सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
संग्रह पर लौटें

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

६२० 卐 योगवाशिष्ठ 卐

सबका शेषभूत आत्मा है। जब उसमें संवेदन फुरता है तब ब्रह्म अलक्ष्यरूप हो जाता है। परन्तु उस संवेदन के फुरने और मिटने में ब्रह्म ज्यों का त्यों है। उसका अभाव नहीं होता—जैसे जल में तरङ्ग उपजता है और फिर लीन हो जाता है, परन्तु उसके उपजने और मिटने में जल ज्यों का त्यों है और तरङ्ग उसके आभास जगते हैं। जैसे तू मनोराज्य से एक नगर की कल्पना करे और फिर वह संकल्प छोड़ दे, तब संकल्परूप नगर का अभाव हो जाता है, परन्तु वह सदा अविनाशी रहता है। जैसे स्वप्न की सृष्टि उपजती है और लीन भी हो जाती है, परन्तु अधिष्ठान ज्यों का त्यों है, और जैसे रत्नों का प्रकाश उठता है और लीन भी हो जाता है परन्तु रत्न ज्यों का त्यों होता है, वैसे ही आत्मा विश्व के भाव-अभाव में ज्यों का त्यों रहता है; पर उसका आभास जगत् उपजता-मिटता दिखता है। उपजता है तब उत्पत्ति दिखती है, और जब मिटता है तब प्रलय हो जाता है। परन्तु ये दोनों केवल आभास हैं। जैसे वायु फुरता है तब दिखता है और ठहर जाना है तब नहीं दिखता; परन्तु वायु एक है, वैसे ही आत्मा एक ही है। फुरने का नाम उत्पत्ति है और न फुरने का नाम जगत् का प्रलय है। सो सब किचनरूप है। इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाण० द्विशताधिकपञ्चाशीतितमसर्गः॥२८५॥

वशिष्ठजी बोले, हे राजन्! तूने प्रयाग के जो दो पुरुषों का प्रश्न किया है, उसका उत्तर सुन। जो उसका शत्रु बन गया था, वह तो उसका पाप था और जो उसका मित्र बन गया था वह उसका पुण्य था। प्रयागतीर्थ धर्मक्षेत्र था। हे राजन्! पापरूप वासना के अनुसार मृत्यु दिखती है, पर पुण्यरूपी मित्र पापरूपी शत्रु को रोकता है। और पुण्यरूपी तीर्थ के बल से हृदय में अल्प पाप वेग से भागता भासित होता है। जब मृत्यु आती है, तब वह अपने को मरता जानता है और भाईजन कुटुम्बी रुदन करते हैं। पर जब अपनी ओर देखता है तब जानता है कि मैं तो मरा नहीं। जब मृतक मार्ग की ओर देखता है, तब अपने को मरा जानता है और भाई-परिजन रुदन करते हैं। इस प्रकार उसको मरना दिखता है और यह देखता है कि भाई-परिजन उसे

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६२१

जलाने चले हैं; उन्होंने अग्नि में मुझको डाला है और मैं जलता हूँ। जब फिर पुण्य की ओर देखता है, तब जानता है कि मैं मरा नहीं, जीता हूँ। और जब फिर पाप की ओर देखता है, तब जानता है कि मैं मरा हूँ और मुझको यमदूत ले चले हैं; यह परलोक है और यहाँ मैं सुख-दुःख भोगता हूँ। जब फिर पुण्य की ओर देखता है, तब जानता है कि मैं मरा नहीं, जीता हूँ; ये मेरे भाईबंधु बैठे हैं और वहाँ मेरा व्यवहार चेष्टा है। पुरुष इस प्रकार दोनों अवस्थाओं को देखता है। जैसे संकल्प-पुर और स्वप्ननगर में उभय अवस्था देखे। एक ही पुरुष नाना प्रकार की चेष्टा देखता है। कहीं अपने को जीता देखता है, कहीं मृतक देखता है; कहीं व्यवहार देखता है और कहीं निर्व्यापार इत्यादि। ये नाना प्रकार की चेष्टाएँ एक ही पुरुष में होती हैं। वैसे ही एक ही पुरुष को पुण्य-पाप की वासना से जीना-मरना दिखता है।

