योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1726, कुल 1734 में से
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जो प्रत्यक्ष दिखते हैं सो शुद्ध संकल्प में रचे हुए हैं। परन्तु वास्तव में कुछ बने नहीं, भ्रम से इनकी सत्यता भासित होती है। जैसे मृगतृष्णा में नदी, रस्सी में सर्प, सीपी में रूपा और संकल्पनगर असत् हैं, वैसे ही आत्मा में यह जगत् है। हे राम! जैसे स्वप्न में नाना प्रकार की रचना दिखती है, परन्तु कुछ हुआ नहीं, वैसे ही यह जगत् है। जो पुरुष इसको देखकर सत्य मानता है, वह असम्यक्दर्शी है। जो आत्मा को देखता है, वही देखता है और वही सम्यक्दर्शी है। हे राम! ये लोक और लोकपाल जगत्सत्ता में ज्यों के त्यों हैं, और जैसे स्थित हैं वैसे ही हैं, परन्तु परमार्थ से कुछ उपजे नहीं, अनुभवसत्ता ही संवेदन से दृश्यरूप होकर भासित होती है और द्रष्टा ही दृश्यरूप होकर भासित होता है। परन्तु स्वरूप से भिन्न कुछ नहीं हुआ। जैसे आकाश और शून्यता, अग्नि और उष्णता में भेद नहीं, वैसे ही ब्रह्म और जगत् में भेद नहीं है। हे राम! अब एक और वृत्तान्त तुम सुनो। स्वप्न में जैसे अब हम हैं, वैसे ही एक आगे भी चित्त-प्रतिमा हुई थी।
पहले एक कल्प में तुम और हम हुए थे। तुम मेरे शिष्य थे और मैं तुम्हारा गुरु था। तुमने एक वन में मुझसे प्रश्न किया था कि हे भगवन्! एक मुझको संशय है उसे मिटाओ। महाप्रलय में नष्ट क्या होता है और अविनाशी क्या रहता है? तब मैंने कहा था, हे तात! जितना शेष विशेषरूप जगत् है, वह सब नष्ट हो जाती है—जैसे स्वप्न का नगर सुपुप्ति में लीन हो जाता है और निर्विशेष ब्रह्मसत्ता शेष रहती है। क्रिया, काल, कर्म, आकाश, पृथ्वी, अप्, तेज, वायु, पहाड़ नदियाँ आदि जो कुछ जगत् क्रिया, काल और द्रव्य से युक्त है, वह सब नष्ट हो जाता है और ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र ये जो कार्य के कारण हैं, उनका नाम भी नहीं रहता। चैतन्य का लक्षणरूप संवेदनशक्ति भी नहीं रहती, केवल अचेत चिन्मात्र एक चिदाकाश ही शेष रहता है। शिष्य बोला, हे मुनीश्वर! जो वस्तु सत्य होती है, उसका नाश नहीं होता, और जो असत्य होती है वह आभासरूप है, पर यह जगत् तो