योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
६१० ☸ योगवासिष्ठ ☸
होते हैं। ज्ञानरूप अनुभवसत्ता है। इसमें जिस अर्थ का आभास होता है, उसी को जीव जानता है। जैसे एक ही रस्सी है, उसमें सर्प का भ्रम करे तो सर्प तो कुछ नहीं, वह रस्सी ही है, वैसे ही अर्थ-भेद ग्रहण कीजिये तो भेद है, नहीं तो ज्ञान ही है। सब पदार्थ जो दिखते हैं, वे सब ज्ञानरूप ही हैं, और कुछ बना नहीं। हे राम! स्वप्न का दृष्टान्त मैंने तुमको जताने के लिए कहा है, वास्तव में स्वप्न भी कोई नहीं। अद्वैतसत्ता ही अपने आपमें स्थित है। जैसे समुद्र सदा जलरूप है, पर द्रवता से तरङ्ग बुलबुले दिखते हैं, सो वे नानारूप नहीं, पर जल ही नाना भासित होता है, वैसे ही सब जगत् अनानारूप है, पर नाना-रूप भासित होता है। तुम अपने स्वप्न को विचारकर देखो कि तुम्हारा अनुभव ही नाना प्रकार का होकर भासित होता है, परन्तु कुछ हुआ नहीं, वैसे ही यह जाग्रत् जगत् भी तुम्हारा अपना ही रूप है, दूसरा कुछ नहीं, सदा निराकार, निर्विकार और आकाशरूप आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है।
राम ने पूछा, हे भगवन्! जो अद्वैतसत्ता निराकार, निर्विकार और सदा अपने आपमें स्थित है तो पृथ्वी कहाँ से उपजी है, जल कैसे उपजा है और अग्नि, वायु, आकाश, पुण्य, पाप इत्यादिक कल्पना चिदाकाश में कैसे उपजी है? मेरे दृढ़बोध के लिए कहिए। वशिष्ठजी बोले, हे राम! अच्छा यह तुम कहो कि स्वप्न में पृथ्वी कहाँ से उपज आती है और जल, वायु, अग्नि, आकाश, पाप, पुण्य, देश, काल, पदार्थ कहाँ से उपजते हैं? रामजी बोले, हे मुनीश्वर! स्वप्न में जो पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, देश, काल, पदार्थ दिखते हैं, वे सब आत्मरूप होते हैं। आत्मसत्ता ही ज्यों की त्यों होती है, वह तत्त्ववेत्ताओं को ज्यों की त्यों भासित होती है। पर जो असम्यक्दर्शी हैं, उनको भिन्न-भिन्न पदार्थ दिखते हैं। भासित होना दोनों का समान होता है, परन्तु जिसकी वृत्ति यथाभूत अर्थ को ग्रहण करती है, उसको ज्यों की त्यों आत्मसत्ता दिखती है, पर जिसकी वृत्ति यथाभूत अर्थ नहीं ग्रहण करती, उसको वही वस्तु और रूप होकर दिखती है। हे मुनीश्वर!
❉ निर्वाण प्रकरण ❉ ६११
जगत् कुछ बना नहीं; वही आत्मसत्ता स्थित है। जब कठोररूप का संवेदन फुरता है, तब पृथ्वी और पहाड़ के रूप में भासित होती है। जब द्रवता का स्पन्दन फुरता है, तब जलरूप दिखता है। जब उष्णरूप का संवेदन फुरता है, तब अग्नि भासित होती है इसी प्रकार वायु, आकाश आदिक पदार्थों में जैसे फुरना होता है, वैसे ही दिखता है। जैसे जल तरङ्गरूप दिखता है, परन्तु जल से भिन्न कुछ नहीं, जल ही रूप है, वैसे ही आत्मसत्ता जगतरूप दिखती है, पर वही रूप है। जगत् कुछ वस्तु नहीं। ये सब गुण और क्रिया आकाश में हैं, वास्तव में कुछ नहीं, क्योंकि कारणरहित असत्यरूप है। यह अहं त्वं आदि सब जगत् आकाशरूप है, कुछ बना नहीं। आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। और कोई आधार नहीं है। अद्वैतसत्ता सदा अपने आपमें स्थित है। और नानारूप भासित होती है। जब चित्त संवेदन फुरता है, तब पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, पदार्थ, देश, काल होकर भासित होता है। कहीं सब आत्मा का ज्ञान फुरता है और कहीं परिच्छिन्नता भासित होती है, परन्तु वास्तव में कुछ बना नहीं, वही वस्तु है। जैसे उसमें फुरना होता है, वैसे ही होकर भासित होता है। अनुभवसत्ता परम आकाशरूप है, जिसमें आकाश भी आकाशरूप है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे चिदाकाशजगदेकताप्रतिपादनं नाम द्विशताधिकैकाशीतितमसर्गः ॥ २८१ ॥
रामजी बोले, हे भगवन् ! अब यह प्रश्न है कि जो जाग्रत् और स्वप्न में कुछ भेद नहीं और परम आकाशरूप है तो उस सत्ता का जाग्रत् और स्वप्न के शरीर से कैसे संयोग है। वह तो निरवयव और निराकार है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ये सब आकार जो तुमको दिखते हैं, वे सब आकाशरूप हैं और आकाश में आकाश ही स्थित है। सर्ग के आदि में आकार का अभाव था। वही अब भी जानो कि उपजा कोई नहीं, परम आकाशसत्ता अपने आपमें स्थित है। जब उस अद्वैतसत्ता चिन्मात्र में चित्त किञ्चन होता है; तब वही सच्चा आकार की नाईं दिखती है, परन्तु कुछ हुआ नहीं, आकाश ही रूप है। जैसे
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जीव स्वप्न में शरीरों का अनुभव करता है, पर वे कुछ आकार तो नहीं होते, केवल आकाशरूप होते हैं, वैसे ही यह जगत् भी निराकार है, परन्तु फुरने से आकार होकर भासित होता है। जिन तत्त्वों से शरीर होता है; वे तत्त्व ही नहीं उपजे तो शरीर की उत्पत्ति कैसे कहूँ? हे राम! और जगत् कुछ उपजा नहीं, ब्रह्म ही किञ्चन से जगतरूप भासता है। जैसे जल और द्रवता में भेद नहीं, और जैसे आकाश और शून्यता में भेद नहीं, वैसे ही ब्रह्म और जगत् में भेद नहीं है। संवेदन में अर्थ-संकेत है। जब संवेदन न फुरे, तब अर्थसंकेत न हो। भिन्न-भिन्न वस्तु एक ही सत्ता के नाम हैं। भिन्न-भिन्न नाम तब भासित होते हैं, जब वेदन जगता है, नहीं तो शब्द कल्पित जल के तुल्य है—वास्तव में वस्तु से भेद नहीं है। जैसे वायु और स्पन्दन में भेद नहीं है। स्पन्दन भासित होती है, निस्पन्द नहीं, परन्तु दोनों वायु के ही रूप हैं, वैसे ही स्पन्दन से ब्रह्म में किञ्चन जगत् दिखता है और जब संवेदन नहीं फुरता तब जगत् नहीं भासित होता। परन्तु दोनों रूप ब्रह्म के ही हैं। ब्रह्म और जगत् में भेद कुछ नहीं है। जैसे एक निद्रा के दो रूप होते हैं—एक स्वप्न और दूसरा सुषुप्ति—परन्तु दोनों एक निद्रा के ही पर्याय हैं वैसे ही जगत् का होना और न भासित होना एक ही ब्रह्म की दोनों संज्ञा हैं। चाहे ब्रह्म कहो और चाहे जगत् कहो, ब्रह्म और जगत् में भेद कुछ नहीं, ब्रह्म ही जगतरूप होकर भासित होता है।