हे राजन् ! यह सम्पूर्ण जगत् संकल्पमात्र है। जैसा संकल्प दृढ़ होता है, वैसा ही रूप भासित होता है। परलोक जाना भी अपनी वासना के अनुसार भासित होता है। पुत्र-बान्धव भी उसकी पुण्य-पाप-वासना में स्थित हैं। वे जो कुछ इसके लिए करते हैं, उनसे यह सुख, दुःख, नरक, स्वर्ग भोगता है। पर वास्तव में कोई बान्धव और पुत्र नहीं है। उसकी वासना ही नाना प्रकार के आकार रखकर स्थित हुई है। हे राजन् ! सहस्र चन्द्रमा के विषय में तूने जो प्रश्न किया है, उसका उत्तर सुन। सहस्र जीव भी इसी आकाश में स्थित होते हैं और अपनी-अपनी वासना से कलासंयुक्त चन्द्रमा होकर विराजते हैं; परन्तु एक को दूसरा नहीं जानता, परस्पर अज्ञात हैं—जो अन्तर्वाहक दृष्टि से देखे, उसको दिखते हैं। हे राजन् ! जो कोई ऐसी भावना करे कि मैं उनके मण्डल को प्राप्त होऊँ तो तत्काल ही पहुँच जाता है। जैसे एक ही घर में बहुत मनुष्य सोये हों तो उनको अपने-अपने स्वप्न की सृष्टि दिखती है और वह अन्योन्य विलक्षण होती है—एक की सृष्टि को दूसरा नहीं जानता, वैसे ही एक आकाश में सहस्र चन्द्रमा बनते हैं। जैसे इन्द्र ब्राह्मण के दस पुत्र दस ब्रह्मा हो बैठे थे, वैसे ही जिस रूप की कोई तीव्र भावना

६२२ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

करता है, वही हो जाना है । जो कोई भावना करे कि हम इसी मन्दिर में सप्तद्वीप का राज्य करें, तो वैसा ही हो जाता है; क्योंकि अनुभव एक कल्पवृक्ष है, उसमें जैसी तीव्र भावना होती है, वैसी ही होकर दिखती है ।

वर के बल से उस पुरुष को सप्तद्वीप का राज्य प्राप्त हुआ और शाप के कारण उसका जीव उसी घर में रहकर द्वीप का राज्य करता रहा । जैसे स्वप्न में राज्य करते हैं, वैसे ही अपने घर में अपना संवेदन ही सृष्टिरूप होकर भासित होता है । इसी प्रकार जो एक स्त्री की भावना करके सहस्र पुरुष ध्यान लगाये बैठे थे कि हम उसके भर्त्ता हों, वैसा भी हो जाता है । हे राजन् ! उनकी जो तीव्र भावना है, वही स्त्री का रूप रख कर उनको प्राप्त होगी । वे जानेंगे कि वही स्त्री हमको प्राप्त हुई है । यह जगत् केवल संकल्पमात्र है, संकल्प से भिन्न कुछ वस्तु नहीं । सब चिदाकाशरूप है, अपने ही अनुभव से प्रकट होता है । जैसा संकल्प उसमें फुरता है, वैसा ही होता दिखता है । पृथ्वी, जल, तेज आदि तत्त्व कोई नहीं, आत्मसत्ता ही इस प्रकार स्थित है । वह परम शान्त, निराकार, निर्विकार और अद्वैतरूप है । राजा बोले, हे मुनीश्वर ! जगत् के आदि में जो आत्मसत्ता थी, वह किस आकार की देह में स्थित थी ? देह बिना तो सत्ता स्थित नहीं होती । जैसे आधार बिना दीपक नहीं रहता, आधार होता है तो उसमें जगता है, वैसे ही आत्मसत्ता किसमें स्थित थी ? वशिष्ठजी ने कहा, हे राजन् ! जितने आकार तुझको दिखते हैं और जिनको देखकर तूने प्रश्न उठाया है, वे हैं नहीं, ब्रह्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है । जिन तत्त्वों से बना शरीर दिखता है, वे भी मृगतृष्णा के जल सदृश हैं । जैसे रस्सी में सर्प, सीपी में रूपा, आकाश में दूसरा चन्द्रमा भ्रममात्र है—क्योंकि इनका अत्यन्त अभाव है—वैसे ही ये भूतों (तत्त्वों) के आकार ब्रह्म में भ्रम से दिखते हैं—ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है । तूने पूछा था कि जो स्वयंभू अपने आपसे उपजता है तो अब क्यों नहीं उपजता, सो हे राजन् ! उसके सदृश कई उत्पन्न होते हैं । पर वास्तव में कुछ उपजा नहीं । नाना प्रकार का

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ६२३

भासित होता है, परन्तु नाना प्रकार नहीं हुआ । जैसे स्वप्न में सदा तू देखता है कि अद्वैत अपने आप ही नानारूप होकर दिखता है और पर्वत पर दौड़ता फिरता है, तो वह किस शरीर से दौड़ता है और क्या रूप होता है ? जैसे वह पर्वत और शरीर आकाशरूप होता है और भ्रम से पिण्डाकार दिखता है, वैसे ही यह जगत् भी आकाशरूप है, भ्रम से पिण्डाकार दिखता है ।

