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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1699, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1699

८६६ ❊ योगवासिष्ठ ❊

जीव दूसरे शास्त्ररूपी वन को वैराग्य और अभ्यासरूपी यत्न से खोजे, तब आत्मज्ञानरूपी चिन्तामणि पाता है ।

हे राम ! वन में ही उसने चिन्तामणि पाई थी, क्योंकि वहाँ चिन्तामणि का वन था । परन्तु जब अभ्यास किया था, तब पाई थी और उसी वन में पाई थी । वैसे ही गुरु और शास्त्र का भी जब मिट्टी के खोदने के समान अभ्यास करता है, तब आप चिन्तामणि ही सदृश आत्मप्रकाश होता है । जैसे मिट्टी के खोदने से चिन्तामणि का प्रकाश नहीं उपजता, क्योंकि चिन्तामणि तो पहले ही प्रकाशरूप थी, खोदने से केवल आवरण दूर हुआ, तब आप ही निकल आई, वैसे ही गुरु और शास्त्रों के वचन के अभ्यास से अन्तःकरण जब शुद्ध होता है, तब आत्मसत्ता स्वतः प्रकट होती है । गुरु और शास्त्र हृदय की मलीनता दूर करते हैं, और जब मलिनता दूर होती है, तब आत्मसत्ता स्वाभाविक प्रकाशित होती है । इससे गुरु और शास्त्रों से मलीनता दूर होती है परन्तु इनकी कल्पना भी द्वैत में होती है । वह कल्पना द्वैत संसार का नाश करनेवाली है । परमार्थ की अपेक्षा शास्त्र और गुरु भी द्वैत कल्पना है, और अज्ञानी की अपेक्षा गुरु और शास्त्र कृतार्थ करते हैं और इनके अभ्यास से जीव आत्मपद पाता है । प्रथम अज्ञानी शास्त्र का भोग के निमित्त सेवन करते हैं और शास्त्र में भोग का अर्थ जानते हैं, जैसे लकड़ियों के लिए वे किटक वन का सेवन करते थे । शास्त्र में सब कुछ है । जैसा जिसको रुचि के अनुसार अभ्यास होता है वैसे ही पदार्थ उसको उससे प्राप्त होते हैं । शास्त्र एक ही है, परन्तु पदार्थों में भेद है । जैसे पौंड़े के रस से गुड़, शकर और मिसरी बनती है, वैसे ही शास्त्र एक है, उसमें पदार्थ भिन्न-भिन्न हैं । जिस-जिस अर्थ के पाने के लिए कोई यत्न करेगा, उसी को पावेगा । शास्त्र में भोग भी हैं और मोक्ष भी है । अज्ञानी भोग के निमित्त यत्न करते हैं, परन्तु वे भी धन्य हैं, क्योंकि शास्त्र का तो सेवन करने लगे । उन्हें कभी किसी काल में आत्मपदरूपी चिन्तामणि भी प्राप्त होगी । परन्तु आत्मपद पाने के लिए ही शास्त्र श्रवण करना चाहिए । सुन-सुनकर अभ्यास द्वारा आत्मपद