योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1721, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६१६
पहूँचता है और अरूप और स्वरूप का कैसे संयोग है ? इसका उत्तर यह है कि जो कोई शुद्ध संवेदन पुरुष है, उसको सब पदार्थ निकट भासित होते हैं, और जो कोई पुरुष मनोराज्य की कल्पना करता है और उसमें बड़ा देश रचता है, वह दूर से दूर मार्ग है, तो जो उस देश के वासी हैं, उनको अपने देश की अपेक्षा दूसरा देश दूर से दूर है, परन्तु जिसका मनोराज्य है, उसको तो सब निकट है और अपना ही रूप है । इस प्रकार जो शुद्धसंवेदनरूप है, उसके लिए जो कोई देता है—चाहे ईश्वर के लिए और चाहे देवता के लिए—उसको निकट से निकट सब अपने में भासित होता है । आदि नियति इसी प्रकार हुई है कि शुद्धसंवेदन को सब अपने निकट से निकट ही भासित होता है, क्योंकि सब संकल्प है, और जैसी रचना संकल्प में रचती है, वैसी ही होती है—संकल्प में क्या नहीं होता खम्भे का प्रश्न जो तुमने किया है कि काष्ठ का था सुवर्ण का कैसे हो गया, उसका उत्तर भी सुनो ।
हे राजन् ! आदि जो संवेदनरूप ब्रह्मा है उसने अपने मनोराज्य में नियति की है कि तपादिक से वर और शाप सिद्ध होता है । उसके कहे से जो काष्ठ का खम्भा स्वर्ण का हो गया तो तू विचारकर देख कि किस कारण से काष्ठ का सुवर्ण हुआ । वह केवल संकल्पमात्र है जो संकल्प से भिन्न कुछ होता तो काष्ठ का सुवर्ण न होता । यह सब विश्व संकल्परूप है, जैसा संकल्प दृढ़ होता है, वैसा ही दिखता है । जैसे तू अपने मनो-राज्य में संकल्प करता है कि यह ऐसे रहे और जो उससे और प्रकार करे तो भी हो जाय, वह होता है, वैसे ही वर और शाप भी और प्रकार हो जाते हैं । न और कोई जगत् है, न कार्य है । और न कारण है । वही आत्मसत्ता ज्यों की त्यों है । जैसा संकल्प जिसमें फुरता है, वैसा ही भासित होता है । तू पूछता है कि असत् से फिर जगत् कैसे उत्पन्न होता है । इसका उत्तर यह है कि जो आप ही न हो उसमें जगत् कैसे प्रकटे ? हे राजन् ! असत् इसी का नाम है । जगत् असत् था, इस-लिए श्रुति ने उसे असत् कहा । आदि असत् था, इसलिए जगत् की असत्यता कही है । पर आत्मा तो असत्य नहीं होता ।