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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1696, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1696

⚛ निर्वाण प्रकरण ⚛ ८६३

मुझको अपना ही केवल अद्वैतरूप भासित होता है, और जगत् की कोई कलना नहीं फुरती। जैसे स्वप्न से जागे को स्वप्न की सृष्टि नहीं फुरती, कल्पना से रहित आप ही अद्वैत भासित होता है, वैसे ही मुझको जगत् कल्पना से रहित अपना ही आप भासित होता है। हे मुनीश्वर ! निगम आदि जो शास्त्र में उनका उल्लंघन कर मैंने ये वचन कहे हैं, परन्तु जो मेरे हृदय में है वही कहा है। जो कुछ हृदय में होता है, वही बाहर वाणी से कहा जाता है। जैसे जो बीज बोया है, उसी का अंकुर निकलता है, बीज के बिना अंकुर नहीं निकलता, वैसे ही जो कुछ मेरे हृदय में है, वही वाणी से कहता हूँ। यह विद्या सब प्रमाणों से सिद्ध है। हे मुनीश्वर ! जिसको यह दशा प्राप्त है, वही इसे जानता है और कोई नहीं जान सकता। जैसे जिसने मद्यपान किया है, वही उन्मत्तता को जानता है, और कोई नहीं जान सकता, वैसे ही जो ज्ञानवान् है, वही आत्मरस को जानता है, और कोई नहीं जानता। उस आत्मरस के पाने से फिर कोई कल्पना नहीं रहती। हे मुनीश्वर ! मैं आत्मा, अजन्मा, अविनाशी और परमशान्तरूप हूँ। उभय-एक की कल्पना से रहित, अ-चेत, चिन्मात्र हूँ। जगद्रूप हुए की तरह भी मैं भासित होता हूँ, पर निराभास हूँ। मुझमें आभास की कोई वस्तु नहीं; क्योंकि निराकार हूँ। इस प्रकार मैंने अपने को यथार्थ चिन्मात्र जाना है।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे रामविश्रान्तिवर्णनं नाम द्विशताधिकषट्सप्ततितमसर्गः ॥ २७६ ॥

वाल्मीकिजी बोले, हे भरद्वाज ! इस प्रकार कहकर रामचन्द्र एक मुहूर्तभर चुप हो गये, अर्थात् उन्होंने परमात्मपद में विश्रान्ति पाई, उनकी इन्द्रियों की और मन की वृत्ति का आत्मपद में उपशम हुआ। उसके उपरान्त जान बूझकर कमलनयन राम ने लीला के लिए यों प्रश्न किया—हे संशयरूपी मेघ के नाशक शरत्काल ! मुझको एक हलका सा संशय हुआ है, उसे दूर करो । हे मुनीश्वर ! आत्मपद अव्यक्त और अचिन्त्य है, अर्थात् इन्द्रियों का और मन का विषय नहीं है। वह मन के चिन्तन में भी नहीं आता। जो बड़े महापुरुष हैं, वे