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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ <span style="float:right">८७७</span>

वहाँ तो शुद्ध चिन्मात्र सत्ता रहती है, जिसमें वाणी की गति नहीं तो उसमें सूक्ष्म अणु कैसे हों और कारण-कार्यभाव कैसे हो ?

राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! जो शुद्ध चिन्मात्रसत्ता ही रहती है तो उसमें जगत् कैसे निकल आता है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! विश्व यदि उपजा हो तो मैं तुमसे कहूँ कि इस प्रकार जगत् की उत्पत्ति होती है। पर जब जगत् उपजा ही नहीं तो इसकी उत्पत्ति कैसे कहूँ ? जब चिन्मात्र में चेतना जगती है, तब अहं त्वं आदिक जगत् भासित होता है। अतः स्फुरण ही रूप है। कुछ उपजा नहीं—वही रूप है। हे राम ! ज्ञान का दृश्य-भ्रम से मिलाप ही बन्धन का कारण है। उसका अभाव मोक्ष है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! ज्ञान के होने पर जगत् का अभाव कैसे होता है ? यह तो दृढ़ हो रहा है, इसकी शान्ति कैसे होती है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! सम्यक्ज्ञान से जो बोध होता है, उस बोध से दृश्य का सम्बन्ध निवृत्त होता है। वह बोध निराकार और शांति रूप है, उसी से जीव मोक्ष में प्रवृत्त होता है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! बोध तो केवल रूप है। सम्यक्ज्ञान किसको कहते हैं, जिससे यह जीव बन्धन से मुक्त होता है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिस ज्ञान से ज्ञेय दृश्य का संयोग नहीं होता, उसको ज्ञानी अविनाशी रूप कहते हैं। जब ज्ञेय का अभाव होता है, तब सम्यक्ज्ञान कहाता है। जगत् ज्ञेय अविचारसिद्ध है। रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! ज्ञान से ज्ञेय भिन्न है अथवा अभिन्न, और ज्ञान क्योंकर उत्पन्न होता है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! बोधमात्र का नाम ज्ञान है। ज्ञान और ज्ञेय उससे भिन्न नहीं है। जैसे वायु से वायु का चलना भिन्न नहीं है। राम ने पूछा कि हे भूत, भविष्यत् और वर्तमान के जाननेवाले ! जो खरगोश के सींग की नाईं ज्ञेय असत्य है तो भिन्न होकर क्यों भासित होता है ?

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! बाह्य जगत् ज्ञेय भ्रान्ति से दिखता है। उसका सद्भाव नहीं है। भीतर जगत् है, न बाहर जगत् है। यह अर्थ से रहित भासित होता है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! अहं त्वं आदि तो प्रत्यक्ष दिखते हैं और इनका अर्थ सहित अनुभव होता है। तुम

८७८ * योगवाशिष्ठ *

कैसे इनका अभाव कहते हो ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह सब जगत् विराट् पुरुष का शरीर है । जब वह आदि-विराट् ही उपजा नहीं, तो और की उत्पत्ति कैसे कहिये ? राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! जगत् का सद्भाव तो तीनों कालों में पाया जाता है, पर तुम कहते हो कि उपजा ही नहीं । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसे स्वप्न में जगत् के सब पदार्थ प्रत्यक्ष दीखते हैं, पर कुछ उपजे नहीं । जैसे मृगतृष्णा का जल आकाश में द्वितीय चन्द्रमा और संकल्पनगर भ्रम से दिखता है, वैसे ही अहं त्वं आदि जगत् भ्रम से दिखता है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! अहं त्वं आदि जगत् दृढ़ भासित होता है, तब कैसे जानिये कि उपजा नहीं ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो पदार्थ कारण से उपजता है, निश्चय सत्य जाना जाता है । जब महाप्रलय होता है, तब कारणकार्य कुछ नहीं रहता, सब शान्तरूप होता है, और फिर उस महाप्रलय से जगत् प्रकट होता है । इसी से जाना जाता है कि सब आभासमात्र है । राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! जब महाप्रलय होता है, तब अज और अविनाशी सत्ता शेष रहती है । इससे जाना जाता है कि वही जगत् का कारण है । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसा कारण होता है, वैसा ही उसका कार्य होता है, उससे उल्टा नहीं होता । जो आत्मसत्ता अद्वैत और आकाशरूप है तो जगत् भी वही रूप है । जैसे घट से पट नहीं उपजता, वैसे ही और कुछ नहीं उपजता ।

