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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1728, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1728

६२६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

इसी प्रकार है कि द्रष्टा ही दृश्यरूप होकर भासता है तो और जगत् तो कुछ न हुआ, सब वही है ।

गुरु बोले, हे तात ! यही बात है । जगत् कुछ वस्तु नहीं, चिदाकाश ही जगतरूप होकर दिखता है । आत्मसत्ता ही इस प्रकार भासित होती है, और कुछ नहीं, क्योंकि सब उर्मी का किञ्चन है । सबमें सर्वदा सब प्रकार वही सृष्टि होकर फुरती है । किसी में किसी समय किसी प्रकार कुछ हुआ नहीं, आत्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है । जो कुछ जगत् दिखता है उसे वही रूप जानो । जिसको तू सर्ग और प्रलय कहता है, वह सब आत्मसत्ता के नाम हैं । वही सबमें सर्वदा सब प्रकार स्थित है । एक ही परमदेव घट-पटरूप हुआ है । पर्वत, पट, जल, तृण, अग्नि, पृथ्वी, आकाश, स्थावर, जङ्गम, अस्ति, नास्ति, शून्य, अशून्य, क्रिया, काल, मूर्ति, अमूर्ति, बन्धन और मोक्ष आदि सब शब्द अर्थ में जो पदार्थ सिद्ध होते हैं, वे सब आत्मरूप हैं । सबमें सर्वदा सब प्रकार आत्मा ही है । और जिसमें सर्वदा सब प्रकार नहीं, वह भी आत्मा ही है, जो सदा ज्यों का त्यों ही है । जैसे स्वप्न में जो कुछ दिखता है, वह सब आत्मसत्ता ही है, और दूसरा कुछ बना नहीं । हे तात ! तृण ही कर्ता है, तृण ही भोक्ता है और तृण ही सर्वेश्वर है । घट कर्ता है, घट भोक्ता है और घट ही सर्वेश्वर है । पट कर्ता है, पट भोक्ता है और पट ही परमेश्वर है । नर कर्ता है, नर भोक्ता है और नर ही सबका ईश्वर है ।

इसी प्रकार एक-एक वस्तु नाम में जो वस्तु है, वह कर्ता, भोक्ता और सर्व ब्रह्मरूप है । ब्रह्मा से लेकर तृण तक जो कुछ जगत् दिखता है, सो सब आत्मरूप है । क्षय, उदय, भीतर, बाहर, कर्ता, भोक्ता सब विज्ञानमात्र ईश्वर है । कर्ता-भोक्ता वही है । और न करना है, न भोक्ता भी वही है । विधि भी वही है और निषेध भी वही है । शुद्ध दृष्टि से सब चिदात्मा ही भासित होता है, जो सब दुःखों से रहित है । जिनको आत्मदृष्टि नहीं प्राप्त हुई, उनका भिन्न-भिन्न जगत् दिखता है, जो अनुभव से भिन्न नहीं है । ऐसे जानकर अपने स्वरूप में स्थित रहो ।

योगवाशिष्ठ महारामायण · पृष्ठ 1728, कुल 1734 में से · BharatKosha