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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1701, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1701

💥 निर्वाण प्रकरण 💥 ८६६

उष्णता का नाश करने को पूर्णमासी का चन्द्रमा है । सुहृदता और समता सौभाग्यरूपी जल का नीचा स्थान है । जैसे जल नीचे स्थान में स्वाभाविक ही चला जाता है, वैसे ही सुहृदता में सौभाग्य स्वाभाविक होता है । जैसे चन्द्रमा की किरणों के अमृत से चकोर तृप्त होता है, वैसे ही आत्मारूपी चन्द्रमा की समता और सुहृदतारूपी किरणों को पाकर ब्रह्मादिक चकोर तृप्त होकर आनन्दित होते और जीते हैं। हे राम ! वह ज्ञानवान् ऐसी कान्ति से पूर्ण है, जो कभी क्षीण नहीं होती । पूर्णमासी के चन्द्रमा में भी उपाधि दिखती है, परन्तु ज्ञानवान् के मुख में वैसी भी उपाधि नहीं । जैसी उत्तम चिन्तामणि की कान्ति होती है, वैसी ही ज्ञानवान् की कान्ति होती है, जो रागद्वेष से कभी क्षीण नहीं होती । वह सदा प्रसन्न रहता है । हे राम ! समता ही मानों सौभाग्यरूपी कमल की व्यानि है । समदृष्टि पुरुष ऐसे आनन्द के लिए जगत् में विचरता है और प्राकृत आचार को करता है । वह भोजन करता है, ग्रहण करता है, या कुछ लेता-देता है । सब लोग उसके कर्तृत्व की स्तुति करते हैं । हे राम ! ऐसा पुरुष ब्रह्मादिक का भी पूजनीय है । सभी उसका मान करते हैं, सब उसके दर्शन की इच्छा करते हैं और दर्शन करके प्रसन्न होते हैं ।

जैसे सूर्य के उदय होने पर सूर्यमुखी कमल खिल आते हैं और सब उल्लास को प्राप्त होते हैं, वैसे ही उसका दर्शन करके सब आह्लादित होते हैं । वह शुभ आचार ही करता है । जो कुछ अन्यथा भी कर बैठता है तो भी लोग उसकी निन्दा नहीं करते, क्योंकि वे जानते हैं कि यह समदर्शी है । समता से वह सबका सुहृद होता है शत्रु भी उसके मित्र हो जाते हैं । जिनमें समताभाव उदय हुआ है, उनको अग्नि जला नहीं सकती; जल नहीं डुबा सकता और वायु नहीं सुखा सकती । वह जैसी इच्छा करे वैसी ही सिद्धि होती है । हे राम ! जिसको समता प्राप्त हुई है, वह पुरुष निरुपम हो जाता है, और उसको कोई संसार की उपमा नहीं दे सकता । जिसको समता नहीं प्राप्त हुई, वह सबके संग सुहृदता का अभ्यास करे तो जो उसका शत्रु हो वह भी मित्र हो