राम ने पूछा, हे भगवन् ! जब महाप्रलय होता है, तब जगत् सूक्ष्मरूप होकर स्थित होता है, और उर्मी से फिर प्रवृत्ति होती है । वशिष्ठजी बोले, हे निष्पाप राम ! महाप्रलय में जो तुमने सृष्टि का अनुभव किया, वह कैसी होती है ? राम बोले, हे भगवन् ! ज्ञप्तिरूप सत्ता ही वहाँ स्थित होती है और तुम जैसों ने अनुभव भी किया है कि वह चिदाकाशरूप है । सत्य और असत्य शब्द से नहीं कहा जाता । वशिष्ठजी बोले, हे महाबाहो ! जो ऐसा हुआ तो भी जगत् तो ज्ञप्तिरूप हुआ--इसलिए वह जन्म-मरण से रहित शुद्ध ज्ञानरूप है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! तुम कहते हो कि जगत् उत्पन्न नहीं हुआ, भ्रममात्र है, तो

ॐ निर्वाण प्रकरण ॐ ८७९

वह भ्रम कहाँ से आया ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह जगत चित्त के फुरने से भासित होता है। जैसे-जैसे चित्त फुरता है, वैसे ही वैसे यह भी भासित होता है। इसका और कोई कारण नहीं है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो यह चित्त के फुरने से दिखता है, तो यह परस्पर विरुद्ध कैसे दिखता है कि अग्नि को जल नष्ट करता है और जल को अग्नि नष्ट करती है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो द्रष्टा पुरुष है, वह दृश्य-भाव को नहीं प्राप्त होता। और ऐसी कुछ वस्तु नहीं, भावरूप आत्मा ही चैतन्यघन सर्वरूप होकर भासित होता है।

राम ने पूछा, हे भगवन् ! चिन्मात्रतत्त्व आदि-अन्त से रहित है। और जब वह जगत को चिन्ताता है, तब होता है, पर तो भी तो वह कुछ हुआ। जगतरूप चैत्य को असंभव कैसे कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इसका कारण कोई नहीं, इससे चैत्य असंभव है। चैतन्य सदा मुक्त और अवाच्यपद है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो इस प्रकार है तो जगत और तत्त्व कैसे प्रकट होते हैं, और अहं त्वं आदिक द्वैत कहाँ से आये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! कारण के अभाव से यह जगत कुछ आदि से उपजा नहीं, सब शान्तरूप है। और नाना जो भासित होता है, सो भ्रममात्र है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! सर्वदा प्रकाशरूप निर्मलतत्त्व निरुल्लेख और अचररूप है। उसमें भ्रान्ति कैसे है और किसको है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! निश्चय करके जानो कि कारण के अभाव से भ्रान्ति कुछ वस्तु नहीं। अहं त्वं आदिक सब एक अनामय सत्ता स्थित है। राम ने पूछा, हे ब्राह्मण ! मुझे भ्रम हो रहा है, इसमें इस विषय में और अधिक प्रश्न करना नहीं जानता और अत्यन्त प्रबुद्ध भी नहीं, तो अब क्या पूछूँ ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह प्रश्न करो कि कारण बिना जगत कैसे उत्पन्न हुआ ? जब विचार करके कारण का अभाव जानोगे, तब परम स्वभाव अशब्द पद में विश्रान्ति पाओगे।

राम ने पूछा, हे भगवन् ! मैं यह जानता हूँ कि कारण के अभाव से जगत कुछ उपजा नहीं, परन्तु चैत्य का फुरना भ्रम कैसे हुआ ?