हे राजन् ! तू अपने स्वभाव में स्थित होकर देख कि यह सब जगत् तेरा अनुभव आकाश है । स्वप्न का दृष्टान्त भी मैंने तेरे चेतने के लिए कहा है । स्वप्न भी कुछ नहीं, सदा आत्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है । जब उसमें आभास संवेदन फुरता है, तब वही जगतरूप हो भासती है और जब आभास संकल्प मिट जाता है तब प्रलयकाल भासता है ? वास्तव में न कोई उत्पन्न होता है और न प्रलय होता है । आत्मसत्ता ही ज्यों की त्यों स्थित है । जैसे एक निद्रा के दो रूप होते हैं—एक स्वप्न और दूसरा सुषुप्ति, पर जाग्रत् में ये दोनों आकाशमात्र होती हैं, वैसे ही आभास की दो संज्ञा होती हैं—एक जगत् और दूसरी महाप्रलय । पर आत्मरूपी जाग्रत् में दोनों का अभाव हो जाता है । हे राजन् ! तू स्वरूप में जागकर और कलना को त्यागकर देख कि सब आत्मरूप है—और कुछ नहीं । हे राम ! इस प्रकार मैं राजा से कहकर उठ खड़ा हुआ । तब उसने भली प्रकार प्रीतिसंयुक्त मेरा पूजन किया । जब वह पूजन कर चुका, तब मैं जिस कार्य के लिए आया था, वह कार्य करके स्वर्ग को चला गया ।

इति श्रीयो० राजप्रश्नो० वर्णनंनामद्विशताधिकषड्शीतितमस्सर्गः॥६॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह सब जगत् चिदाकाशरूप है, दूसरा कुछ बना नहीं । राम ने पूछा, हे भगवन् ! तुम कहते हो कि सब चिदाकाश है, बना कुछ नहीं, तो सिद्ध, साधु, विद्याधर, लोकपाल, देवता इत्यादि जो दिखते हैं, वे कुछ बने क्यों नहीं ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ये जो सिद्ध, साधु, विद्याधर, देवता, लोक और लोकपाल हैं, वे वास्तव में कुछ उपजे नहीं; ब्रह्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है । ये

६२४ ☸ योगवासिष्ठ ☸

जो प्रत्यक्ष दिखते हैं सो शुद्ध संकल्प में रचे हुए हैं। परन्तु वास्तव में कुछ बने नहीं, भ्रम से इनकी सत्यता भासित होती है। जैसे मृगतृष्णा में नदी, रस्सी में सर्प, सीपी में रूपा और संकल्पनगर असत् हैं, वैसे ही आत्मा में यह जगत् है। हे राम! जैसे स्वप्न में नाना प्रकार की रचना दिखती है, परन्तु कुछ हुआ नहीं, वैसे ही यह जगत् है। जो पुरुष इसको देखकर सत्य मानता है, वह असम्यक्दर्शी है। जो आत्मा को देखता है, वही देखता है और वही सम्यक्दर्शी है। हे राम! ये लोक और लोकपाल जगत्सत्ता में ज्यों के त्यों हैं, और जैसे स्थित हैं वैसे ही हैं, परन्तु परमार्थ से कुछ उपजे नहीं, अनुभवसत्ता ही संवेदन से दृश्यरूप होकर भासित होती है और द्रष्टा ही दृश्यरूप होकर भासित होता है। परन्तु स्वरूप से भिन्न कुछ नहीं हुआ। जैसे आकाश और शून्यता, अग्नि और उष्णता में भेद नहीं, वैसे ही ब्रह्म और जगत् में भेद नहीं है। हे राम! अब एक और वृत्तान्त तुम सुनो। स्वप्न में जैसे अब हम हैं, वैसे ही एक आगे भी चित्त-प्रतिमा हुई थी।

पहले एक कल्प में तुम और हम हुए थे। तुम मेरे शिष्य थे और मैं तुम्हारा गुरु था। तुमने एक वन में मुझसे प्रश्न किया था कि हे भगवन्! एक मुझको संशय है उसे मिटाओ। महाप्रलय में नष्ट क्या होता है और अविनाशी क्या रहता है? तब मैंने कहा था, हे तात! जितना शेष विशेषरूप जगत् है, वह सब नष्ट हो जाती है—जैसे स्वप्न का नगर सुपुप्ति में लीन हो जाता है और निर्विशेष ब्रह्मसत्ता शेष रहती है। क्रिया, काल, कर्म, आकाश, पृथ्वी, अप्, तेज, वायु, पहाड़ नदियाँ आदि जो कुछ जगत् क्रिया, काल और द्रव्य से युक्त है, वह सब नष्ट हो जाता है और ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र ये जो कार्य के कारण हैं, उनका नाम भी नहीं रहता। चैतन्य का लक्षणरूप संवेदनशक्ति भी नहीं रहती, केवल अचेत चिन्मात्र एक चिदाकाश ही शेष रहता है। शिष्य बोला, हे मुनीश्वर! जो वस्तु सत्य होती है, उसका नाश नहीं होता, और जो असत्य होती है वह आभासरूप है, पर यह जगत् तो