जैसे निर्मल अनुभव से स्वप्न में शिला प्रकट होती है, पर वह शिला तो स्वप्न में कुछ उपजी नहीं, अपना अनुभव ही शिलारूप दिखता है, वैसे ही ये सब आकार जो दिखते हैं, वे आकाशरूप हैं और आत्मसत्ता ही आकाशरूप जगत् होकर दिखती है। जगत् कुछ उपजा नहीं और न सत्य है, न असत्य है, न आना है, न जाना है, केवल आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। राम ने पूछा, हे मुनीश्वर! पहले तुमने मुझसे अनेक सृष्टियाँ कही हैं। कई जल में, कई अग्नि में, कई पृथ्वी में, कई वायु में, कई पहाड़ और पत्थरों में और कई आकाश में पक्षी सी इत्यादि नाना प्रकार की सृष्टियाँ तुमने कही हैं। अब यह प्रश्न है कि हमारी
⚙ निर्वाण प्रकरण ⚙ ६१३
सृष्टि किससे उत्पन्न हुई है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! तुम तो वही प्रश्न करते हो, जो अपूर्व होता है, जो पहले देखा-सुना न हो और जगत् में जाना भी न हो । इस जगत् की उत्पत्ति वेदपुराण तो यों ही कहते हैं और लोक में भी प्रसिद्ध है कि ब्रह्मा से हुई है, पर वास्तव में चिदाकाशरूप है, कुछ उपजी नहीं । ये दोनों प्रकार मैंने तुमसे कहे हैं । पर उनको तुम सुनकर भी प्रश्न करते हो, इसलिए तुम्हारा प्रश्न ही नहीं बनता । राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! यह सृष्टि कितनी है, कहाँ तक चली जाती है और कितने काल तक रहेगी ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जितनी सृष्टि तुम जानते हो, वह है नहीं—ब्रह्म ही ब्रह्म में स्थित है—और सृष्टियाँ बहुत हैं, परन्तु वास्तव में कुछ हुई नहीं । वे आदि, अन्त और मध्य से रहित हैं । वही ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है । ये जितनी सृष्टियाँ हैं, सो आभासमात्र हैं । ब्रह्म आदि, अन्त और मध्य से रहित है, उसका आभास भी वैसा ही है ।
जैसे जितना वृक्ष होता है उतनी ही छाया होती है, वैसे ही ब्रह्म का आभास सृष्टि है और वास्तव में पूछो तो आभास भी कोई नहीं, ब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है और वही अपने को जगतरूप देखता है—ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं । जैसे स्वप्न के पुर में पर्वत, नदी आयुध आदि नाना प्रकार के व्यवहार के रूप रखकर आत्मसत्ता ही स्थित होती है, और कुछ नहीं बना, और जैसे संकल्पनगर दिखता है, वैसे ही इस जगत् को भी जानो, क्योंकि और कुछ बना नहीं, आत्मसत्ता ही जगतरूप होकर भासित होती है । जगत् यदि किसी कारण से उपजा होता तो सत् होता है । पर इसका कारण कोई नहीं पाया जाता, इसलिए असत् है । इसका न कोई निमित्तकारण और न समवायकारण पाया जाता है । हे राम ! जो किसी कारण से न उपजा हो और दिखे, उसको स्वप्न-पुर सदृश आकाशमात्र जानो । जिसमें आभास भासित होता है, वह अधिष्ठान सत्ता है । जैसे रस्सी में सर्प दिखता है, वह सर्प नहीं, रस्सी ही सर्परूप होकर दिखती है, वैसे ही जगत् का अधिष्ठान ब्रह्मसत्ता सत्य है और शुद्ध, निर्दुःख, अच्युत, विज्ञान सदा अपने आपमें स्थित
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है। वही सत्ता जगतरूप होकर दिखता है। जैसे जल ही तरङ्गरूप होकर दिखता है, वैसे ही ब्रह्म ही जगतरूप होकर दिखता है। हे राम! यह जगत् ब्रह्म का हृदय है, अर्थात् उसी का स्वभाव है। ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं। ज्ञानी को सर्वदा ऐसे ही दिखता है। जैसे स्वप्न से जागकर सब अपना रूप ही भासित होता है, वैसे ही यह जगत् अपना रूप है।
इति श्रीयोग० जगदभाववर्णनं नाम द्विशताधिकद्व्यशीति- तमस्सर्गः ॥ ॥ २८२ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! इस जगत् का कारण कोई नहीं। जब जगत् ही नहीं तो कारण कैसे हो, और कारण नहीं तो जगत् कैसे हो? इसमें सब ब्रह्म ही है। इसी विषय पर एक उपाख्यान है, उसे सुनो। हे राम! कुशद्वीप के पूर्व और पश्चिम दिशा के बीच सुवर्ण की ऐलवती नगरी महा उज्ज्वलरूप है। उसमें बड़े-बड़े ऊँचे खम्भे बने हैं, मानो पृथ्वी और आकाश को उन्होंने ही भर दिया है। उस नगरी का एक प्राक्पति राजा था। एक समय में आकाशमार्ग से शीघ्र वेग से उसके घर में आया। उसने भली प्रकार अर्घ्य-पाद्य से प्रीतिपूर्वक मेरा पूजन किया और सिंहासन पर बैठाया। फिर मुझसे एक महाप्रश्न किया, जिस प्रश्न से बड़ा और कठिन कोई प्रश्न नहीं हो सकता। राजा बोले, हे भगवन्! तुम संशयरूपी तम के नाशक सूर्य हो। मुझको एक संशय है, उसे दूर करो। हे मुनीश्वर! प्रथम तो यह प्रश्न है कि जब महाप्रलय होता है तब कार्य कारण और सब शब्द की कल्पना का अभाव हो जाना है। उसके बाद महाआकाशसत्ता शेष रहती है, जिसमें वाणी की भी गति नहीं। वह अवाच्य पद है। तब उससे फिर सृष्टि कैसे उत्पन्न होती है? वहाँ उपादानकारण और निमित्तकारण तो कोई नहीं रहता, तब सृष्टि कैसे होती है? श्रुति और पुराणों में सुनता हूँ कि महाप्रलय से फिर सृष्टि उत्पन्न होती है।
दूसरा प्रश्न यह है कि जम्बूद्वीप में कोई मृतक हुआ अथवा किसी और ठौर गया हुआ मृतक हुआ, तो उसका वह शरीर तो वहीं भस्म हो जाता है, पर वह परलोक में पुण्य-पाप का फल सुख-दुःख भोगता
☸ निर्वाण प्रकरण ☸
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है। तो जिस शरीर से भोगता है, उस शरीर का कारण तो कोई नहीं हुआ? जो तुम कहो कि पुण्य और पाप ही उस शरीर का कारण हैं, तो पुण्य-पाप तो आप ही निराकार हैं। उनसे साकरूप शरीर कैसे उपजे? जो तुम कहो कि परलोक कोई नहीं और पुण्य-पाप भी कुछ नहीं, तो श्रुति और पुराणों के वचनों से विरोध होता है, क्योंकि वे सभी वर्णन करते हैं कि जीव मरकर परलोक जाता है और जैसे कर्म किये हैं वैसा ही फल भोगता है। जिस शरीर से कर्मफल भोगता है, उसका कारण तो कोई नहीं है? और न कोई पिता है, न माता है। फिर वह शरीर कैसे उत्पन्न हुआ? तीसरा प्रश्न यह है कि जब यह जीव परलोक में जाता है तो उसके लिए दान-पुण्य करता है। तो उस दान-पुण्य का फल उसको कैसे प्राप्त होता है? चतुर्थ प्रश्न यह है कि महाप्रलय के पश्चात् जो ब्रह्मा उत्पन्न हुआ है, उसका नाम स्वयंभू कैसे हुआ? जो महाप्रलय में न उपजा हो और अपने आप ही उपजे, वह स्वयंभू कहलाता है। पर महाप्रलय में तो केवल 'अद्वैत' शेष रहा था। उससे जो उत्पन्न हुआ, उसे स्वयंभू कैसे कहिये? जो कहो कि स्वयंभू अपने आपसे उपजता है, तो अपना आप आत्मा है, जो सबका अपना आप है। अब क्यों नहीं उससे ब्रह्मा उत्पन्न होता है?
