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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1727, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1727

❋ निर्वाण प्रकरण ❋ ६२५

विद्यमान दिखता है, वह महाप्रलय में कहाँ जायगा ? गुरु बोले, हे तात ! जो सत्य है उसका नाश कभी नहीं होता और जो असत्य है उसका भाव नहीं है, इसलिए जितना कुछ जगत् तुझको दिखता है, सो सब भ्रममात्र है । इसमें कोई वस्तु भी सत्य नहीं दिखती है । परन्तु जैसे मृगतृष्णा का जल नहीं होता और दूसरा चन्द्रमा व आकाश में तरुवर भ्रममात्र हैं, वैसे ही यह जगत् भी जो दिखता है, वह भ्रममात्र है । जैसे स्वप्न का नगर प्रत्यक्ष भी दिखता है, परन्तु भ्रममात्र है, वैसे ही यह जगत् भी भ्रमरूप जानो ।

हे तात ! आत्मसत्ता सर्वदा सर्वत्र अपने आपमें स्थित है । जैसे स्वप्न में जाग्रत् का और जाग्रत् में स्वप्न का अभाव होता है तो सृष्टि कहाँ जाती है ? जैसे जाग्रत् में स्वप्न की सृष्टि का अभाव हो जाता है, वैसे ही महाप्रलय में इसका अभाव हो जाता है । शिष्य बोला, हे भगवन् ! यह जो दिखता है सो क्या है और जो नहीं दिखता सो क्या है ? इसका रूप क्या है और यह चिदाकाश से कैसे हुआ है ? गुरु बोले, हे शिष्य ! जब शुद्ध चिदाकाश में किञ्चन संवेदन फुरता है, तब जगत्रूप होकर दिखता है, इससे इसका रूप भी चिदाकाश ही है-चिदाकाश से भिन्न कुछ नहीं । सृष्टि और प्रलय दोनों उसी के रूप हैं । जब संवेदन फुरता है, तब सृष्टि दिखती है और जब नहीं फुरती, तब प्रलयरूप भासित होती है, पर दोनों ही उसके रूप हैं । जैसे एक ही वपु में दो स्वरूप हैं-दन्तों से शुक्ल लगता है और केशों से कृष्ण लगता है, वैसे ही आत्मा में सर्ग और प्रलय दो रूप होते हैं । पर दोनों आत्मरूप हैं । जैसे एक ही निद्रा की दो अवस्थाएँ होती हैं-एक स्वप्न और दूसरा सुषुप्ति, पर जाग्रत् में दोनों नहीं होतीं, वैसे ही निद्रारूप संवेदन में सर्ग और प्रलय भासित होता है, पर जाग्रतरूप आत्मा में दोनों का अभाव है । हे तात ! जो कुछ तुमको दिखता है वह सब चिदाकाशरूप है-और कुछ नहीं, ब्रह्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है । जैसे स्वप्न में अपना अनुभव ही जगत्रूप दिखता है, वैसे ही आत्मा में जगत् दिखता है । शिष्य बोला, हे भगवन् ! जो