८८० ✲ योगवासिष्ठ ✲

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! कारण के अभाव से सर्वत्र शान्तिरूप है । तब भी कुछ दूसरी वस्तु नहीं । जबतक आत्मपद में अभ्यास नहीं होता, तब तक भ्रम भासित होता है और शान्ति नहीं होती । पर जब अभ्यास करके केवल तत्त्व में विश्रान्ति पाओगे, तब भ्रम मिट जायगा । राम ने पूछा, हे भगवन् ! अभ्यास और अनभ्यास कैसे होता है, और एक अद्वैत में अभ्यास अनभ्यास की भ्रान्ति कैसे होती है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! अनन्ततत्त्व में शान्ति भी कुछ वस्तु नहीं और जो आभास शान्ति दिखती है, वह महाचिद्घन अविनाशरूप है । राम ने पूछा, हे ब्राह्मण ! उपदेश और उपदेश के अधिकारी, ये जो भिन्न-भिन्न शब्द हैं, वे सर्वात्मा में कैसे भासित होते हैं । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! उपदेश और उपदेश के योग्य, ये शब्द भी ब्रह्म में कल्पित हैं । शुद्ध बोध में बन्धन और मोक्ष दोनों का अभाव है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो आदि में कुछ उत्पन्न नहीं हुआ तो देश, काल, क्रिया और द्रव्य के भेद कैसे दिखते हैं ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! देश, काल, क्रिया और द्रव्य के जो भेद हैं, सो संवेदन दृश्य में हैं, और अज्ञानमात्र भासित होते हैं—अज्ञानमात्र से कुछ भिन्न नहीं । राम ने पूछा, हे भगवन् ! बोध को दृश्य की प्राप्ति कैसे हुई ? जहाँ द्वैत और एकता का अभाव है, वहाँ दृश्य भ्रम कैसे है ?

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! बोध को दृश्य की प्राप्ति और द्वैत-एक का भ्रम मूर्खों का विषय है; हम जैसों का विषय नहीं है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! अनन्ततत्त्व तो केवल बोधरूप है, तब अहं त्वं हमारे मन में कैसे होता है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! शुद्ध बोधसत्ता में जो बोध का जानना है, वह अहं त्वं द्वारा कहाता है । जैसे पवन में स्फुरण है वैसे ही उसमें चेतना जगती है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! जैसे निर्मल अचल समुद्र में तरङ्ग और बुलबुले उठते हैं, सो वे कुछ जल से भिन्न नहीं होते, वैसे ही बोध में बोधसत्ता में भिन्न कुछ नहीं । वह अपने आपमें स्थित है । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो यह बात है तो किसका किसको दुःख हो ? एक अनन्ततत्त्व अपने आपमें स्थित और पूर्ण है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो वह एक और निर्मल है तो अहं त्वं

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ८८१

आदिक कलना कहाँ से आई और दृढ़ हुई, जिससे जीव उसे भोक्ता की नाईं भोगता है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! ज्ञेय जो चित्सत्ता है उसको जानना बन्धन नहीं है, क्योंकि ज्ञान ही सब अर्थरूप होकर स्थित हुआ है। तब बन्धन और मोक्ष कैसे हो?

राम ने पूछा, हे भगवन्! इष्टि बाह्य अर्थ को देखती है—जैसे आकाश में नीलता और स्वप्न में पदार्थ असत्यरूप होकर भी सत्य प्रतीत होते हैं, वैसे ही यह बाह्य अर्थ भी असत्य ही सत्य से लगते हैं। वशिष्ठजी बोले, हे राम! कारण से रहित जो बाह्य अर्थ भासित होते हैं सो भ्रम-मात्र हैं—भिन्न कुछ नहीं। राम ने पूछा, हे भगवन्! जैसे स्वप्नकाल में स्वप्न के पदार्थों के दुःख-सुख होते हैं—चाहे वे सत्य हों अथवा असत्य—वैसे ही इस जगत् में सुख-दुःख होता है, परन्तु इसकी निवृत्त का उपाय कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम! जो जगत् स्वप्न की नाईं है तो यह सब पिण्डाकार भ्रममात्र से दिखता है। सब अर्थ शान्तरूप है, नानात्व कुछ नहीं। राम ने पूछा, हे भगवन्! स्वप्न और जाग्रत् में पिण्डाकार और पर-अपररूप कैसे उत्पन्न और कैसे शान्त होते हैं? वशिष्ठजी बोले, हे राम! पहले अपर का विचार कीजिये—जगत् आदि में क्या रूप था और अन्त में क्या रूप होता है। जब ऐसा विचार होगा, तब शान्ति हो जायगी। जैसे स्वप्न में स्थूल पदार्थ पिण्डरूप दिखते हैं, वे सब आकाशरूप हैं, वैसे ही जाग्रत्पदार्थ भी आकाशरूप हैं। राम ने पूछा, हे भगवन्! जब भिन्नभाव की भावना प्राप्त होती है, तब जीव जगत् को कैसे देखता है और संस्कार भ्रम कैसे शान्त होता है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! जो निर्वामनिक पुरुष है, उसके हृदय से जगत् का सद्भाव उठ जाता है जैसे संकल्प नगर और कागज की मूर्ति असत् दिखती है, वैसे ही उसको जगत् असत् भासित होता है। राम ने पूछा, हे भगवन्! जब वासना से रहित पिण्डभाव शान्त होने पर जीव जगत् को स्वप्नवत् जानता है, तब उसके उपरान्त क्या अवस्था होती है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! जीव जब जगत् को संकल्परूप जानता है तब वासना निर्वाण हो जाती है

