब हम उपजे हैं। फिर अपने पुण्य-पाप कर्मों का अनुभव करते हैं। जैसे स्वप्न में कोई अपने साथ शरीर देखता है, वैसे ही परलोक में जीव को अपने साथ शरीर भासित हो आता है। वैसे ही यह शरीर भी भासित हो आया है। कोई इसका कारण नहीं है। यह न पञ्चभौतिक है, न इसका शरीर है और न किसी कारण से प्राणी उपजे हैं। अपना ही कल्पना आकाररूप होकर दिखती है। आकार कोई और नहीं, केवल ब्रह्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है, और जैसा संकल्प उसमें दृढ़ होता है, वैसा पदार्थ प्रकट होता है। हे राजन् ! जो तू इस जगत् को सत्य मानता है तो सब कुछ सिद्ध होता है। शरीर भी है, परलोक भी है और नरक-स्वर्ग भी है। जैसा यह लोक है, वैसा ही परलोक है। जो यह लोक निश्चय में सत्य है तो वह लोक भी सत्य होकर भासित होगा, और प्राणी जैसा कर्म करेगा, वैसा ही फल भोगेगा।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे प्रश्नोत्तरवर्णनं नाम द्विशताधिकचतुर्विंशतितमःसर्गः ॥ २४४ ॥
वशिष्ठजी बोले हे राजन् ! यह सब जगत् जो तुझको दिखता है, वह केवल संकल्पमात्र है। जैसे कोई बालक अपने मन में वृक्ष और उसमें फूल, फल और टाम की कल्पना करे, सो संकल्पमात्र है, वैसे ही यह जगत् भी संवेदनरूपा ब्रह्मा ने कल्पित किया है और उनके मन में फुरता है। अतएव संकल्परूप है। जैसे उसने संकल्प किया है, वैसे ही स्थित है और जैसे उसमें क्रम रचा है कि इस प्रकार यह पदार्थ होगा वह वैसे ही स्थित है। देश, काल, पदार्थ भी वैसे ही स्थित हैं। इसका नाम नीति या नियति है। हे राजन् ! तूने प्रश्न किया था कि जो पुरुष अरूप है और दूर है, यदि उसके लिए किसी ने दिया तो उसको कैसे