पाँचवाँ प्रश्न यह है कि एक पुरुष था, मान लीजिए, जिसका एक मित्र और एक शत्रु था। उन दोनों ने प्रयागक्षेत्र में जाकर करवट* ली। मित्र ने यह वाञ्छा की कि मेरा मित्र चिरकाल जीता रहे और चिरंजीवी हो और शत्रु ने यह संकल्प किया कि मेरा शत्रु इसी समय मर जावे। हे मुनीश्वर! एक ही समय में दो फल कैसे हों? छठा प्रश्न यह है कि सहस्रों मनुष्य ध्यान लगाये बैठे हैं कि हम इसी आकाश के चन्द्रमा हों। तो एक ही आकाश में सहस्रों चन्द्रमा कैसे होंगे। सप्तम प्रश्न यह है कि सहस्रों पुरुष यही ध्यान लगाये बैठे हैं कि एक सुन्दर स्त्री जो बैठा है, वह हमको मिले; पर वह स्त्री पतिव्रता है। उसके सहस्र भर्ता एक काल में कैसे होंगे? अष्टम प्रश्न यह है कि एक पुरुष था,
* काशी-करवट—किसी कामना की पूर्ति के लिए प्राण त्याग को करवट लेना कहा जाता था।
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उसको किसी ने वर दिया कि तुम जाकर मृतक हो और सप्तद्वीप का राज्य करो, और किसी ने शाप दिया कि तेरा जीव अपने ही घर में रहेगा और मरने पर बाहर न जावेगा । तो ये दोनों बातें एक ही काल में कैसे होंगी ? नवम प्रश्न यह है कि एक काष्ठ का खम्भा था, उसको एक ने कहा कि यह सुवर्ण का हो जायगा और वह सुवर्ण का हो गया; तो सुवर्ण कैसे उत्पन्न हुआ ? उसका कारण कोई न था—कारण बिना कार्य कैसे उत्पन्न हुआ ? जैसा अन्न का बीज बोते हैं, वैसा ही अन्न उत्पन्न होता है, और अन्न नहीं उगता । तो काष्ठ से स्वर्ण कैसे उत्पन्न हुआ ? जो कहो, संकल्प से उपजा, तो हम भी संकल्प करते हैं कि अमुक कार्य ऐसे हो, पर वह क्यों नहीं होता ? इसलिए जाना जाता है कि संकल्प से भी कुछ उत्पन्न नहीं होता । हे मुनीश्वर ! जिस प्रकार यह वृत्तान्त है सो कहो । एक कहते हैं कि पहले असत् ही था । तो असत् से जगत् की उत्पत्ति कैसे हुई ? यह मुझको संशय है, इसको दूर करो । जो कोई सन्त के निकट आता है तो सत्संग निष्फल नहीं जाता, इसलिए कृपा करके कहो ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे प्रश्नवर्णनं नाम द्विशताधिकत्र्यशीतितमसर्गः ॥ २८३ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब इस प्रकार उसने मुझसे अपने संशयों का समूह कहा, तब मैंने उससे कहा, हे राजन् ! ये सब संशय जो तुझको हैं, उन्हें मैं दूर करूँगा, जैसे सारे अन्धकार को सूर्य नष्ट करते हैं । हे राजन् ! यह सब जगत् जो तुमको दिखता है, वह ब्रह्मरूप है और सदा अपने आपमें स्थित है । जब उसमें चित्त स्फुरता है तब वहाँ चित्त संवेदन जगतरूप होकर दिखता है । इसमें जो कुछ आकार दिखते हैं, वे सब चिन्मात्ररूप हैं । न कोई कार्य है और न कारण । और जो तुम प्रत्यक्ष प्रमाण से संशय करो कि सब चिन्मात्ररूप है तो जब यह शरीर मृतक हो जाता है, तब चेतना क्यों नहीं; चाहिए कि उस काल में भी उसमें ज्ञान हो । हे राजन् ! इसका उत्तर यह है कि जब जाग्रत का अन्त होता है, पर स्वप्न नहीं आता, तब शुद्ध चिन्मात्र
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ६१७
रहता है। फिर जब उसमें स्वप्न की सृष्टि दिखती है तो उस सृष्टि में कई चेतन दिखते हैं, कई मृतक दिखते हैं, कई जड़ दिखते हैं और स्थावर-जङ्गम नाना प्रकार की सृष्टि दिखती है। परन्तु वह और कुछ नहीं, वही चिन्मात्र स्वरूप है, जो अनुभवरूप हो भासित होता है। कहीं चेतन बोलते और चलते दिखते हैं, परन्तु है वही। जो चेतनता न होती तो कैसे दिखते ? जिससे भासित होते हैं, उसी से सब चेतन हैं। वैसे ही इस जगत् में भी कहीं प्राणी बोलते, चलते दिखते हैं और कहीं शव दिखते हैं, परन्तु सब वही चिन्मात्रसत्ता है। जैसा-जैसा संकल्प उसमें उठता है, वैसा ही दिखता है।
हे राजन् ! जैसे प्रथम प्रलय से सृष्टि उत्पन्न हुई थी, वैसे ही उत्पन्न होती है। यह सृष्टि किसी का कार्य नहीं, और किसी का कारण भी नहीं—बिना कारण उपजी भासित होती है। हे राजन् ! जो महाप्रलय में शेष रहता है, वह चिन्मात्र है। उस चिन्मात्रसत्ता से जो प्रथम शुद्ध संवेदन उपजा है, वह विराट्रूप ब्रह्मा होकर स्थित हुआ, और उसी ने जगत् की कल्पना की है। उसमें उसने नीति रची है कि यह पदार्थ इस प्रकार हो, वैसा ही चित्तसंवेदन में दृढ़ होकर भासित हुआ है। उसी का नाम जगत् है। वही आत्मसत्ता किंचनरूप होकर जगतरूप दिखती है। हे राजन्, जैसे तुम्हारे संकल्प और स्वप्न की सृष्टि का आदि शुद्ध आत्मसत्ता थी और वही फुरने से पदार्थरूप होकर भासित होती है, वैसे ही इसे भी जानो। पर वास्तव में न कोई कार्य है और न कोई कारण। जैसे स्वप्न की सृष्टि अकारण होती है, वैसे ही यह जगत् भी अकारण और आदि-अन्त के विचार से रहित है। जो वर्तमान प्रत्यक्ष प्रमाण को मानते हैं, उनको कार्य और कारण प्रत्यक्ष दिखते हैं और उनके वचन भी निरर्थक हैं। जैसे अन्धे कूप के मेढक शब्द करते हैं, वैसे ही वे भी निरर्थक प्रत्यक्ष प्रमाण से कार्यकारण के संबंध में वाद करते हैं। उनको हमारे वचन सुनने का अधिकार नहीं और हमारे लिए भी उनके वचन सुनने के योग्य नहीं हैं।
हे राजन् ! जिस शास्त्र के सुनने और जिस गुरु के मिलने से सम्पूर्ण
६१ = ॐ योगवासिष्ठ ॐ