८८२ ❈ योगवाशिष्ठ ❈

और पञ्चतत्त्वों का क्रम उपजना और विनष्ट होना लीन हो जाता है । तब केवल परमतत्त्व दिखता है और सब आकाशरूप हो जाता है ।

राम ने पूछा, हे भगवन् ! अनेक जन्मों की वासना दृढ़ हो रही है और अनेक शाखाओं से फैली है, इसलिए संसार का कारण घोर वासना ही है । वह कैसे शान्त होती है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब यथा—यथार्थज्ञान होता है, तब आत्मा में भ्रान्तिरूप स्थित हुआ जगत् शान्त होता है । जब पिण्डाकार पदार्थों का अभाव हो जाता है, तब कर्मरूप दृश्यचक्र भी शान्त हो जाता है । जैसे स्वप्न के पदार्थ जाग्रत् में नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही आत्मतत्त्व के बोध से सब वासनाएँ नष्ट हो जाती हैं । राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! जब पिण्डग्रहण और कर्मरूप दृश्यचक्र निवृत्त हुआ, तब फिर क्या प्राप्त होता है ? वशिष्ठजी बोले हे राम ! जब पिण्डग्रहण भ्रम शान्त हो जाता है, तब जीव निर्मल होकर क्षोभ से रहित होता है, जगत् की आस्था शान्त हो जाती है और चित्त परमात्मतत्त्व को प्राप्त होता है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! यह बालक के संकल्पवत् कैसे स्थित है ? जो संकल्परूप है तो इसके जो पदार्थ हैं, उनके नष्ट होने पर इसको दुःख क्यों प्राप्त होता है और इस जगत् की आस्था कैसे शान्त होती है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो पदार्थ संकल्प से उत्पन्न हुआ है, उसके नष्ट करने में दुःख नहीं होता । और जो पूर्वापर विचार करके इसे चित्त से रचा जानिये तो भ्रम शान्त हो जाता है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! चित्त कैसा है और उससे संसार को कैसे रचा जानिये ?

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! चित्तसत्ता जो चैत्योन्मुख जगती है उसी को संकल्परूप चित्त कहते हैं । उससे रहित सत् के विचारने से वासना शान्त हो जाती है । राम बोले, हे ब्रह्मन् ! चैत्य से रहित चित्त कैसे होता है और चित्त से उदय हुआ जगत् निर्वाण कैसे होता है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! चित्त कुछ उत्पन्न नहीं हुआ, अनहोता ही द्वैत भासित होता है—कुछ है नहीं । रामजी बोले, हे भगवन् ! जगत् तो प्रत्यक्ष दिखता है । जो उपजा ही नहीं तो इसका अनुभव कैसे होता है ? वशिष्ठजी

✹ निर्वाण प्रकरण ✹

बोले, हे राम ! अज्ञानी को जो जगत् दिखता है, वह सत्य नहीं है और ज्ञानवान् को जो दिखता है, वह अनिर्वचनीयसत्ता अद्वैतरूप है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! अज्ञानी को तीनों जगत् कैसे दिखते हैं और ज्ञानवान् को कैसे दिखते हैं, जो कहे नहीं जा सकते ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! अज्ञानी को द्वैत सघन दृढ़ भासित होता है, और ज्ञानवान् को सघन द्वैत नहीं भासित होता, क्योंकि आदि में तो उपजा नहीं, अद्वैत आत्मतत्त्व अवाच्यपद है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो आदि में उपजा नहीं तो अनुभव भी न हो, पर यह तो प्रत्यक्ष अनुभव होता है, इसे असत्य कैसे कहिये ?