❋ निर्वाण प्रकरण ❋ ६२५

विद्यमान दिखता है, वह महाप्रलय में कहाँ जायगा ? गुरु बोले, हे तात ! जो सत्य है उसका नाश कभी नहीं होता और जो असत्य है उसका भाव नहीं है, इसलिए जितना कुछ जगत् तुझको दिखता है, सो सब भ्रममात्र है । इसमें कोई वस्तु भी सत्य नहीं दिखती है । परन्तु जैसे मृगतृष्णा का जल नहीं होता और दूसरा चन्द्रमा व आकाश में तरुवर भ्रममात्र हैं, वैसे ही यह जगत् भी जो दिखता है, वह भ्रममात्र है । जैसे स्वप्न का नगर प्रत्यक्ष भी दिखता है, परन्तु भ्रममात्र है, वैसे ही यह जगत् भी भ्रमरूप जानो ।

हे तात ! आत्मसत्ता सर्वदा सर्वत्र अपने आपमें स्थित है । जैसे स्वप्न में जाग्रत् का और जाग्रत् में स्वप्न का अभाव होता है तो सृष्टि कहाँ जाती है ? जैसे जाग्रत् में स्वप्न की सृष्टि का अभाव हो जाता है, वैसे ही महाप्रलय में इसका अभाव हो जाता है । शिष्य बोला, हे भगवन् ! यह जो दिखता है सो क्या है और जो नहीं दिखता सो क्या है ? इसका रूप क्या है और यह चिदाकाश से कैसे हुआ है ? गुरु बोले, हे शिष्य ! जब शुद्ध चिदाकाश में किञ्चन संवेदन फुरता है, तब जगत्रूप होकर दिखता है, इससे इसका रूप भी चिदाकाश ही है-चिदाकाश से भिन्न कुछ नहीं । सृष्टि और प्रलय दोनों उसी के रूप हैं । जब संवेदन फुरता है, तब सृष्टि दिखती है और जब नहीं फुरती, तब प्रलयरूप भासित होती है, पर दोनों ही उसके रूप हैं । जैसे एक ही वपु में दो स्वरूप हैं-दन्तों से शुक्ल लगता है और केशों से कृष्ण लगता है, वैसे ही आत्मा में सर्ग और प्रलय दो रूप होते हैं । पर दोनों आत्मरूप हैं । जैसे एक ही निद्रा की दो अवस्थाएँ होती हैं-एक स्वप्न और दूसरा सुषुप्ति, पर जाग्रत् में दोनों नहीं होतीं, वैसे ही निद्रारूप संवेदन में सर्ग और प्रलय भासित होता है, पर जाग्रतरूप आत्मा में दोनों का अभाव है । हे तात ! जो कुछ तुमको दिखता है वह सब चिदाकाशरूप है-और कुछ नहीं, ब्रह्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है । जैसे स्वप्न में अपना अनुभव ही जगत्रूप दिखता है, वैसे ही आत्मा में जगत् दिखता है । शिष्य बोला, हे भगवन् ! जो

६२६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

इसी प्रकार है कि द्रष्टा ही दृश्यरूप होकर भासता है तो और जगत् तो कुछ न हुआ, सब वही है ।

गुरु बोले, हे तात ! यही बात है । जगत् कुछ वस्तु नहीं, चिदाकाश ही जगतरूप होकर दिखता है । आत्मसत्ता ही इस प्रकार भासित होती है, और कुछ नहीं, क्योंकि सब उर्मी का किञ्चन है । सबमें सर्वदा सब प्रकार वही सृष्टि होकर फुरती है । किसी में किसी समय किसी प्रकार कुछ हुआ नहीं, आत्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है । जो कुछ जगत् दिखता है उसे वही रूप जानो । जिसको तू सर्ग और प्रलय कहता है, वह सब आत्मसत्ता के नाम हैं । वही सबमें सर्वदा सब प्रकार स्थित है । एक ही परमदेव घट-पटरूप हुआ है । पर्वत, पट, जल, तृण, अग्नि, पृथ्वी, आकाश, स्थावर, जङ्गम, अस्ति, नास्ति, शून्य, अशून्य, क्रिया, काल, मूर्ति, अमूर्ति, बन्धन और मोक्ष आदि सब शब्द अर्थ में जो पदार्थ सिद्ध होते हैं, वे सब आत्मरूप हैं । सबमें सर्वदा सब प्रकार आत्मा ही है । और जिसमें सर्वदा सब प्रकार नहीं, वह भी आत्मा ही है, जो सदा ज्यों का त्यों ही है । जैसे स्वप्न में जो कुछ दिखता है, वह सब आत्मसत्ता ही है, और दूसरा कुछ बना नहीं । हे तात ! तृण ही कर्ता है, तृण ही भोक्ता है और तृण ही सर्वेश्वर है । घट कर्ता है, घट भोक्ता है और घट ही सर्वेश्वर है । पट कर्ता है, पट भोक्ता है और पट ही परमेश्वर है । नर कर्ता है, नर भोक्ता है और नर ही सबका ईश्वर है ।

