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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1694, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1694

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ८६१

जगता, वैसे ही उनको कुछ कर्तृत्व बुद्धि नहीं उपजती, क्योंकि उनके हृदय में देहाभिमान नहीं रहा है और वे चिन्मात्र स्वरूप में स्थित हुए हैं। वह आत्मपद परम शान्तरूप और द्वैत-कलना से रहित, एक है। ऐसा जो पद है, उसे ज्ञानवान् आत्मज्ञान से जानता है। इसी को निर्वाण और इसी को मोक्ष कहते हैं। हे राम! ऐसा जो पद है, उसमें मैं सदा स्थित हूँ। ब्रह्मा, विष्णु आदि जो ज्ञानवान् हैं, वे भी उसी पद में स्थित हैं। वे नाना प्रकार की चेष्टा करते भी दिखते हैं, परन्तु सदा शान्तरूप हैं। उनको क्रिया और समाधि में एक ही आत्मपद का निश्चय रहता है। जैसे वायु स्पन्दन और निस्पन्द में एक ही है और जल और तरङ्ग ठहरने में एक ही है, वैसे ही ज्ञानी दोनों में सम है। जैसे आकाश और शून्यता में भेद नहीं वैसे ही आत्मा और जगत् में भेद नहीं है।

राम ने पूछा, हे भगवन्! तुम्हारी कृपा से मुझको कोई कलना नहीं फुरती। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र से लेकर तृण तक जो कुछ जगत् है, वह सब मुझको आकाशरूप भासित होता है। सर्वदा सब प्रकार में अपने आपमें स्थित, अच्युत और अद्वैतरूप हूँ। मुझमें जगत् की कलना कोई नहीं। चित्तसंवेदन द्वारा मैं ही जगतरूप भासित होता हूँ, पर स्वरूप से कभी चलायमान नहीं होता। मैं अचेत्य चिन्मात्र-स्वरूप हूँ। अपने से भिन्न मुझको कुछ नहीं भासित होता। वशिष्ठजी बोले, हे राम! मैं जानता हूँ कि तुम जागे हो, परन्तु अपने दृढ़बोध के लिए मुझसे फिर प्रश्न करो कि "यह जगत् है नहीं तो दिखता क्या है?" राम बोले, हे भगवन्! मैं तुमसे तो तब पूछूँ जो मुझको जगत् का आकार दिखता हो। मुझको तो जगत् कुछ दिखता ही नहीं। जैसे संकल्प का अभाव होने पर संकल्प की चेष्टा भी नहीं भासित होती; जैसे बाजीगर की माया का अभाव होने पर बाजी नहीं रहती; अथवा स्वप्न के अभाव होने पर स्वप्न की सृष्टि नहीं दिखती और भविष्यत्कथा के पुरुष नहीं भासित होते; वैसे ही मुझको जगत् नहीं दिखता; तब फिर मैं किसका संशय उठाऊँ? आदि में जो संवेदन फुरा है, वह विराट् पुरुष होकर स्थित हुआ है, और उसी ने आगे देश, काल, पदार्थ,