संशय निवृत्त न हों, उस शास्त्र और गुरु का कहना भी अन्धकूप के मेढक की टरटर जैसा व्यर्थ है। जो परमार्थसत्ता से विमुख हैं, उनका यह भ्रम अपने में भासित होता है। ऐसे लोग शरीर के मृतक होने पर अपने को मरना जानते हैं और फिर जब वासना के अनुसार शरीर उपजना और जीना है, तब मानते हैं कि अब हम उपजे हैं। फिर अपने पुण्य-पाप कर्मों का अनुभव करते हैं। जैसे स्वप्न में कोई अपने साथ शरीर देखता है, वैसे ही परलोक में जीव को अपने साथ शरीर भासित हो आता है। वैसे ही यह शरीर भी भासित हो आया है। कोई इसका कारण नहीं है। यह न पञ्चभौतिक है, न इसका शरीर है और न किसी कारण से प्राणी उपजे हैं। अपना ही कल्पना आकाररूप होकर दिखती है। आकार कोई और नहीं, केवल ब्रह्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है, और जैसा संकल्प उसमें दृढ़ होता है, वैसा पदार्थ प्रकट होता है। हे राजन् ! जो तू इस जगत् को सत्य मानता है तो सब कुछ सिद्ध होता है। शरीर भी है, परलोक भी है और नरक-स्वर्ग भी है। जैसा यह लोक है, वैसा ही परलोक है। जो यह लोक निश्चय में सत्य है तो वह लोक भी सत्य होकर भासित होगा, और प्राणी जैसा कर्म करेगा, वैसा ही फल भोगेगा।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे प्रश्नोत्तरवर्णनं नाम द्विशताधिकचतुर्विंशतितमःसर्गः ॥ २४४ ॥
वशिष्ठजी बोले हे राजन् ! यह सब जगत् जो तुझको दिखता है, वह केवल संकल्पमात्र है। जैसे कोई बालक अपने मन में वृक्ष और उसमें फूल, फल और टाम की कल्पना करे, सो संकल्पमात्र है, वैसे ही यह जगत् भी संवेदनरूपा ब्रह्मा ने कल्पित किया है और उनके मन में फुरता है। अतएव संकल्परूप है। जैसे उसने संकल्प किया है, वैसे ही स्थित है और जैसे उसमें क्रम रचा है कि इस प्रकार यह पदार्थ होगा वह वैसे ही स्थित है। देश, काल, पदार्थ भी वैसे ही स्थित हैं। इसका नाम नीति या नियति है। हे राजन् ! तूने प्रश्न किया था कि जो पुरुष अरूप है और दूर है, यदि उसके लिए किसी ने दिया तो उसको कैसे
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६१६
पहूँचता है और अरूप और स्वरूप का कैसे संयोग है ? इसका उत्तर यह है कि जो कोई शुद्ध संवेदन पुरुष है, उसको सब पदार्थ निकट भासित होते हैं, और जो कोई पुरुष मनोराज्य की कल्पना करता है और उसमें बड़ा देश रचता है, वह दूर से दूर मार्ग है, तो जो उस देश के वासी हैं, उनको अपने देश की अपेक्षा दूसरा देश दूर से दूर है, परन्तु जिसका मनोराज्य है, उसको तो सब निकट है और अपना ही रूप है । इस प्रकार जो शुद्धसंवेदनरूप है, उसके लिए जो कोई देता है—चाहे ईश्वर के लिए और चाहे देवता के लिए—उसको निकट से निकट सब अपने में भासित होता है । आदि नियति इसी प्रकार हुई है कि शुद्धसंवेदन को सब अपने निकट से निकट ही भासित होता है, क्योंकि सब संकल्प है, और जैसी रचना संकल्प में रचती है, वैसी ही होती है—संकल्प में क्या नहीं होता खम्भे का प्रश्न जो तुमने किया है कि काष्ठ का था सुवर्ण का कैसे हो गया, उसका उत्तर भी सुनो ।
हे राजन् ! आदि जो संवेदनरूप ब्रह्मा है उसने अपने मनोराज्य में नियति की है कि तपादिक से वर और शाप सिद्ध होता है । उसके कहे से जो काष्ठ का खम्भा स्वर्ण का हो गया तो तू विचारकर देख कि किस कारण से काष्ठ का सुवर्ण हुआ । वह केवल संकल्पमात्र है जो संकल्प से भिन्न कुछ होता तो काष्ठ का सुवर्ण न होता । यह सब विश्व संकल्परूप है, जैसा संकल्प दृढ़ होता है, वैसा ही दिखता है । जैसे तू अपने मनो-राज्य में संकल्प करता है कि यह ऐसे रहे और जो उससे और प्रकार करे तो भी हो जाय, वह होता है, वैसे ही वर और शाप भी और प्रकार हो जाते हैं । न और कोई जगत् है, न कार्य है । और न कारण है । वही आत्मसत्ता ज्यों की त्यों है । जैसा संकल्प जिसमें फुरता है, वैसा ही भासित होता है । तू पूछता है कि असत् से फिर जगत् कैसे उत्पन्न होता है । इसका उत्तर यह है कि जो आप ही न हो उसमें जगत् कैसे प्रकटे ? हे राजन् ! असत् इसी का नाम है । जगत् असत् था, इस-लिए श्रुति ने उसे असत् कहा । आदि असत् था, इसलिए जगत् की असत्यता कही है । पर आत्मा तो असत्य नहीं होता ।
६२० 卐 योगवाशिष्ठ 卐
सबका शेषभूत आत्मा है। जब उसमें संवेदन फुरता है तब ब्रह्म अलक्ष्यरूप हो जाता है। परन्तु उस संवेदन के फुरने और मिटने में ब्रह्म ज्यों का त्यों है। उसका अभाव नहीं होता—जैसे जल में तरङ्ग उपजता है और फिर लीन हो जाता है, परन्तु उसके उपजने और मिटने में जल ज्यों का त्यों है और तरङ्ग उसके आभास जगते हैं। जैसे तू मनोराज्य से एक नगर की कल्पना करे और फिर वह संकल्प छोड़ दे, तब संकल्परूप नगर का अभाव हो जाता है, परन्तु वह सदा अविनाशी रहता है। जैसे स्वप्न की सृष्टि उपजती है और लीन भी हो जाती है, परन्तु अधिष्ठान ज्यों का त्यों है, और जैसे रत्नों का प्रकाश उठता है और लीन भी हो जाता है परन्तु रत्न ज्यों का त्यों होता है, वैसे ही आत्मा विश्व के भाव-अभाव में ज्यों का त्यों रहता है; पर उसका आभास जगत् उपजता-मिटता दिखता है। उपजता है तब उत्पत्ति दिखती है, और जब मिटता है तब प्रलय हो जाता है। परन्तु ये दोनों केवल आभास हैं। जैसे वायु फुरता है तब दिखता है और ठहर जाना है तब नहीं दिखता; परन्तु वायु एक है, वैसे ही आत्मा एक ही है। फुरने का नाम उत्पत्ति है और न फुरने का नाम जगत् का प्रलय है। सो सब किचनरूप है। इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाण० द्विशताधिकपञ्चाशीतितमसर्गः॥२८५॥