इसी प्रकार एक-एक वस्तु नाम में जो वस्तु है, वह कर्ता, भोक्ता और सर्व ब्रह्मरूप है । ब्रह्मा से लेकर तृण तक जो कुछ जगत् दिखता है, सो सब आत्मरूप है । क्षय, उदय, भीतर, बाहर, कर्ता, भोक्ता सब विज्ञानमात्र ईश्वर है । कर्ता-भोक्ता वही है । और न करना है, न भोक्ता भी वही है । विधि भी वही है और निषेध भी वही है । शुद्ध दृष्टि से सब चिदात्मा ही भासित होता है, जो सब दुःखों से रहित है । जिनको आत्मदृष्टि नहीं प्राप्त हुई, उनका भिन्न-भिन्न जगत् दिखता है, जो अनुभव से भिन्न नहीं है । ऐसे जानकर अपने स्वरूप में स्थित रहो ।

☸ निर्वाण प्रकरण ☸

६२७

हे राम ! इस प्रकार मैंने तुमसे कहा था, परन्तु उससे तुमको अभ्यास की न्यूनता से बोध न हुआ, इसलिए वही संस्कार अब तुमको प्राप्त हुआ है और इसी कारण अब तुम जागे हो । हे राम ! अब तुम अपने स्वरूप में स्थित होकर कृतकृत्य हुए हो, इसलिए अपनी राजलक्ष्मी को भोगो; प्रजा का पालन करो और हृदय से आकाश सम निर्लिप्त रहो । इतिश्रीयोगवाशिष्टेनिर्वाणप्रकरणे द्विशताधिकसप्ताशीतितमसर्गः॥२८७॥

वाल्मीकिजी बोले, हे भरद्वाज ! जब वशिष्ठजी इस प्रकार राम से कह चुके, तब आकाश में स्थित सिद्ध और देवता फूलों की वर्षा करने लगे-मानों मेघ बर्फ की वर्षा करते हों, अथवा आकाश कम्पायमान हुआ हो, उससे तारे गिरते हों । जब वे पुष्पों की वर्षा कर चुके, तब राजा दशरथ उठ खड़े हुए और अर्घ्य-पाद्य दे, पूजन कर हाथ जोड़ कहने लगे-हे मुनीश्वर ! बड़ा कल्याण और हर्ष हुआ, जो तुम्हारे प्रसाद से मैं आत्मपद को पाकर कृतकृत्य हुआ । चित्त का वियोग हुआ है, इससे दृश्य फुरने का भी अभाव हुआ है, और मैं अचित्त, चिन्मात्र हूँ । अब मैं परमपद को पा गया हूँ और मेरे सब सन्ताप मिट गये हैं । संसाररूपी अन्धमार्ग से थका हुआ मैं अब विश्राम को प्राप्त हुआ हूँ । अब में पहाड़ की तरह अचल हूँ । सब आपदा से तर गया हूँ । जो कुछ जानना था, वह जान गया हूँ । हे मुनीश्वर ! तुमने बहुत युक्ति से दृष्टान्त देकर जगाया है । अर्थात् शून्य के दृष्टान्त, सीपी में रूपा मृगतृष्णा का जल, रस्मी में सर्प, आकाश में दूसरा चन्द्रमा और नाव पर नदी के किनारों का चलते दिखना, जल में तरङ्ग, स्वर्ण में भूषण, वायु का फुरना, गन्धर्वनगर, संकल्पपुर आदि दृष्टान्त कहे हैं, जिनसे मैंने तुम्हारी कृपा से यह जान लिया कि आत्मसत्ता से भिन्न कुछ नहीं ।

वाल्मीकिजी बोले, जब इस प्रकार दशरथ कह चुके, तब राम उठे और हाथ जोड़कर इस प्रकार कहने लगे कि हे मुनीश्वर ! तुम्हारी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया । अब मैं परमपद को प्राप्त हुआ हूँ । मुझको किसी में न राग है, न द्वेष । मैं परमशान्ति को प्राप्त हुआ हूँ । न अब मुझे कुछ करने से अर्थ है और न करने में कुछ अनर्थ है । मैं

