योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ६२३
भासित होता है, परन्तु नाना प्रकार नहीं हुआ । जैसे स्वप्न में सदा तू देखता है कि अद्वैत अपने आप ही नानारूप होकर दिखता है और पर्वत पर दौड़ता फिरता है, तो वह किस शरीर से दौड़ता है और क्या रूप होता है ? जैसे वह पर्वत और शरीर आकाशरूप होता है और भ्रम से पिण्डाकार दिखता है, वैसे ही यह जगत् भी आकाशरूप है, भ्रम से पिण्डाकार दिखता है ।
हे राजन् ! तू अपने स्वभाव में स्थित होकर देख कि यह सब जगत् तेरा अनुभव आकाश है । स्वप्न का दृष्टान्त भी मैंने तेरे चेतने के लिए कहा है । स्वप्न भी कुछ नहीं, सदा आत्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है । जब उसमें आभास संवेदन फुरता है, तब वही जगतरूप हो भासती है और जब आभास संकल्प मिट जाता है तब प्रलयकाल भासता है ? वास्तव में न कोई उत्पन्न होता है और न प्रलय होता है । आत्मसत्ता ही ज्यों की त्यों स्थित है । जैसे एक निद्रा के दो रूप होते हैं—एक स्वप्न और दूसरा सुषुप्ति, पर जाग्रत् में ये दोनों आकाशमात्र होती हैं, वैसे ही आभास की दो संज्ञा होती हैं—एक जगत् और दूसरी महाप्रलय । पर आत्मरूपी जाग्रत् में दोनों का अभाव हो जाता है । हे राजन् ! तू स्वरूप में जागकर और कलना को त्यागकर देख कि सब आत्मरूप है—और कुछ नहीं । हे राम ! इस प्रकार मैं राजा से कहकर उठ खड़ा हुआ । तब उसने भली प्रकार प्रीतिसंयुक्त मेरा पूजन किया । जब वह पूजन कर चुका, तब मैं जिस कार्य के लिए आया था, वह कार्य करके स्वर्ग को चला गया ।
इति श्रीयो० राजप्रश्नो० वर्णनंनामद्विशताधिकषड्शीतितमस्सर्गः॥६॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह सब जगत् चिदाकाशरूप है, दूसरा कुछ बना नहीं । राम ने पूछा, हे भगवन् ! तुम कहते हो कि सब चिदाकाश है, बना कुछ नहीं, तो सिद्ध, साधु, विद्याधर, लोकपाल, देवता इत्यादि जो दिखते हैं, वे कुछ बने क्यों नहीं ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ये जो सिद्ध, साधु, विद्याधर, देवता, लोक और लोकपाल हैं, वे वास्तव में कुछ उपजे नहीं; ब्रह्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है । ये