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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1722, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1722

६२० 卐 योगवाशिष्ठ 卐

सबका शेषभूत आत्मा है। जब उसमें संवेदन फुरता है तब ब्रह्म अलक्ष्यरूप हो जाता है। परन्तु उस संवेदन के फुरने और मिटने में ब्रह्म ज्यों का त्यों है। उसका अभाव नहीं होता—जैसे जल में तरङ्ग उपजता है और फिर लीन हो जाता है, परन्तु उसके उपजने और मिटने में जल ज्यों का त्यों है और तरङ्ग उसके आभास जगते हैं। जैसे तू मनोराज्य से एक नगर की कल्पना करे और फिर वह संकल्प छोड़ दे, तब संकल्परूप नगर का अभाव हो जाता है, परन्तु वह सदा अविनाशी रहता है। जैसे स्वप्न की सृष्टि उपजती है और लीन भी हो जाती है, परन्तु अधिष्ठान ज्यों का त्यों है, और जैसे रत्नों का प्रकाश उठता है और लीन भी हो जाता है परन्तु रत्न ज्यों का त्यों होता है, वैसे ही आत्मा विश्व के भाव-अभाव में ज्यों का त्यों रहता है; पर उसका आभास जगत् उपजता-मिटता दिखता है। उपजता है तब उत्पत्ति दिखती है, और जब मिटता है तब प्रलय हो जाता है। परन्तु ये दोनों केवल आभास हैं। जैसे वायु फुरता है तब दिखता है और ठहर जाना है तब नहीं दिखता; परन्तु वायु एक है, वैसे ही आत्मा एक ही है। फुरने का नाम उत्पत्ति है और न फुरने का नाम जगत् का प्रलय है। सो सब किचनरूप है। इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाण० द्विशताधिकपञ्चाशीतितमसर्गः॥२८५॥

वशिष्ठजी बोले, हे राजन्! तूने प्रयाग के जो दो पुरुषों का प्रश्न किया है, उसका उत्तर सुन। जो उसका शत्रु बन गया था, वह तो उसका पाप था और जो उसका मित्र बन गया था वह उसका पुण्य था। प्रयागतीर्थ धर्मक्षेत्र था। हे राजन्! पापरूप वासना के अनुसार मृत्यु दिखती है, पर पुण्यरूपी मित्र पापरूपी शत्रु को रोकता है। और पुण्यरूपी तीर्थ के बल से हृदय में अल्प पाप वेग से भागता भासित होता है। जब मृत्यु आती है, तब वह अपने को मरता जानता है और भाईजन कुटुम्बी रुदन करते हैं। पर जब अपनी ओर देखता है तब जानता है कि मैं तो मरा नहीं। जब मृतक मार्ग की ओर देखता है, तब अपने को मरा जानता है और भाई-परिजन रुदन करते हैं। इस प्रकार उसको मरना दिखता है और यह देखता है कि भाई-परिजन उसे