६२ = ❊ योगवाशिष्ठ ❊

परमशान्तपद को प्राप्त हुआ हूँ। हे मुनीश्वर ! तुम्हारे वचनों को स्मरण कर में आश्चर्य को प्राप्त होकर हर्षित होता हूँ। मेरे सब सन्देह नष्ट हो गये हैं। अब मुझको और कुछ नहीं दिखता, सब ब्रह्म ही दिखता है। लक्ष्मण बोले, हे भगवन् ! मैं सन्तों के वचन इकट्ठे करता रहा था, और सब जो मेरे पुण्य थे, वे अब इकट्ठे हुए थे, जिन सबका फल अब उदय हुआ है। तुम्हारी कृपा से अब मैं सब संशयों से रहित होकर परम पद को प्राप्त हुआ हूँ। तुम्हारे वचन चन्द्रमा की किरणों के समान शीतल हैं, किन्तु उनसे भी अधिक हैं। इनसे मैंने परम शान्ति पाई है और मेरे सब दुःख सन्ताप नष्ट हो गये हैं। शत्रुघ्न बोले, हे मुनीश्वर ! जगत् और मृत्यु का जो भय था, वह तुमने दूर कर दिया और अपने अमृत-रूपी वचनों का सुधापान कराया है। अब मेरे सब संशय नष्ट हो गये और मैं आत्मपद को प्राप्त हुआ हूँ। हमारे जो चिरकाल के पुण्य थे, उनका फल आज पाया।

विश्वामित्र बोले, हे मुनीश्वर ! सब तीर्थों के स्नान और दूसरे कर्मों में भी मनुष्य ऐसा पवित्र नहीं होता जैसे तुम्हारे वचनों से मैं पवित्र हुआ हूँ। आज मेरे कान पवित्र हुए। नारदजी बोले, हे मुनीश्वर ! ऐसा मोक्ष का उपाय मैंने देवताओं और सिद्धों के स्थान में भी नहीं सुना। ब्रह्मा के मुख से भी नहीं सुना, जैसा कि तुमने उपदेश किया है। इसके श्रवण करने से फिर संशय नहीं रहता। फिर दशरथ बोले, हे मुनीश्वर ! आत्मज्ञान जैसी सम्पदा कोई नहीं है। तुमने यह परम सम्पदा हमको दी है, जिसके पाने से फिर किसी पदार्थ की इच्छा नहीं रही। अब तो हम अपने स्वभाव में स्थित हुए हैं, और सम्पूर्ण कर्म हमको छोड़ गये हैं। हमारे बहुत जन्मों के पुण्य इकट्ठे हुए थे, उनके फल से ये तुम्हारे पावन वचन सुने हैं। रामजी बोले, हे मुनीश्वर ! बड़ा हर्ष हुआ कि यह सर्वसम्पदा का अधिष्ठान मुझे प्राप्त हुआ और सब आपदाओं का अन्त हुआ। ज्ञान से रहित जो अज्ञानी हैं, वे बड़े अभागे हैं। जो आत्मपद को त्यागकर अनात्मपदार्थ की ओर दौड़ते हैं, वे भी यत्न करके प्राप्त होते हैं, पर उनसे विमुख होने पर ही आत्मपद प्राप्त होता

❋ निर्वाण प्रकरण ❋

<p align="right">६२६</p>

है। उसी आत्मपद को पाकर मैं शान्तियुक्त और हर्षशोक से रहित हुआ हूँ। मैंने अचलपद पाया है। मैं अब अजित अविनाशी सदा अपने आपमें स्थित हूँ। तुम्हारी कृपा से आपको ऐसा जानता हूँ।

लक्ष्मण बोले, हे मुनीश्वर ! सहस्र सूर्य एकत्र उदय होकर भी हृदय के तम को दूर नहीं कर सकते, पर वह तम तुमने दूर किया है। सहस्र चन्द्रमा इकट्ठे उदय हों तो भी हृदय की तपन निवृत्त नहीं कर सकते, पर तुमने सम्पूर्ण तपन निवृत्त की है। हम निःसंताप पद को प्राप्त हुए हैं। वाल्मीकिजी बोले, हे साधु ! जब इस प्रकार सब कह चुके, तब वशिष्ठजी ने कहा—हे राम ! इस मोक्ष उपाय-कथा को सुनकर सब ब्राह्मणों का यथायोग्य पूजन और दान करो। जो इतर जीव हैं, वे भी यथायोग्य यथाशक्ति पूजन करते हैं, तुम तो राजा हो। जब इस प्रकार वशिष्ठजी ने कहा, तब राजा दशरथ ने उठकर सहस्र मथुरावासी विद्वान् ब्राह्मणों को भोजन कराया, दक्षिणा, वस्त्र, भूषण, घोड़े, गाँव आदि दिये, यथायोग्य पूजन किया। निदान बड़ा उत्साह हुआ। अङ्गना नृत्य करने लगीं और नगाड़े, शहनाई आदि बाजे बजने लगे चक्रवर्ती राजा दशरथ ने बड़ा उत्सव किया। इस प्रकार सात दिन तक ब्राह्मणों, अतिथियों और निर्धनों को द्रव्य देकर राजा ने पूजन किया और अन्न और वस्त्र आदि देकर सबको प्रसन्न किया।