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! असत्य ही सत्य की नाईं होकर भासित होता है-इसी से कारण-रहित भासित होता है । जैसे स्वप्न में पदार्थ का अनुभव होता है, परन्तु वास्तव में कुछ नहीं, वैसे ही यह असत्य ही अनुभव होता है। रामजी बोले, हे भगवन् ! स्वप्न में संकल्प से जो दृश्य का अनुभव होता है, वह जाग्रत् के संस्कारों से होता है, और कुछ नहीं है। वशिष्ठजी ने पूछा, हे राम ! स्वप्न और संकल्प संस्कार से होता है, सो वह जाग्रत् के संस्कार से कैसे होता है ? वही रूप है अथवा जाग्रत् से अन्य है ? राम बोले, हे भगवन् ! स्वप्न के पदार्थ और मनोराज्य जाग्रत् के संस्काररूप भ्रम से जाग्रत् की नाईं भासित होते हैं। वशिष्ठजी ने कहा, हे राम ! जो स्वप्न में जाग्रत् संस्कार से जगत् जाग्रत् की नाईं भासित होता है, जैसे स्वप्न में किसी का घर लुट गया अथवा जल के प्रवाह में बह गया-तो जाग्रत् में तो कुछ हुआ नहीं, क्योंकि प्रातःकाल उठकर देखता है, तब ज्यों का त्यों दिखता है-ऐसे ही संसार भी कुछ न हुआ। सब कल्पनामात्र जानना। राम बोले, हे भगवन् ! अब मैंने जाना कि यह सब ब्रह्म ही है, न कोई देह है, न जगत् है, न उदय है और न अस्त है। सर्वदा सब प्रकार वही ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। उससे भिन्न जो कुछ भासित होता है, सो भ्रममात्र है। और भ्रम भी कुछ वस्तु नहीं, सब चिदाकाश ब्रह्मरूप है। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो कुछ दिखता है, सब ब्रह्म ही का प्रकाश है। वही अपने

८८४ ❇ योगवाशिष्ट ❇

आपमें प्रकाशित होता है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! सर्ग के आदि में देह-चित्त आदिक कैसे फुर आये हैं और आत्मा का प्रकाशरूप जगत् कैसे हैं ? प्रकाश भी उसका होता है, जो साकार होता है, परब्रह्म तो निराकार है, उसका प्रकाश कैसे कहिये ?

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! सब ब्रह्मरूप है। प्रकाश और प्रकाशक का भेद भी कुछ नहीं, और दूसरी वस्तु भी कुछ नहीं, वही अपने आपमें स्थित है-इसी से उसको स्वप्रकाश कहा है। सूर्य आदि का प्रकाश त्रिपुटी से भासित होता है सो वह भी उसके आश्रित होकर प्रकाश पाता है, और उसके प्रकाश का आधारभूत कहाता है, जिसके आश्रय से सूर्य जगत् को प्रकाशित करता है। आत्मसत्ता अद्वैत और विज्ञानघन है। उसमें जो चित्तसंवेदन जगा है, वही जगतरूप होकर स्थित हुआ है। आत्मसत्ता और जगत् में कुछ भेद नहीं है। जैसे आकाश और शून्यता में कुछ भेद नहीं है, वैसे ही आत्मा और जगत् में भेद नहीं है-वही इस प्रकार हुए की नाईं स्थित हुआ है। हे राम ! निराकार ही स्वप्नवत् साकाररूप होकर भासित होता है। इस जगत् के आदि में अद्वैत चिन्मात्रसत्ता थी। उर्मी में जो नाना प्रकार का जगत् देख पड़ा, वह वही रूप हुआ। और कारण तो कोई नहीं है। जैसे स्वप्न के आदि में अद्वैतसत्ता निराकार है, और उससे जो सूर्यादिक पदार्थ प्रकट होते हैं, वे भी वही रूप हुए, पर प्रकट दिखते भी हैं, वैसे ही इस जगत् को भी अकारण और निराकार जानो। हे राम ! न कोई जाग्रत् है, न स्वप्न है और न सुषुप्ति है, सब आभासमात्र है-वही आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। मुझको तो वही सदा विज्ञानघन आत्मसत्ता भासित होती है। जैसे दर्पण में अपना मुख दिखता है, वैसे ही मुझको अपना रूप भासित होता है, पर अज्ञानी को भ्रान्तिरूप जगत् दिखता है। जैसे वृक्ष के ठूठ में दूर से भ्रान्ति वश पुरुष दिखता है, वैसे ही अज्ञानी को जगत् दिखता है।

