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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1692, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1692

❇ निर्वाण प्रकरण ❇

८८९

अनन्त जगत् फुरते हैं, परन्तु सब परस्पर एकरूप हैं। यदि नाना प्रकार का जगत् देख पड़ा तो उसमें वही रूप हुआ, और कोई कारण तो नहीं है? जैसे शून्य के आदि में निराकार सत्ता होती है और उर्मी में सूर्यादिक पदार्थ प्रकट होते हैं, सो वे भी वही रूप प्रकट भासित भी होते हैं, परन्तु निराकार होते हैं, वैसे ही यह जगत् भी अकारण निराकार है। हे मुनीश्वर ! अब मैंने ज्यों का त्यों जाना है। जैसे स्वप्न में मरे हुए बोलते हैं, जीते हुए मृतक देख पड़ते हैं, और सब पदार्थ विपरीत भासित होते हैं, परन्तु जब जाग उठे तब सब ज्यों के त्यों दिखते हैं, वैसे ही मैं जाग उठा हूँ, अब मुझको विपर्यय नहीं भासित होता—यथाभूतार्थ मुझको अब सब आत्मा ही भासित होता है। हे मुनीश्वर ! जो ज्ञानवान् पुरुष हैं, वे परमसमाधि में स्थित हैं। उनको उत्थान कदापि नहीं होता, अर्थात् स्वरूप से भिन्न नहीं भासित होता। वे व्यवहार करते दिखते हैं, परन्तु व्यवहार से रहित हैं, क्योंकि उनको कुछ अभिलाषा नहीं रहती। वे बिना अभिलाषा चेष्टा करते हैं, पर उनको हृदय से कुछ कर्तृत्व का अभिमान नहीं फुरता। इसी का नाम परम समाधि है। जब बोध की प्राप्ति होती है, तब कोई तृष्णा नहीं रहती, और सब पदार्थ नीरस हो जाते हैं, क्योंकि आत्मपद परमानन्दरूप और तृष्णा से रहित है। उर्मी का नाम मोक्ष और निर्वाण है, जिसमें उत्थान कोई नहीं।

हे मुनीश्वर ! आत्मानन्द ऐसा पद है, जिसके आनन्द की ओर ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि सभी ज्ञानवानों की वृत्ति सदा दौड़ती है, संसार के पदार्थों की ओर नहीं दौड़ती। जिस पुरुष को शान्त-शीतल स्थान प्राप्त हुआ है, वह फिर ज्येष्ठ-आषाढ़ की धूप नहीं चाहता कि मरुस्थल में दौड़े। वैसे ही ज्ञानवान् की वृत्ति अन्य किसी आनन्द की ओर नहीं जाती। हे मुनीश्वर ! मैंने निश्चय किया है कि तृष्णा का-सा ताप कोई नहीं, और अतृष्णा की-सी शान्ति कोई नहीं है। यदि कोई पुरुष परमेश्वर्य को प्राप्त हुआ हो, पर उसके हृदय में तृष्णा जलती हो तो वह कृपण, दरिद्री और आपदा का घर है। और जो निर्धन दिखता हो, परन्तु उसके हृदय में तृष्णा न हो तो वह परमेश्वर्य

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