इति श्रीयो० नि० द्विशताधिकाष्टाशतितमस्सर्गः ॥ २८८ ॥

वाल्मीकिजी बोले कि हे भरद्वाज ! इस प्रकार वशिष्ठ मुनि के वचन सुनकर सब रघुवंशी कृतकृत्य हुए। जैसे रामजी सुनकर संशयरहित जीवन्मुक्त होकर विचरे हैं वैसे ही तुम भी विचरो। यह मोक्ष-उपाय ऐसा है कि जो अज्ञानी श्रवण करे तो वह भी परमपद को प्राप्त हो। तुम्हारी क्या बात है, तुम तो पहले से भी बुद्धिमान् हो। जिस प्रकार मुझसे ब्रह्माजी ने कहा था, वह मैंने तुमको सुना दिया। जैसे रामचन्द्र आदि कुमार और दशरथ आदि राजा जीवन्मुक्त होकर विचरे हैं, वैसे ही तुम भी विचरो। उनमें मोह भी दिखता था, पर वे स्वरूप से चलायमान नहीं हुए। ज्ञान जैसा सुख और कोई नहीं, और अज्ञान जैसा दुःख भी कोई

६३० ❁ योगवाशिष्ट ❁

नहीं। इससे अधिक क्या कहिये। यह जो मोक्ष-उपाय मैंने तुमसे कहा वह परमपावन है। यह संसारसमुद्र से पार करनेवाला है, दुःखरूपी अन्धकार का नाशक सूर्य है और सुखरूपी कमल की खानि का तालाब है। जो पुरुष इसका बारम्बार विचार करेगा, वह यदि महामूर्ख हो तो भी शान्तपद को प्राप्त होगा। जो कोई इस मोक्ष-उपाय को पढ़ेगा, कहेगा, सुनेगा, लिखेगा, अथवा लिखकर पुस्तक देगा, उसके हृदय में जो कामना होगी, वह पूर्ण होगी। वह ब्रह्मलोक को प्राप्त होगा और राजसूययज्ञ का फल पावेगा। फिर विचारकर ज्ञान पाकर मुक्त होगा।

हे अङ्ग! यह मोक्ष उपाय बड़ा शास्त्र है। इसमें बड़ी कथा है और नाना प्रकार की युक्तियाँ हैं। जिन कथाओं और युक्तियों से वशिष्ठजी ने राम को जगाया था, वे मैंने तुझको सुनाई हैं। अपने उपदेश से उन्होंने उनको जीवन्मुक्त किया था और कहा था कि तुम राजलक्ष्मी भोगो। वही मैंने भी तुमसे कहा है कि जीवन्मुक्त होकर अपने तपकर्म में सावधान हो रहो, और आत्मसत्ता में निश्चय रखना। जिस उपदेश से रघुवंशी कृतकृत्य हुए, वह मैंने तुमसे ज्यों का त्यों कहा है। इस निश्चय को रखकर कृतकृत्य हो जाय। इसमें जितने इतिहास और कथा हैं, उनके भिन्न-भिन्न नाम सुनो। वैराग्यप्रकरण में राम के सम्पूर्ण प्रश्न हैं। मुमुक्षुप्रकरण में शुकनिर्वाण ही कहा है। उत्पत्तिप्रकरण में ये आठ आख्यान कहे हैं—एक आकाशज का, दूसरा लीला का, तीसरा सूची का, चतुर्थ इन्द्र-ब्राह्मण के पुत्रों का, पञ्चम कृत्रिम इन्द्र और अहल्या का, छठा चित्तोपाख्यान, सप्तम वाल्मीकि की कथा और अष्टम साम्बर का आख्यान। स्थितिप्रकरण में चार आख्यान हैं—एक भृगु के पुत्र का, दूसरा दामव्याल और कट का, तीसरा भीम, भाम, दट का और चतुर्थ दासुर का। उपशमप्रकरण में एकादश आख्यान कहे हैं—एक जनक की सिद्धगीता, दूसरा पुण्यपावन, तीसरा बलि को विज्ञान की प्राप्ति का वृत्तान्त, चतुर्थ प्रह्लादविश्रान्ति, पञ्चम गाधि का वृत्तान्त, छठा उद्दालकनिर्वाण, सप्तम स्वर्गनिश्चय, अष्टम परिघनिश्चय, नवम भाम,