हे राम ! न कोई द्रष्टा है और न कोई दृश्य है। द्रष्टा तो तब कहिये जो दृश्य हो, और दृश्य तब कहिये जो द्रष्टा हो। जो दृश्य नहीं तो

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ८८५

द्रष्टा किसका, और जो द्रष्टा ही नहीं तो दृश्य किसका ? इसलिए यह समझो कि निर्विकार ब्रह्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है । यद्यपि आकार भी दिखते हैं, तो भी वह निराकार है—आत्मसत्ता ही संवेदन से आकाररूप होकर भासित होती है । जैसे खम्भे में चितेरा पुतलियों की कल्पना करता है कि इतनी पुतलियाँ खम्भे में निकलेंगी तो उसको वे खोदे बिना ही प्रत्यक्ष दिखती हैं, वैसे ही खोदे बिना ही ब्रह्मरूपी खम्भे में मनरूपी चितेरा ये पुतलियाँ देखता है । अतएव हुआ कुछ नहीं । हे राम ! इन मेरे वचनों को तुम स्वप्न और संकल्प दृष्टान्त से देखो कि अनुभवरूप ही आकार होकर भासित होता है—अनुभव से भिन्न कुछ नहीं । इस मेरे वचनरूपी उपदेश को हृदय में धारण करो और अज्ञानियों के वचनों को त्याग दो ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विद्यावादबोधोपदेशो नाम द्विशताधिकद्विसप्ततितमसर्गः ॥ २७२ ॥

राम बोले, हे भगवन् ! बड़ा आश्चर्य है कि मैं अज्ञान से जगत् को देखता था । जगत् तो कुछ वस्तु नहीं, सब ब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है । यह जगत् भ्रम से भासित होता है । अब मैंने जाना कि यह जगत् वास्तव में न पहले था और न आगे होगा । सब शान्त निरालम्ब विज्ञानघनसत्ता है । और भ्रान्ति भी कुछ वस्तु नहीं, निर्विकार शान्तरूप ब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है जैसे स्वर्ग, परलोक, स्वप्न और संकल्पपुर के आदि में अद्वैतचिन्मात्रसत्ता होती है और उसका आभास संवेदन स्पन्दन फुरता है तो अनेक पदार्थों सहित जगत् भासित हो आता है, सो वह अनुभवरूप है, उसमे भिन्न कुछ सत् नहीं, वैसे ही यह जगत् अनुभवरूप है । हे प्रभो ! अब मैंने तुम्हारी कृपा से ऐसे निश्चय किया है कि जगत् अविचार सिद्ध है । विचार करने से निवृत्त हो जाता । जैसे खरगोश के सींग और आकाश के फूल असत् होते हैं, वैसे ही जगत् असत् है । बड़ा आश्चर्य है कि असतरूप अविद्या ने जगत् को मोहित किया था । अब मैंने जाना कि अविद्या कुछ वस्तु

८८६ योगवाशिष्ठ

नहीं. अपनी, कल्पना ही अपने को बन्धन करती है । जैसे अपनी परछाहीं में बालक भूत की कल्पना करता है और आप ही डरता है, वैसे ही अपनी कल्पना ही अविद्यारूप भासित होती है। पर जब तक विचार नहीं होता तभी तक भासित होती है, विचार करने से उसका अत्यन्त अभाव हो जाता है। जैसे रस्सी में सर्प दिखता है और रस्सी के ज्ञान से सर्प का अत्यन्त अभाव हो जाता है। जैसे किसी स्थान में भ्रम से मनुष्य भासित होता है, वैसे ही आत्मा में भ्रम से अविद्यारूप जगत् भासित होता है । जैसे आकाश के फूल और खरगोश के सींग कुछ वस्तु नहीं, वैसे ही अविद्या भी कुछ वस्तु नहीं। जैसे स्वप्न में बन्ध्या का पुत्र दिखे तो भी भ्रममात्र है। और स्वप्न में अपने मरने का अनुभव हो, वह भी भ्रम है, वैसे ही अविद्यारूप जगत् दिखता है तो भी असत्य है, प्रमाणरूप नहीं । प्रमाण उसे कहते हैं, जो यथार्थ ज्ञान का साधक हो, पर यह जो प्रत्यक्ष प्रमाण यथार्थ नहीं, क्योंकि वस्तुरूप आत्मा है, वह ज्यों का त्यों नहीं दिखता। सीपी में रूपे के समान उलटा भासित होता है। यह प्रत्यक्ष अनुभव भी होता है, तो भी असतरूप है—इसे प्रमाणरूप क्योंकर जानें।