वशिष्ठजी बोले, हे राजन्! तूने प्रयाग के जो दो पुरुषों का प्रश्न किया है, उसका उत्तर सुन। जो उसका शत्रु बन गया था, वह तो उसका पाप था और जो उसका मित्र बन गया था वह उसका पुण्य था। प्रयागतीर्थ धर्मक्षेत्र था। हे राजन्! पापरूप वासना के अनुसार मृत्यु दिखती है, पर पुण्यरूपी मित्र पापरूपी शत्रु को रोकता है। और पुण्यरूपी तीर्थ के बल से हृदय में अल्प पाप वेग से भागता भासित होता है। जब मृत्यु आती है, तब वह अपने को मरता जानता है और भाईजन कुटुम्बी रुदन करते हैं। पर जब अपनी ओर देखता है तब जानता है कि मैं तो मरा नहीं। जब मृतक मार्ग की ओर देखता है, तब अपने को मरा जानता है और भाई-परिजन रुदन करते हैं। इस प्रकार उसको मरना दिखता है और यह देखता है कि भाई-परिजन उसे
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६२१
जलाने चले हैं; उन्होंने अग्नि में मुझको डाला है और मैं जलता हूँ। जब फिर पुण्य की ओर देखता है, तब जानता है कि मैं मरा नहीं, जीता हूँ। और जब फिर पाप की ओर देखता है, तब जानता है कि मैं मरा हूँ और मुझको यमदूत ले चले हैं; यह परलोक है और यहाँ मैं सुख-दुःख भोगता हूँ। जब फिर पुण्य की ओर देखता है, तब जानता है कि मैं मरा नहीं, जीता हूँ; ये मेरे भाईबंधु बैठे हैं और वहाँ मेरा व्यवहार चेष्टा है। पुरुष इस प्रकार दोनों अवस्थाओं को देखता है। जैसे संकल्प-पुर और स्वप्ननगर में उभय अवस्था देखे। एक ही पुरुष नाना प्रकार की चेष्टा देखता है। कहीं अपने को जीता देखता है, कहीं मृतक देखता है; कहीं व्यवहार देखता है और कहीं निर्व्यापार इत्यादि। ये नाना प्रकार की चेष्टाएँ एक ही पुरुष में होती हैं। वैसे ही एक ही पुरुष को पुण्य-पाप की वासना से जीना-मरना दिखता है।
हे राजन् ! यह सम्पूर्ण जगत् संकल्पमात्र है। जैसा संकल्प दृढ़ होता है, वैसा ही रूप भासित होता है। परलोक जाना भी अपनी वासना के अनुसार भासित होता है। पुत्र-बान्धव भी उसकी पुण्य-पाप-वासना में स्थित हैं। वे जो कुछ इसके लिए करते हैं, उनसे यह सुख, दुःख, नरक, स्वर्ग भोगता है। पर वास्तव में कोई बान्धव और पुत्र नहीं है। उसकी वासना ही नाना प्रकार के आकार रखकर स्थित हुई है। हे राजन् ! सहस्र चन्द्रमा के विषय में तूने जो प्रश्न किया है, उसका उत्तर सुन। सहस्र जीव भी इसी आकाश में स्थित होते हैं और अपनी-अपनी वासना से कलासंयुक्त चन्द्रमा होकर विराजते हैं; परन्तु एक को दूसरा नहीं जानता, परस्पर अज्ञात हैं—जो अन्तर्वाहक दृष्टि से देखे, उसको दिखते हैं। हे राजन् ! जो कोई ऐसी भावना करे कि मैं उनके मण्डल को प्राप्त होऊँ तो तत्काल ही पहुँच जाता है। जैसे एक ही घर में बहुत मनुष्य सोये हों तो उनको अपने-अपने स्वप्न की सृष्टि दिखती है और वह अन्योन्य विलक्षण होती है—एक की सृष्टि को दूसरा नहीं जानता, वैसे ही एक आकाश में सहस्र चन्द्रमा बनते हैं। जैसे इन्द्र ब्राह्मण के दस पुत्र दस ब्रह्मा हो बैठे थे, वैसे ही जिस रूप की कोई तीव्र भावना
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करता है, वही हो जाना है । जो कोई भावना करे कि हम इसी मन्दिर में सप्तद्वीप का राज्य करें, तो वैसा ही हो जाता है; क्योंकि अनुभव एक कल्पवृक्ष है, उसमें जैसी तीव्र भावना होती है, वैसी ही होकर दिखती है ।
वर के बल से उस पुरुष को सप्तद्वीप का राज्य प्राप्त हुआ और शाप के कारण उसका जीव उसी घर में रहकर द्वीप का राज्य करता रहा । जैसे स्वप्न में राज्य करते हैं, वैसे ही अपने घर में अपना संवेदन ही सृष्टिरूप होकर भासित होता है । इसी प्रकार जो एक स्त्री की भावना करके सहस्र पुरुष ध्यान लगाये बैठे थे कि हम उसके भर्त्ता हों, वैसा भी हो जाता है । हे राजन् ! उनकी जो तीव्र भावना है, वही स्त्री का रूप रख कर उनको प्राप्त होगी । वे जानेंगे कि वही स्त्री हमको प्राप्त हुई है । यह जगत् केवल संकल्पमात्र है, संकल्प से भिन्न कुछ वस्तु नहीं । सब चिदाकाशरूप है, अपने ही अनुभव से प्रकट होता है । जैसा संकल्प उसमें फुरता है, वैसा ही होता दिखता है । पृथ्वी, जल, तेज आदि तत्त्व कोई नहीं, आत्मसत्ता ही इस प्रकार स्थित है । वह परम शान्त, निराकार, निर्विकार और अद्वैतरूप है । राजा बोले, हे मुनीश्वर ! जगत् के आदि में जो आत्मसत्ता थी, वह किस आकार की देह में स्थित थी ? देह बिना तो सत्ता स्थित नहीं होती । जैसे आधार बिना दीपक नहीं रहता, आधार होता है तो उसमें जगता है, वैसे ही आत्मसत्ता किसमें स्थित थी ? वशिष्ठजी ने कहा, हे राजन् ! जितने आकार तुझको दिखते हैं और जिनको देखकर तूने प्रश्न उठाया है, वे हैं नहीं, ब्रह्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है । जिन तत्त्वों से बना शरीर दिखता है, वे भी मृगतृष्णा के जल सदृश हैं । जैसे रस्सी में सर्प, सीपी में रूपा, आकाश में दूसरा चन्द्रमा भ्रममात्र है—क्योंकि इनका अत्यन्त अभाव है—वैसे ही ये भूतों (तत्त्वों) के आकार ब्रह्म में भ्रम से दिखते हैं—ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है । तूने पूछा था कि जो स्वयंभू अपने आपसे उपजता है तो अब क्यों नहीं उपजता, सो हे राजन् ! उसके सदृश कई उत्पन्न होते हैं । पर वास्तव में कुछ उपजा नहीं । नाना प्रकार का
