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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

६३० ❁ योगवाशिष्ट ❁

नहीं। इससे अधिक क्या कहिये। यह जो मोक्ष-उपाय मैंने तुमसे कहा वह परमपावन है। यह संसारसमुद्र से पार करनेवाला है, दुःखरूपी अन्धकार का नाशक सूर्य है और सुखरूपी कमल की खानि का तालाब है। जो पुरुष इसका बारम्बार विचार करेगा, वह यदि महामूर्ख हो तो भी शान्तपद को प्राप्त होगा। जो कोई इस मोक्ष-उपाय को पढ़ेगा, कहेगा, सुनेगा, लिखेगा, अथवा लिखकर पुस्तक देगा, उसके हृदय में जो कामना होगी, वह पूर्ण होगी। वह ब्रह्मलोक को प्राप्त होगा और राजसूययज्ञ का फल पावेगा। फिर विचारकर ज्ञान पाकर मुक्त होगा।

हे अङ्ग! यह मोक्ष उपाय बड़ा शास्त्र है। इसमें बड़ी कथा है और नाना प्रकार की युक्तियाँ हैं। जिन कथाओं और युक्तियों से वशिष्ठजी ने राम को जगाया था, वे मैंने तुझको सुनाई हैं। अपने उपदेश से उन्होंने उनको जीवन्मुक्त किया था और कहा था कि तुम राजलक्ष्मी भोगो। वही मैंने भी तुमसे कहा है कि जीवन्मुक्त होकर अपने तपकर्म में सावधान हो रहो, और आत्मसत्ता में निश्चय रखना। जिस उपदेश से रघुवंशी कृतकृत्य हुए, वह मैंने तुमसे ज्यों का त्यों कहा है। इस निश्चय को रखकर कृतकृत्य हो जाय। इसमें जितने इतिहास और कथा हैं, उनके भिन्न-भिन्न नाम सुनो। वैराग्यप्रकरण में राम के सम्पूर्ण प्रश्न हैं। मुमुक्षुप्रकरण में शुकनिर्वाण ही कहा है। उत्पत्तिप्रकरण में ये आठ आख्यान कहे हैं—एक आकाशज का, दूसरा लीला का, तीसरा सूची का, चतुर्थ इन्द्र-ब्राह्मण के पुत्रों का, पञ्चम कृत्रिम इन्द्र और अहल्या का, छठा चित्तोपाख्यान, सप्तम वाल्मीकि की कथा और अष्टम साम्बर का आख्यान। स्थितिप्रकरण में चार आख्यान हैं—एक भृगु के पुत्र का, दूसरा दामव्याल और कट का, तीसरा भीम, भाम, दट का और चतुर्थ दासुर का। उपशमप्रकरण में एकादश आख्यान कहे हैं—एक जनक की सिद्धगीता, दूसरा पुण्यपावन, तीसरा बलि को विज्ञान की प्राप्ति का वृत्तान्त, चतुर्थ प्रह्लादविश्रान्ति, पञ्चम गाधि का वृत्तान्त, छठा उद्दालकनिर्वाण, सप्तम स्वर्गनिश्चय, अष्टम परिघनिश्चय, नवम भाम,

६३० ❊ योगवाशिष्ठ ❊

नहीं । इससे अधिक क्या कहिये । यह जो मोक्ष-उपाय मैंने तुमसे कहा वह परमपावन है । यह संसारसमुद्र से पार करनेवाला है, दुःखरूपी अन्धकार का नाशक सूर्य है और सुखरूपी कमल की खानि का तालाब है । जो पुरुष इसका बारम्बार विचार करेगा, वह यदि महामूर्ख हो तो भी शान्तपद को प्राप्त होगा । जो कोई इस मोक्ष-उपाय को पढ़ेगा, कहेगा, सुनेगा, लिखेगा, अथवा लिखकर पुस्तक देगा, उसके हृदय में जो कामना होगी, वह पूर्ण होगी । वह ब्रह्मलोक को प्राप्त होगा और राजसूययज्ञ का फल पावेगा । फिर विचारकर ज्ञान पाकर मुक्त होगा ।

