योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1695, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें८६२ ☸ योगवासिष्ठ ☸
स्थावर-जङ्गम जगत् को रचा है—उसी के समष्टि शरीर का नाम विराट् है। जैसे स्वप्न का पर्वत हो, वैसे ही यह विराट् पुरुष आकाशरूप है। जब वह आप ही आकाशरूप है, तब उसका रचा जगत् मैं क्यों पूछूँ? जैसे स्वप्न की मृत्तिका आकाशरूप है, अर्थात् जो उपजी ही अनउपजी है, तो उसके पात्रों को मैं क्यों पूछूँ? इसलिए न कोई विराट् है और न उसका जगत् है, मिथ्या ही विराट् है और मिथ्या ही उसकी चेष्टा है। केवल आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। न कोई जगत् है और न कोई उसका विराट् है। जैसे स्वप्न का पर्वत आभासमात्र होता है, वैसे ही यह जगत् आकार दिखता है।
जैसे बीज से वृक्ष होता है, वैसे ही ब्रह्म से जगत् प्रकट हुआ है। बल्कि, यह भी कैसे कहिये? बीज तो साकार होता है और उसमें वृक्ष का सद्भाव रहता है, जो परिणाम से वृक्ष होता है, पर आत्मा ऐसे कैसे हो? वह तो निराकार है और उसमें जगत् नहीं है, क्योंकि वह निर्विकार, अद्वैत और निर्वेद है। उसको जगत् का कारण कैसे कहिये? न कोई जाग्रत है, न स्वप्न है और न सुषुप्ति है। ये अवस्थाएँ भी आकाशमात्र हैं। आत्मा परिणाम भाव को नहीं प्राप्त होता। वह तो सदा अपने आपमें स्थित है। हे मुनीश्वर! मैं, तुम, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, सब आकाशरूप हैं और अब मुझको सब आत्मा ही भासित होता है। हे मुनीश्वर! एक सविकल्पज्ञान है और दूसरा निर्विकल्पज्ञान। सो वह आकाश सदृश अचेत्य चिन्मात्र है। जो दृश्य के सम्बन्ध से रहित है, उसे आकाश-मा निर्मल जानो। वही निर्विकल्पज्ञान है। जिनको यह ज्ञान प्राप्त हुआ है, वे महापुरुष हैं, उनको मेरा नमस्कार है। और जिनको दृश्य का संयोग है, वे सविकल्प ज्ञानी हैं। वे संसारी हैं और उनकी विषमता सहित जगत् भिन्न-भिन्न दिखता है। परन्तु तो भी भिन्न कुछ नहीं है। जैसे समुद्र में नाना प्रकार के तरंग उठते हैं, वे सभी जल-स्वरूप होते हैं, वैसे ही भिन्न-भिन्न जीव और उनका ज्ञान है। तो भी मुझको अपना ही रूप भासित होता है।
जैसे अवयवी को सब अङ्ग अपने ही लगते हैं, वैसे ही सब जगत्