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ६२३
भासित होता है, परन्तु नाना प्रकार नहीं हुआ । जैसे स्वप्न में सदा तू देखता है कि अद्वैत अपने आप ही नानारूप होकर दिखता है और पर्वत पर दौड़ता फिरता है, तो वह किस शरीर से दौड़ता है और क्या रूप होता है ? जैसे वह पर्वत और शरीर आकाशरूप होता है और भ्रम से पिण्डाकार दिखता है, वैसे ही यह जगत् भी आकाशरूप है, भ्रम से पिण्डाकार दिखता है ।
हे राजन् ! तू अपने स्वभाव में स्थित होकर देख कि यह सब जगत् तेरा अनुभव आकाश है । स्वप्न का दृष्टान्त भी मैंने तेरे चेतने के लिए कहा है । स्वप्न भी कुछ नहीं, सदा आत्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है । जब उसमें आभास संवेदन फुरता है, तब वही जगतरूप हो भासती है और जब आभास संकल्प मिट जाता है तब प्रलयकाल भासता है ? वास्तव में न कोई उत्पन्न होता है और न प्रलय होता है । आत्मसत्ता ही ज्यों की त्यों स्थित है । जैसे एक निद्रा के दो रूप होते हैं—एक स्वप्न और दूसरा सुषुप्ति, पर जाग्रत् में ये दोनों आकाशमात्र होती हैं, वैसे ही आभास की दो संज्ञा होती हैं—एक जगत् और दूसरी महाप्रलय । पर आत्मरूपी जाग्रत् में दोनों का अभाव हो जाता है । हे राजन् ! तू स्वरूप में जागकर और कलना को त्यागकर देख कि सब आत्मरूप है—और कुछ नहीं । हे राम ! इस प्रकार मैं राजा से कहकर उठ खड़ा हुआ । तब उसने भली प्रकार प्रीतिसंयुक्त मेरा पूजन किया । जब वह पूजन कर चुका, तब मैं जिस कार्य के लिए आया था, वह कार्य करके स्वर्ग को चला गया ।
इति श्रीयो० राजप्रश्नो० वर्णनंनामद्विशताधिकषड्शीतितमस्सर्गः॥६॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह सब जगत् चिदाकाशरूप है, दूसरा कुछ बना नहीं । राम ने पूछा, हे भगवन् ! तुम कहते हो कि सब चिदाकाश है, बना कुछ नहीं, तो सिद्ध, साधु, विद्याधर, लोकपाल, देवता इत्यादि जो दिखते हैं, वे कुछ बने क्यों नहीं ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ये जो सिद्ध, साधु, विद्याधर, देवता, लोक और लोकपाल हैं, वे वास्तव में कुछ उपजे नहीं; ब्रह्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है । ये
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जो प्रत्यक्ष दिखते हैं सो शुद्ध संकल्प में रचे हुए हैं। परन्तु वास्तव में कुछ बने नहीं, भ्रम से इनकी सत्यता भासित होती है। जैसे मृगतृष्णा में नदी, रस्सी में सर्प, सीपी में रूपा और संकल्पनगर असत् हैं, वैसे ही आत्मा में यह जगत् है। हे राम! जैसे स्वप्न में नाना प्रकार की रचना दिखती है, परन्तु कुछ हुआ नहीं, वैसे ही यह जगत् है। जो पुरुष इसको देखकर सत्य मानता है, वह असम्यक्दर्शी है। जो आत्मा को देखता है, वही देखता है और वही सम्यक्दर्शी है। हे राम! ये लोक और लोकपाल जगत्सत्ता में ज्यों के त्यों हैं, और जैसे स्थित हैं वैसे ही हैं, परन्तु परमार्थ से कुछ उपजे नहीं, अनुभवसत्ता ही संवेदन से दृश्यरूप होकर भासित होती है और द्रष्टा ही दृश्यरूप होकर भासित होता है। परन्तु स्वरूप से भिन्न कुछ नहीं हुआ। जैसे आकाश और शून्यता, अग्नि और उष्णता में भेद नहीं, वैसे ही ब्रह्म और जगत् में भेद नहीं है। हे राम! अब एक और वृत्तान्त तुम सुनो। स्वप्न में जैसे अब हम हैं, वैसे ही एक आगे भी चित्त-प्रतिमा हुई थी।
पहले एक कल्प में तुम और हम हुए थे। तुम मेरे शिष्य थे और मैं तुम्हारा गुरु था। तुमने एक वन में मुझसे प्रश्न किया था कि हे भगवन्! एक मुझको संशय है उसे मिटाओ। महाप्रलय में नष्ट क्या होता है और अविनाशी क्या रहता है? तब मैंने कहा था, हे तात! जितना शेष विशेषरूप जगत् है, वह सब नष्ट हो जाती है—जैसे स्वप्न का नगर सुपुप्ति में लीन हो जाता है और निर्विशेष ब्रह्मसत्ता शेष रहती है। क्रिया, काल, कर्म, आकाश, पृथ्वी, अप्, तेज, वायु, पहाड़ नदियाँ आदि जो कुछ जगत् क्रिया, काल और द्रव्य से युक्त है, वह सब नष्ट हो जाता है और ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र ये जो कार्य के कारण हैं, उनका नाम भी नहीं रहता। चैतन्य का लक्षणरूप संवेदनशक्ति भी नहीं रहती, केवल अचेत चिन्मात्र एक चिदाकाश ही शेष रहता है। शिष्य बोला, हे मुनीश्वर! जो वस्तु सत्य होती है, उसका नाश नहीं होता, और जो असत्य होती है वह आभासरूप है, पर यह जगत् तो
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विद्यमान दिखता है, वह महाप्रलय में कहाँ जायगा ? गुरु बोले, हे तात ! जो सत्य है उसका नाश कभी नहीं होता और जो असत्य है उसका भाव नहीं है, इसलिए जितना कुछ जगत् तुझको दिखता है, सो सब भ्रममात्र है । इसमें कोई वस्तु भी सत्य नहीं दिखती है । परन्तु जैसे मृगतृष्णा का जल नहीं होता और दूसरा चन्द्रमा व आकाश में तरुवर भ्रममात्र हैं, वैसे ही यह जगत् भी जो दिखता है, वह भ्रममात्र है । जैसे स्वप्न का नगर प्रत्यक्ष भी दिखता है, परन्तु भ्रममात्र है, वैसे ही यह जगत् भी भ्रमरूप जानो ।