६३० ❊ योगवाशिष्ठ ❊

नहीं । इससे अधिक क्या कहिये । यह जो मोक्ष-उपाय मैंने तुमसे कहा वह परमपावन है । यह संसारसमुद्र से पार करनेवाला है, दुःखरूपी अन्धकार का नाशक सूर्य है और सुखरूपी कमल की खानि का तालाब है । जो पुरुष इसका बारम्बार विचार करेगा, वह यदि महामूर्ख हो तो भी शान्तपद को प्राप्त होगा । जो कोई इस मोक्ष-उपाय को पढ़ेगा, कहेगा, सुनेगा, लिखेगा, अथवा लिखकर पुस्तक देगा, उसके हृदय में जो कामना होगी, वह पूर्ण होगी । वह ब्रह्मलोक को प्राप्त होगा और राजसूययज्ञ का फल पावेगा । फिर विचारकर ज्ञान पाकर मुक्त होगा ।

हे अङ्ग ! यह मोक्ष उपाय बड़ा शास्त्र है । इसमें बड़ी कथा है और नाना प्रकार की युक्तियाँ हैं । जिन कथाओं और युक्तियों से वशिष्ठजी ने राम को जगाया था, वे मैंने तुझको सुनाई हैं । अपने उपदेश से उन्होंने उनको जीवन्मुक्त किया था और कहा था कि तुम राजलक्ष्मी भोगो । वही मैंने भी तुमसे कहा है कि जीवन्मुक्त होकर अपने तपकर्म में सावधान हो रहो, और आत्मसत्ता में निश्चय रखना । जिस उपदेश से रघुवंशी कृतकृत्य हुए, वह मैंने तुमसे ज्यों का त्यों कहा है । इस निश्चय को रखकर कृतकृत्य हो जाय । इसमें जितने इतिहास और कथा हैं, उनके भिन्न-भिन्न नाम सुनो । वैराग्यप्रकरण में राम के सम्पूर्ण प्रश्न हैं । मुमुक्षुप्रकरण में शुक्रनिर्वाण ही कहा है । उत्पत्तिप्रकरण में ये आठ आख्यान कहे हैं—एक आकाशज का, दूसरा लीला का, तीसरा सूची का, चतुर्थ इन्द्र-ब्राह्मण के पुत्रों का, पञ्चम कृत्रिम इन्द्र और अहल्या का, छठा चित्तोपाख्यान, सप्तम वाल्मीकि की कथा और अष्टम साम्बर का आख्यान । स्थितिप्रकरण में चार आख्यान हैं—एक भृगु के पुत्र का, दूसरा दामब्याल और कट का, तीसरा भीम, भास, दृढ का और चतुर्थ दासुर का । उपशमप्रकरण में एकादश आख्यान कहे हैं—एक जनक की सिद्धगीता, दूसरा पुण्यपावन, तीसरा बलि को विज्ञान की प्राप्ति का वृत्तान्त, चतुर्थ प्रह्लादविश्रान्ति, पञ्चम गाधि का वृत्तान्त, छठा उद्दालकनिर्वाण, सप्तम स्वर्गनिश्चय, अष्टम परिघनिश्चय, नवम भास,

✽ निर्वाण प्रकरण ✽ ६३१

दशम विलाससंवाद और एकादश वीतव । निर्वाणप्रकरण में २७ आख्यान कहे हैं—भुशुण्डि और वशिष्ठ का, महेश और वशिष्ठ का, शिलाकोश का, उपदेश अर्जुनगीता, स्वप्नसत्यरुद्र, वेताल का, भगीरथ का, गङ्गा अवतरण, शिखध्वज का, वृहस्पतिकचप्रबोध, मिथ्यापुरुष का, शृङ्गी गण का, इक्ष्वाकुनिर्वाण, मृगव्याध-दृष्टान्त, वलबृहस्पति, मङ्गीनिर्वाण, विद्याधर का, हरिणोपाख्यान, आख्यानोपाख्यान, विपश्चित् की कथा, शिवि का, शिला का, इन्द्र ब्राह्मण के पुत्रों का, कुन्ददन्त का, महा-प्रश्न उत्तरवाक्य, शिष्य-गुरु-महोत्सव और ग्रंथप्रशंसाफल, चतुष्टय-प्रकरणों में सब पचास आख्यान वर्णन किये गये हैं ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे महारामायणे वशिष्ठरामचन्द्रसंवादे निर्वाणप्रकरणे मोक्षोपायवर्णनं नाम द्विशताधिकैकोननवतितमस्सर्गः ॥ २८६ ॥

श्रीयोगवासिष्ठ के निर्वाणप्रकरण का उत्तरार्द्ध समाप्त ।

इति


श्रीमती कमला भार्गव द्वारा—तेजकुमार प्रेस (प्रा०) लिमिटेड, लखनऊ में मुद्रित ।