योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1729, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸
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हे राम ! इस प्रकार मैंने तुमसे कहा था, परन्तु उससे तुमको अभ्यास की न्यूनता से बोध न हुआ, इसलिए वही संस्कार अब तुमको प्राप्त हुआ है और इसी कारण अब तुम जागे हो । हे राम ! अब तुम अपने स्वरूप में स्थित होकर कृतकृत्य हुए हो, इसलिए अपनी राजलक्ष्मी को भोगो; प्रजा का पालन करो और हृदय से आकाश सम निर्लिप्त रहो । इतिश्रीयोगवाशिष्टेनिर्वाणप्रकरणे द्विशताधिकसप्ताशीतितमसर्गः॥२८७॥
वाल्मीकिजी बोले, हे भरद्वाज ! जब वशिष्ठजी इस प्रकार राम से कह चुके, तब आकाश में स्थित सिद्ध और देवता फूलों की वर्षा करने लगे-मानों मेघ बर्फ की वर्षा करते हों, अथवा आकाश कम्पायमान हुआ हो, उससे तारे गिरते हों । जब वे पुष्पों की वर्षा कर चुके, तब राजा दशरथ उठ खड़े हुए और अर्घ्य-पाद्य दे, पूजन कर हाथ जोड़ कहने लगे-हे मुनीश्वर ! बड़ा कल्याण और हर्ष हुआ, जो तुम्हारे प्रसाद से मैं आत्मपद को पाकर कृतकृत्य हुआ । चित्त का वियोग हुआ है, इससे दृश्य फुरने का भी अभाव हुआ है, और मैं अचित्त, चिन्मात्र हूँ । अब मैं परमपद को पा गया हूँ और मेरे सब सन्ताप मिट गये हैं । संसाररूपी अन्धमार्ग से थका हुआ मैं अब विश्राम को प्राप्त हुआ हूँ । अब में पहाड़ की तरह अचल हूँ । सब आपदा से तर गया हूँ । जो कुछ जानना था, वह जान गया हूँ । हे मुनीश्वर ! तुमने बहुत युक्ति से दृष्टान्त देकर जगाया है । अर्थात् शून्य के दृष्टान्त, सीपी में रूपा मृगतृष्णा का जल, रस्मी में सर्प, आकाश में दूसरा चन्द्रमा और नाव पर नदी के किनारों का चलते दिखना, जल में तरङ्ग, स्वर्ण में भूषण, वायु का फुरना, गन्धर्वनगर, संकल्पपुर आदि दृष्टान्त कहे हैं, जिनसे मैंने तुम्हारी कृपा से यह जान लिया कि आत्मसत्ता से भिन्न कुछ नहीं ।
वाल्मीकिजी बोले, जब इस प्रकार दशरथ कह चुके, तब राम उठे और हाथ जोड़कर इस प्रकार कहने लगे कि हे मुनीश्वर ! तुम्हारी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया । अब मैं परमपद को प्राप्त हुआ हूँ । मुझको किसी में न राग है, न द्वेष । मैं परमशान्ति को प्राप्त हुआ हूँ । न अब मुझे कुछ करने से अर्थ है और न करने में कुछ अनर्थ है । मैं