हे तात ! आत्मसत्ता सर्वदा सर्वत्र अपने आपमें स्थित है । जैसे स्वप्न में जाग्रत् का और जाग्रत् में स्वप्न का अभाव होता है तो सृष्टि कहाँ जाती है ? जैसे जाग्रत् में स्वप्न की सृष्टि का अभाव हो जाता है, वैसे ही महाप्रलय में इसका अभाव हो जाता है । शिष्य बोला, हे भगवन् ! यह जो दिखता है सो क्या है और जो नहीं दिखता सो क्या है ? इसका रूप क्या है और यह चिदाकाश से कैसे हुआ है ? गुरु बोले, हे शिष्य ! जब शुद्ध चिदाकाश में किञ्चन संवेदन फुरता है, तब जगत्रूप होकर दिखता है, इससे इसका रूप भी चिदाकाश ही है-चिदाकाश से भिन्न कुछ नहीं । सृष्टि और प्रलय दोनों उसी के रूप हैं । जब संवेदन फुरता है, तब सृष्टि दिखती है और जब नहीं फुरती, तब प्रलयरूप भासित होती है, पर दोनों ही उसके रूप हैं । जैसे एक ही वपु में दो स्वरूप हैं-दन्तों से शुक्ल लगता है और केशों से कृष्ण लगता है, वैसे ही आत्मा में सर्ग और प्रलय दो रूप होते हैं । पर दोनों आत्मरूप हैं । जैसे एक ही निद्रा की दो अवस्थाएँ होती हैं-एक स्वप्न और दूसरा सुषुप्ति, पर जाग्रत् में दोनों नहीं होतीं, वैसे ही निद्रारूप संवेदन में सर्ग और प्रलय भासित होता है, पर जाग्रतरूप आत्मा में दोनों का अभाव है । हे तात ! जो कुछ तुमको दिखता है वह सब चिदाकाशरूप है-और कुछ नहीं, ब्रह्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है । जैसे स्वप्न में अपना अनुभव ही जगत्रूप दिखता है, वैसे ही आत्मा में जगत् दिखता है । शिष्य बोला, हे भगवन् ! जो
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इसी प्रकार है कि द्रष्टा ही दृश्यरूप होकर भासता है तो और जगत् तो कुछ न हुआ, सब वही है ।
गुरु बोले, हे तात ! यही बात है । जगत् कुछ वस्तु नहीं, चिदाकाश ही जगतरूप होकर दिखता है । आत्मसत्ता ही इस प्रकार भासित होती है, और कुछ नहीं, क्योंकि सब उर्मी का किञ्चन है । सबमें सर्वदा सब प्रकार वही सृष्टि होकर फुरती है । किसी में किसी समय किसी प्रकार कुछ हुआ नहीं, आत्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है । जो कुछ जगत् दिखता है उसे वही रूप जानो । जिसको तू सर्ग और प्रलय कहता है, वह सब आत्मसत्ता के नाम हैं । वही सबमें सर्वदा सब प्रकार स्थित है । एक ही परमदेव घट-पटरूप हुआ है । पर्वत, पट, जल, तृण, अग्नि, पृथ्वी, आकाश, स्थावर, जङ्गम, अस्ति, नास्ति, शून्य, अशून्य, क्रिया, काल, मूर्ति, अमूर्ति, बन्धन और मोक्ष आदि सब शब्द अर्थ में जो पदार्थ सिद्ध होते हैं, वे सब आत्मरूप हैं । सबमें सर्वदा सब प्रकार आत्मा ही है । और जिसमें सर्वदा सब प्रकार नहीं, वह भी आत्मा ही है, जो सदा ज्यों का त्यों ही है । जैसे स्वप्न में जो कुछ दिखता है, वह सब आत्मसत्ता ही है, और दूसरा कुछ बना नहीं । हे तात ! तृण ही कर्ता है, तृण ही भोक्ता है और तृण ही सर्वेश्वर है । घट कर्ता है, घट भोक्ता है और घट ही सर्वेश्वर है । पट कर्ता है, पट भोक्ता है और पट ही परमेश्वर है । नर कर्ता है, नर भोक्ता है और नर ही सबका ईश्वर है ।
इसी प्रकार एक-एक वस्तु नाम में जो वस्तु है, वह कर्ता, भोक्ता और सर्व ब्रह्मरूप है । ब्रह्मा से लेकर तृण तक जो कुछ जगत् दिखता है, सो सब आत्मरूप है । क्षय, उदय, भीतर, बाहर, कर्ता, भोक्ता सब विज्ञानमात्र ईश्वर है । कर्ता-भोक्ता वही है । और न करना है, न भोक्ता भी वही है । विधि भी वही है और निषेध भी वही है । शुद्ध दृष्टि से सब चिदात्मा ही भासित होता है, जो सब दुःखों से रहित है । जिनको आत्मदृष्टि नहीं प्राप्त हुई, उनका भिन्न-भिन्न जगत् दिखता है, जो अनुभव से भिन्न नहीं है । ऐसे जानकर अपने स्वरूप में स्थित रहो ।
☸ निर्वाण प्रकरण ☸
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हे राम ! इस प्रकार मैंने तुमसे कहा था, परन्तु उससे तुमको अभ्यास की न्यूनता से बोध न हुआ, इसलिए वही संस्कार अब तुमको प्राप्त हुआ है और इसी कारण अब तुम जागे हो । हे राम ! अब तुम अपने स्वरूप में स्थित होकर कृतकृत्य हुए हो, इसलिए अपनी राजलक्ष्मी को भोगो; प्रजा का पालन करो और हृदय से आकाश सम निर्लिप्त रहो । इतिश्रीयोगवाशिष्टेनिर्वाणप्रकरणे द्विशताधिकसप्ताशीतितमसर्गः॥२८७॥
वाल्मीकिजी बोले, हे भरद्वाज ! जब वशिष्ठजी इस प्रकार राम से कह चुके, तब आकाश में स्थित सिद्ध और देवता फूलों की वर्षा करने लगे-मानों मेघ बर्फ की वर्षा करते हों, अथवा आकाश कम्पायमान हुआ हो, उससे तारे गिरते हों । जब वे पुष्पों की वर्षा कर चुके, तब राजा दशरथ उठ खड़े हुए और अर्घ्य-पाद्य दे, पूजन कर हाथ जोड़ कहने लगे-हे मुनीश्वर ! बड़ा कल्याण और हर्ष हुआ, जो तुम्हारे प्रसाद से मैं आत्मपद को पाकर कृतकृत्य हुआ । चित्त का वियोग हुआ है, इससे दृश्य फुरने का भी अभाव हुआ है, और मैं अचित्त, चिन्मात्र हूँ । अब मैं परमपद को पा गया हूँ और मेरे सब सन्ताप मिट गये हैं । संसाररूपी अन्धमार्ग से थका हुआ मैं अब विश्राम को प्राप्त हुआ हूँ । अब में पहाड़ की तरह अचल हूँ । सब आपदा से तर गया हूँ । जो कुछ जानना था, वह जान गया हूँ । हे मुनीश्वर ! तुमने बहुत युक्ति से दृष्टान्त देकर जगाया है । अर्थात् शून्य के दृष्टान्त, सीपी में रूपा मृगतृष्णा का जल, रस्मी में सर्प, आकाश में दूसरा चन्द्रमा और नाव पर नदी के किनारों का चलते दिखना, जल में तरङ्ग, स्वर्ण में भूषण, वायु का फुरना, गन्धर्वनगर, संकल्पपुर आदि दृष्टान्त कहे हैं, जिनसे मैंने तुम्हारी कृपा से यह जान लिया कि आत्मसत्ता से भिन्न कुछ नहीं ।
