योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1723, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६२१
जलाने चले हैं; उन्होंने अग्नि में मुझको डाला है और मैं जलता हूँ। जब फिर पुण्य की ओर देखता है, तब जानता है कि मैं मरा नहीं, जीता हूँ। और जब फिर पाप की ओर देखता है, तब जानता है कि मैं मरा हूँ और मुझको यमदूत ले चले हैं; यह परलोक है और यहाँ मैं सुख-दुःख भोगता हूँ। जब फिर पुण्य की ओर देखता है, तब जानता है कि मैं मरा नहीं, जीता हूँ; ये मेरे भाईबंधु बैठे हैं और वहाँ मेरा व्यवहार चेष्टा है। पुरुष इस प्रकार दोनों अवस्थाओं को देखता है। जैसे संकल्प-पुर और स्वप्ननगर में उभय अवस्था देखे। एक ही पुरुष नाना प्रकार की चेष्टा देखता है। कहीं अपने को जीता देखता है, कहीं मृतक देखता है; कहीं व्यवहार देखता है और कहीं निर्व्यापार इत्यादि। ये नाना प्रकार की चेष्टाएँ एक ही पुरुष में होती हैं। वैसे ही एक ही पुरुष को पुण्य-पाप की वासना से जीना-मरना दिखता है।
हे राजन् ! यह सम्पूर्ण जगत् संकल्पमात्र है। जैसा संकल्प दृढ़ होता है, वैसा ही रूप भासित होता है। परलोक जाना भी अपनी वासना के अनुसार भासित होता है। पुत्र-बान्धव भी उसकी पुण्य-पाप-वासना में स्थित हैं। वे जो कुछ इसके लिए करते हैं, उनसे यह सुख, दुःख, नरक, स्वर्ग भोगता है। पर वास्तव में कोई बान्धव और पुत्र नहीं है। उसकी वासना ही नाना प्रकार के आकार रखकर स्थित हुई है। हे राजन् ! सहस्र चन्द्रमा के विषय में तूने जो प्रश्न किया है, उसका उत्तर सुन। सहस्र जीव भी इसी आकाश में स्थित होते हैं और अपनी-अपनी वासना से कलासंयुक्त चन्द्रमा होकर विराजते हैं; परन्तु एक को दूसरा नहीं जानता, परस्पर अज्ञात हैं—जो अन्तर्वाहक दृष्टि से देखे, उसको दिखते हैं। हे राजन् ! जो कोई ऐसी भावना करे कि मैं उनके मण्डल को प्राप्त होऊँ तो तत्काल ही पहुँच जाता है। जैसे एक ही घर में बहुत मनुष्य सोये हों तो उनको अपने-अपने स्वप्न की सृष्टि दिखती है और वह अन्योन्य विलक्षण होती है—एक की सृष्टि को दूसरा नहीं जानता, वैसे ही एक आकाश में सहस्र चन्द्रमा बनते हैं। जैसे इन्द्र ब्राह्मण के दस पुत्र दस ब्रह्मा हो बैठे थे, वैसे ही जिस रूप की कोई तीव्र भावना