योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1693, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें८६० योगवाशिष्ट
से सम्पन्न और परम सम्पदा की खान है । बड़ा पण्डित हो परन्तु तृष्णा सहित हो, उसे परम मूर्ख जानिये । उसको बोध की प्राप्ति कदापि न होगी । जैसे चित्र की अग्नि शीत को नहीं दूर करती, वैसे ही उसकी मूर्खता को पण्डित भी नष्ट नहीं कर सकता । हे मुनीश्वर ! सहस्रों में कोई विरला पुरुष तृष्णा से रहित होता है । जैसे पिंजड़े में पड़ा सिंह पिंजड़े को तोड़कर निकले, वैसे कोई विरला ही तृष्णा के जाल को तोड़कर निकल पाता है । जो पण्डित स्वरूप का विचार कर वितृष्ण नहीं होता और अतीत होकर वितृष्ण नहीं होता तो वे पण्डित और अतीत, दोनों मूर्ख हैं । ज्यों-ज्यों तृष्णा को घटावेगा, त्यों-त्यों जाग्रतरूप बोध उदय होगा । जैसे ज्यों-ज्यों रात्रि क्षीण होती है, त्यों-त्यों दिन का प्रकाश होता है और ज्यों-ज्यों रात्रि की वृद्धि होती है, त्यों-त्यों दिन क्षीण होता है, वैसे ही ज्यों-ज्यों तृष्णा बढ़ती जायगी, त्यों-त्यों बोध की प्राप्ति कठिन होगी और ज्यों-ज्यों तृष्णा घटती जायगी, त्यों-त्यों बोध की प्राप्ति सुगम होगी । हे मुनीश्वर ! अब मैं उस पद को प्राप्त हुआ हूँ, जो अच्युत, निराकार और द्वैत था । एक की कल्पना से रहित है । उस पद को मैंने आत्मरूप जाना है और अब मैं निशङ्क हुआ हूँ । जिस पद के पाने से कोई इच्छा नहीं रहती, वही परमानन्दरूप आत्मपद है ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे रामविश्रान्तिवर्णनं- नाम द्विशताधिकपञ्चचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ २४५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! बड़ा कल्याण हुआ, जो तुम आत्मज्ञान पाकर जागे हो । ऐसे परम पावन वचन तुमने कहे हैं, जिनको सुनने में पाप का नाश होता है । ये वचन अज्ञानरूपी अन्धकार के नाशक सूर्य हैं और तन-मन के ताप का नाश करनेवाली चन्द्रमा की किरणें हैं । हे राम ! जो पुरुष अपने स्वभाव में स्थित है, उनकी व्यवहार और समाधि में एक ही दशा होती है । वे अनेक प्रकार की चेष्टा करते भी देख पड़ते हैं, परन्तु उनके निश्चय में कर्तृत्व का अभिमान नहीं जगता । वे सदा परमध्यान में स्थित हैं । जैसे पत्थर की शिला में स्पन्दन नहीं