वाल्मीकिजी बोले, जब इस प्रकार दशरथ कह चुके, तब राम उठे और हाथ जोड़कर इस प्रकार कहने लगे कि हे मुनीश्वर ! तुम्हारी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया । अब मैं परमपद को प्राप्त हुआ हूँ । मुझको किसी में न राग है, न द्वेष । मैं परमशान्ति को प्राप्त हुआ हूँ । न अब मुझे कुछ करने से अर्थ है और न करने में कुछ अनर्थ है । मैं
६२ = ❊ योगवाशिष्ठ ❊
परमशान्तपद को प्राप्त हुआ हूँ। हे मुनीश्वर ! तुम्हारे वचनों को स्मरण कर में आश्चर्य को प्राप्त होकर हर्षित होता हूँ। मेरे सब सन्देह नष्ट हो गये हैं। अब मुझको और कुछ नहीं दिखता, सब ब्रह्म ही दिखता है। लक्ष्मण बोले, हे भगवन् ! मैं सन्तों के वचन इकट्ठे करता रहा था, और सब जो मेरे पुण्य थे, वे अब इकट्ठे हुए थे, जिन सबका फल अब उदय हुआ है। तुम्हारी कृपा से अब मैं सब संशयों से रहित होकर परम पद को प्राप्त हुआ हूँ। तुम्हारे वचन चन्द्रमा की किरणों के समान शीतल हैं, किन्तु उनसे भी अधिक हैं। इनसे मैंने परम शान्ति पाई है और मेरे सब दुःख सन्ताप नष्ट हो गये हैं। शत्रुघ्न बोले, हे मुनीश्वर ! जगत् और मृत्यु का जो भय था, वह तुमने दूर कर दिया और अपने अमृत-रूपी वचनों का सुधापान कराया है। अब मेरे सब संशय नष्ट हो गये और मैं आत्मपद को प्राप्त हुआ हूँ। हमारे जो चिरकाल के पुण्य थे, उनका फल आज पाया।
विश्वामित्र बोले, हे मुनीश्वर ! सब तीर्थों के स्नान और दूसरे कर्मों में भी मनुष्य ऐसा पवित्र नहीं होता जैसे तुम्हारे वचनों से मैं पवित्र हुआ हूँ। आज मेरे कान पवित्र हुए। नारदजी बोले, हे मुनीश्वर ! ऐसा मोक्ष का उपाय मैंने देवताओं और सिद्धों के स्थान में भी नहीं सुना। ब्रह्मा के मुख से भी नहीं सुना, जैसा कि तुमने उपदेश किया है। इसके श्रवण करने से फिर संशय नहीं रहता। फिर दशरथ बोले, हे मुनीश्वर ! आत्मज्ञान जैसी सम्पदा कोई नहीं है। तुमने यह परम सम्पदा हमको दी है, जिसके पाने से फिर किसी पदार्थ की इच्छा नहीं रही। अब तो हम अपने स्वभाव में स्थित हुए हैं, और सम्पूर्ण कर्म हमको छोड़ गये हैं। हमारे बहुत जन्मों के पुण्य इकट्ठे हुए थे, उनके फल से ये तुम्हारे पावन वचन सुने हैं। रामजी बोले, हे मुनीश्वर ! बड़ा हर्ष हुआ कि यह सर्वसम्पदा का अधिष्ठान मुझे प्राप्त हुआ और सब आपदाओं का अन्त हुआ। ज्ञान से रहित जो अज्ञानी हैं, वे बड़े अभागे हैं। जो आत्मपद को त्यागकर अनात्मपदार्थ की ओर दौड़ते हैं, वे भी यत्न करके प्राप्त होते हैं, पर उनसे विमुख होने पर ही आत्मपद प्राप्त होता
❋ निर्वाण प्रकरण ❋
<p align="right">६२६</p>है। उसी आत्मपद को पाकर मैं शान्तियुक्त और हर्षशोक से रहित हुआ हूँ। मैंने अचलपद पाया है। मैं अब अजित अविनाशी सदा अपने आपमें स्थित हूँ। तुम्हारी कृपा से आपको ऐसा जानता हूँ।
लक्ष्मण बोले, हे मुनीश्वर ! सहस्र सूर्य एकत्र उदय होकर भी हृदय के तम को दूर नहीं कर सकते, पर वह तम तुमने दूर किया है। सहस्र चन्द्रमा इकट्ठे उदय हों तो भी हृदय की तपन निवृत्त नहीं कर सकते, पर तुमने सम्पूर्ण तपन निवृत्त की है। हम निःसंताप पद को प्राप्त हुए हैं। वाल्मीकिजी बोले, हे साधु ! जब इस प्रकार सब कह चुके, तब वशिष्ठजी ने कहा—हे राम ! इस मोक्ष उपाय-कथा को सुनकर सब ब्राह्मणों का यथायोग्य पूजन और दान करो। जो इतर जीव हैं, वे भी यथायोग्य यथाशक्ति पूजन करते हैं, तुम तो राजा हो। जब इस प्रकार वशिष्ठजी ने कहा, तब राजा दशरथ ने उठकर सहस्र मथुरावासी विद्वान् ब्राह्मणों को भोजन कराया, दक्षिणा, वस्त्र, भूषण, घोड़े, गाँव आदि दिये, यथायोग्य पूजन किया। निदान बड़ा उत्साह हुआ। अङ्गना नृत्य करने लगीं और नगाड़े, शहनाई आदि बाजे बजने लगे चक्रवर्ती राजा दशरथ ने बड़ा उत्सव किया। इस प्रकार सात दिन तक ब्राह्मणों, अतिथियों और निर्धनों को द्रव्य देकर राजा ने पूजन किया और अन्न और वस्त्र आदि देकर सबको प्रसन्न किया।
इति श्रीयो० नि० द्विशताधिकाष्टाशतितमस्सर्गः ॥ २८८ ॥
वाल्मीकिजी बोले कि हे भरद्वाज ! इस प्रकार वशिष्ठ मुनि के वचन सुनकर सब रघुवंशी कृतकृत्य हुए। जैसे रामजी सुनकर संशयरहित जीवन्मुक्त होकर विचरे हैं वैसे ही तुम भी विचरो। यह मोक्ष-उपाय ऐसा है कि जो अज्ञानी श्रवण करे तो वह भी परमपद को प्राप्त हो। तुम्हारी क्या बात है, तुम तो पहले से भी बुद्धिमान् हो। जिस प्रकार मुझसे ब्रह्माजी ने कहा था, वह मैंने तुमको सुना दिया। जैसे रामचन्द्र आदि कुमार और दशरथ आदि राजा जीवन्मुक्त होकर विचरे हैं, वैसे ही तुम भी विचरो। उनमें मोह भी दिखता था, पर वे स्वरूप से चलायमान नहीं हुए। ज्ञान जैसा सुख और कोई नहीं, और अज्ञान जैसा दुःख भी कोई