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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1724, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1724

६२२ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

करता है, वही हो जाना है । जो कोई भावना करे कि हम इसी मन्दिर में सप्तद्वीप का राज्य करें, तो वैसा ही हो जाता है; क्योंकि अनुभव एक कल्पवृक्ष है, उसमें जैसी तीव्र भावना होती है, वैसी ही होकर दिखती है ।

वर के बल से उस पुरुष को सप्तद्वीप का राज्य प्राप्त हुआ और शाप के कारण उसका जीव उसी घर में रहकर द्वीप का राज्य करता रहा । जैसे स्वप्न में राज्य करते हैं, वैसे ही अपने घर में अपना संवेदन ही सृष्टिरूप होकर भासित होता है । इसी प्रकार जो एक स्त्री की भावना करके सहस्र पुरुष ध्यान लगाये बैठे थे कि हम उसके भर्त्ता हों, वैसा भी हो जाता है । हे राजन् ! उनकी जो तीव्र भावना है, वही स्त्री का रूप रख कर उनको प्राप्त होगी । वे जानेंगे कि वही स्त्री हमको प्राप्त हुई है । यह जगत् केवल संकल्पमात्र है, संकल्प से भिन्न कुछ वस्तु नहीं । सब चिदाकाशरूप है, अपने ही अनुभव से प्रकट होता है । जैसा संकल्प उसमें फुरता है, वैसा ही होता दिखता है । पृथ्वी, जल, तेज आदि तत्त्व कोई नहीं, आत्मसत्ता ही इस प्रकार स्थित है । वह परम शान्त, निराकार, निर्विकार और अद्वैतरूप है । राजा बोले, हे मुनीश्वर ! जगत् के आदि में जो आत्मसत्ता थी, वह किस आकार की देह में स्थित थी ? देह बिना तो सत्ता स्थित नहीं होती । जैसे आधार बिना दीपक नहीं रहता, आधार होता है तो उसमें जगता है, वैसे ही आत्मसत्ता किसमें स्थित थी ? वशिष्ठजी ने कहा, हे राजन् ! जितने आकार तुझको दिखते हैं और जिनको देखकर तूने प्रश्न उठाया है, वे हैं नहीं, ब्रह्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है । जिन तत्त्वों से बना शरीर दिखता है, वे भी मृगतृष्णा के जल सदृश हैं । जैसे रस्सी में सर्प, सीपी में रूपा, आकाश में दूसरा चन्द्रमा भ्रममात्र है—क्योंकि इनका अत्यन्त अभाव है—वैसे ही ये भूतों (तत्त्वों) के आकार ब्रह्म में भ्रम से दिखते हैं—ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है । तूने पूछा था कि जो स्वयंभू अपने आपसे उपजता है तो अब क्यों नहीं उपजता, सो हे राजन् ! उसके सदृश कई उत्पन्न होते हैं । पर वास्तव में कुछ उपजा नहीं । नाना प्रकार का