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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1698, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1698

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ८६५

हुआ। जिनको चन्दन की लकड़ी प्राप्त हुई, उनका उदर पूर्ण होने से और भी सन्ताप मिटे। और जिनको चिन्तामणि प्राप्त हुई, उनके सब सन्ताप मिट गये और वे परमैश्वर्यमान् हुए। परन्तु सबको वन से प्राप्त हुआ और जो वन के निकट उद्यम करने न गये, घर ही बैठे रहे, उन्होंने दुःखित होकर प्राणों को त्याग दिया, परन्तु सुख न पाया।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे चिन्तामणिप्राप्तिर्नाम द्विशताधिकसप्तसप्ततितमस्सर्गः ॥ २२७ ॥

राम ने पूछा, हे भगवन् ! यह जो तुमने किटक का वृत्तान्त कहा उसका तात्पर्य मैंने कुछ न जाना। वे किटक कौन-कौन थे; वह वन क्या था और आपदा क्या थी, सो कृपा करके प्रकट कहो। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ये सब जीव जो तुम देखते हो, वे किटक हैं। उन पर अज्ञानरूपी आपदा पड़ी है। आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक तापों की चिन्ता से वे जलते हैं। आध्यात्मिक काम-क्रोधादिक मानस दुःख हैं। वात, पित्त, कफ आदिक आधिभौतिक देह के दुःख हैं। और आधिदैविक वे दुःख हैं, जो ग्रहों से अनिच्छित प्राप्त हैं। हे राम ! उनमें प्रयत्न करके जो जीव शास्त्ररूपी वन में गये वे सुखी हुए और जो अर्थी सुख के निमित्त शास्त्ररूपी वन को सेवते हैं, उनको सत्य कर्मरूपी लकड़ियाँ प्राप्त होती हैं, जिनसे नरकरूपी उदरपूर्ति का जो दुःख था, वह निवृत्त होता है और वे स्वर्गरूपी सुख पाते हैं। फिर शास्त्ररूपी वन का सेवन करते-करते उपासनारूपी चन्दनवृक्ष प्राप्त होता है, उससे और दुःख भी निवृत्त होते हैं और वे विशेष सुख पाते हैं। जब जीव अपने इष्टदेव की सेवा करता है, तब स्वर्गादिक विशेष सुख पाता है और अपने स्थान को प्राप्त होता है। फिर जब शास्त्ररूपी वन को ढूँढ़ता है, तब विचाररूपी रत्नविशेष पाता है। जब सत्य-असत्य का विचार प्राप्त होता है, तब सब दुःख नष्ट हो जाते हैं। यह जो सुख प्राप्त होता है, वह शास्त्र से ही होता है। जैसे चन्दन और लकड़ियाँ आदि पदार्थ वन में प्रकट थे और चिन्तामणि गुप्त थी, वैसे ही और शास्त्रों में धर्म, अर्थ और काम प्रकट है, पर ज्ञानरूपी चिन्तामणि गुप्त है। जब

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