योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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भी उसे वाणी से कह नहीं सकते। तो ऐसा अ-चेत चिन्मात्र आत्मतत्त्व शास्त्र से कैसे जाना जा सकता है? शास्त्र तो अविच्छेद प्रतियोगी करके कहते हैं, सो वह सविकल्प है। पर सविकल्प से निर्विकल्प पद कैसे जाना जाता है? उसे फिर गुरु और शास्त्र से कैसे जानिये? विकल्परूप शास्त्र हैं। उनमें भी चार अर्थ मिलता है। परन्तु विकल्प परिच्छेद प्रतियोगी जो उसके साथ हैं, उनसे सर्वात्मा क्योंकर जानिये? वशिष्ठजी बोले, हे राम! वह न गुरु और शास्त्र से जाना जाता है और न गुरु और शास्त्र के बिना भी जाना जाता है। हे राम! नाना प्रकार के जो विकल्परूप शास्त्र हैं, उनसे निर्विकल्परूप कैसे जानता है, सो यह भी सुनो। हे राम! व्यवधान देश के किटक-जाति के कुछ लोग थे, जो गृहस्थी में रहते थे। निदान एक समय उन पर आपदा पड़ी और वे चिन्ता से दुर्बल होने लगे। उन्हें भोजन भी न जुरता। जैसे वसन्त-ऋतु की मञ्जरी ज्येष्ठ-आषाढ़ की धूप से सूख जाती है, जैसे जल से निकला कमल सूख जाता है, वैसे ही किटक सम्पदारूपी जल से निकलकर आपदारूपी धूप में सूख गये। तब उन्होंने विचार किया कि किसी प्रकार हमारा पेट भरे, इसलिए हम वन में जाकर लकड़ी चुनें, जिससे हमारा कष्ट दूर हो।
हे राम! यों विचार कर वे वन में गये और लकड़ियाँ ले आये। इसी प्रकार वे लकड़ियाँ ले आते और बाजार में बेचकर पेट भरते थे। जब कुछ काल व्यतीत हुआ, तब उनमें से किसी एक ने चन्दन की लकड़ी पहचानी और उससे विशेष द्रव्य पाया। इसी प्रकार एक को ढूँढ़ते-ढूँढ़ते रत्न प्राप्त हुए। इस प्रकार उनको विशेष ऐश्वर्य प्राप्त हुआ, इसलिए उन्होंने लकड़ी बेचना छोड़ दिया। वे फिर यह सोचकर और स्थान ढूँढ़ने लगे कि इस से भी विशेष कुछ फायदा मिले। वन की पृथ्वी को खोदते-खोदते उनको चिन्तामणि मिली, इसलिए वे बड़े ऐश्वर्य-शाली हो गये। जैसे ब्रह्मा, इन्द्रादिक हैं, वैसे ही हो गये। हे राम! जिन्होंने उद्यम करके वन का सेवन किया था, उनको बड़ा सुख प्राप्त हुआ। लकड़ियाँ उठाते-उठाते उनका उदर पूर्ण हुआ और दुःख निवृत्त