हे अङ्ग ! यह मोक्ष उपाय बड़ा शास्त्र है । इसमें बड़ी कथा है और नाना प्रकार की युक्तियाँ हैं । जिन कथाओं और युक्तियों से वशिष्ठजी ने राम को जगाया था, वे मैंने तुझको सुनाई हैं । अपने उपदेश से उन्होंने उनको जीवन्मुक्त किया था और कहा था कि तुम राजलक्ष्मी भोगो । वही मैंने भी तुमसे कहा है कि जीवन्मुक्त होकर अपने तपकर्म में सावधान हो रहो, और आत्मसत्ता में निश्चय रखना । जिस उपदेश से रघुवंशी कृतकृत्य हुए, वह मैंने तुमसे ज्यों का त्यों कहा है । इस निश्चय को रखकर कृतकृत्य हो जाय । इसमें जितने इतिहास और कथा हैं, उनके भिन्न-भिन्न नाम सुनो । वैराग्यप्रकरण में राम के सम्पूर्ण प्रश्न हैं । मुमुक्षुप्रकरण में शुक्रनिर्वाण ही कहा है । उत्पत्तिप्रकरण में ये आठ आख्यान कहे हैं—एक आकाशज का, दूसरा लीला का, तीसरा सूची का, चतुर्थ इन्द्र-ब्राह्मण के पुत्रों का, पञ्चम कृत्रिम इन्द्र और अहल्या का, छठा चित्तोपाख्यान, सप्तम वाल्मीकि की कथा और अष्टम साम्बर का आख्यान । स्थितिप्रकरण में चार आख्यान हैं—एक भृगु के पुत्र का, दूसरा दामब्याल और कट का, तीसरा भीम, भास, दृढ का और चतुर्थ दासुर का । उपशमप्रकरण में एकादश आख्यान कहे हैं—एक जनक की सिद्धगीता, दूसरा पुण्यपावन, तीसरा बलि को विज्ञान की प्राप्ति का वृत्तान्त, चतुर्थ प्रह्लादविश्रान्ति, पञ्चम गाधि का वृत्तान्त, छठा उद्दालकनिर्वाण, सप्तम स्वर्गनिश्चय, अष्टम परिघनिश्चय, नवम भास,

✽ निर्वाण प्रकरण ✽ ६३१

दशम विलाससंवाद और एकादश वीतव । निर्वाणप्रकरण में २७ आख्यान कहे हैं—भुशुण्डि और वशिष्ठ का, महेश और वशिष्ठ का, शिलाकोश का, उपदेश अर्जुनगीता, स्वप्नसत्यरुद्र, वेताल का, भगीरथ का, गङ्गा अवतरण, शिखध्वज का, वृहस्पतिकचप्रबोध, मिथ्यापुरुष का, शृङ्गी गण का, इक्ष्वाकुनिर्वाण, मृगव्याध-दृष्टान्त, वलबृहस्पति, मङ्गीनिर्वाण, विद्याधर का, हरिणोपाख्यान, आख्यानोपाख्यान, विपश्चित् की कथा, शिवि का, शिला का, इन्द्र ब्राह्मण के पुत्रों का, कुन्ददन्त का, महा-प्रश्न उत्तरवाक्य, शिष्य-गुरु-महोत्सव और ग्रंथप्रशंसाफल, चतुष्टय-प्रकरणों में सब पचास आख्यान वर्णन किये गये हैं ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे महारामायणे वशिष्ठरामचन्द्रसंवादे निर्वाणप्रकरणे मोक्षोपायवर्णनं नाम द्विशताधिकैकोननवतितमस्सर्गः ॥ २८६ ॥

श्रीयोगवासिष्ठ के निर्वाणप्रकरण का उत्तरार्द्ध समाप्त ।

इति


श्रीमती कमला भार्गव द्वारा—तेजकुमार प्रेस (प्रा०) लिमिटेड, लखनऊ में मुद्रित ।