योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह सम्पूर्ण सिद्धान्त मैंने तुमसे विस्तारपूर्वक कहा है । इसको सुनने और बारम्बार विचारने से मूढ़ भी निरावरण होंगे । फिर उत्तम पुरुष के निगावरण होने में क्या आश्चर्य है । हे राम ! यह में भी जानता हूँ कि तुम विदितवेद्य हुए हो । प्रथम मैंने उत्पत्तिप्रकरण में तुमसे कहा है कि जगत् की उत्पत्ति चित्तसंवेदन से हुई है । फिर स्थितिप्रकरण में कहा है कि जगत् की स्थिति इस प्रकार हुई है । उत्पत्ति यह कि चित्तसंवेदन के फुरने से जगत् उपजा है और संवेदन फुरने की दृढ़ता से ही उसकी स्थिति हुई है । उसके उपरान्त उपशमप्रकरण में कहा है कि मन इस प्रकार स्फुरण रहित होता है । जब चित्त का उपशम हुआ, तब परम कल्याण हुआ । मन के फुरने का नाम संसार है । जब मन का उपशम हो जाता है, तब संसार की कल्पना मिट जाती है । यह सब विस्तारपूर्वक कहा है । परन्तु अब जानता हूँ कि तुम बोधवान् हुए हो । हे राम ! मैंने तुमसे पहले भी आत्मज्ञान का उपाय कहा है और जिनको ज्ञान प्राप्त हुआ है उनके लक्षण भी कहे हैं । अब फिर भी संक्षेप से कहता हूँ । प्रथम बालअवस्था में सज्जनों का संग करना और सत्शास्त्रों को विचारना चाहिए । इस शुभ आचार से, अभ्यास द्वारा, जब आत्मपद की प्राप्ति होती है, तब समता होती है और मनुष्य सबका सुहृद् हो जाता है । सौहार्द परमानन्द का जनक है और जननी की तरह सदा संग रहता है । जैसे सुन्दर पुरुष को देखकर उसकी स्त्री प्रसन्न होती है और उसके लिए प्राण का देना भी स्वीकार करती है, पर उस पुरुष को नहीं त्यागती, वैसे ही जिस ज्ञानवान् पुरुष की ब्रह्म लक्ष्मी से सुन्दर कान्ति है, उसकी समता, मुदिता और सुहृदतारूपी स्त्री नहीं त्यागती; सदा उसके हृदयरूपी कण्ठ में लगी रहती है और वह पुरुष सदा प्रसन्न रहता है ।
हे राम ! जिसको देवताओं का राज्य प्राप्त होता है वह भी ऐसा प्रसन्न नहीं होता और जिसको सुन्दर स्त्रियाँ प्राप्त होती हैं, वह भी ऐसा प्रसन्न नहीं होता, जैसा ज्ञानवान् प्रसन्न होता है । हे राम ! समता तो द्विधारूपी अन्धकार का नाशक सूर्य है । वह तीनों तापरूपी