हे भगवन्! यह जगत् और कुछ वस्तु नहीं, केवल कल्पनामात्र है । जैसे-जैसे आत्मा में संकल्प दृढ़ होता है, वैसे ही वैसे जगत् भासित होता है । जैसे जो पुरुष स्वर्ग में बैठा हो, उसके हृदय में यदि कोई चिन्ता उपजे, तो उसको स्वर्ग भी नरकरूप हो जाता है, क्योंकि भावना नरक की हो जाती है । हे भगवन् ! यह जगत् केवल वासनामात्र है । आत्मा में जगत् कुछ आरम्भ-परिणाम से नहीं बना, यह जगत् केवल चित्त में है । जैसे पत्थर की शिला में शिल्पी पुतलियों की कल्पना करता है, सो जैसी कल्पना है वैसी ही भासित होती है-शिला से भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही आत्मा में चित्त ने जगत् के पदार्थ रचे हैं। जैसी-जैसी भावना करता है, वैसी ही वैसी यह देखता है। आत्मा में जगत् न हुआ है और न आगे होगा । ब्रह्मसत्ता केवल अपने आपमें स्थित है । वह स्वच्छ, अद्वैत, परम मौनरूप तथा द्वैत और एक की कल्पना से

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ८८७

रहित है और मुनीश्वरों से सेवनीय है। ऐसा पद मैंने पाया है, अब मैं अपने आपमें स्थित और सब दुःखों से रहित हूँ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे रामविश्रान्तिवर्णनं नाम द्विशताधिकत्रिसप्ततितमसर्गः ॥ २७३ ॥

राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! आदि, अन्त और मध्य से रहित जो पद है और जिसको जानना मुनियों के लिए कठिन है, वह पद मैंने पाया है। एक और द्वैत की कल्पना जो शास्त्रों और वेदों में कही है, वह मेरी मिट गई है। अब मैं परमशान्त होकर निःशङ्क हुआ हूँ। मुझको कोई दुःख नहीं रहा। सब जगत् मुझे आत्मरूप ही दिखता है। हे भगवन् ! अब मैंने जाना कि न कोई अविद्या है, न विद्या है, न सुख है और न दुःख है। मैं सर्वदा अपने आत्मपद में स्थित हूँ। मैंने पाने योग्य पद पाया है, जो पहले भी प्राप्त था। जो कहते हैं कि हम उस पद को नहीं जानते, उनको भी वह प्राप्त है, परन्तु वे अज्ञान से नहीं जानते। वह पद और किसी उपाय से नहीं जाना जा सकता, अपने आप जाना जाता है। यह भी नहीं है कि किसी साधन से जनाइये और जानने योग्य और हो। वह तो आप ही बोधरूप है। न कोई भ्रान्ति है, न जगत् है। सब आत्मा ही है। हे मुनीश्वर ! अज्ञान और ज्ञान भी ऐसे हैं, जैसे स्वप्न की सृष्टि हो। जैसे उसमें अन्धकार दिखता है, उसका तब नाश होता है, जब सूर्य उदय हो। जब स्वप्न से जाग उठे, तब न अन्धकार रहता है और न प्रकाश ही रहता है। वैसे ही आत्मपद में जागने से ज्ञान और अज्ञान, दोनों का अभाव हो जाता है और द्वितीय की कल्पना मिट जाती है। जब संवेदन फुरता है, तब जगत् भासित होता है, परन्तु जगत् आत्मा से भिन्न नहीं है। जैसे आकाश और शून्यता में कुछ भेद नहीं, वैसे ही आत्मा और जगत् में भेद नहीं है। जैसे शिला का भीतर जड़ीभूत होता है, वैसे ही आत्मा का रूप जगत् है। जैसे जल और तरंग में भेद नहीं, वैसे ही आत्मा और जगत् अभिन्न रूप है।

हे मुनीश्वर ! जिस पुरुष को इस प्रकार आत्मा में अहंप्रतीति हुई

८८८ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

है, वह कार्यकर्ता दिखता है, तो भी निश्चय ही कुछ नहीं करता, और अशान्तरूप दिखता है, तो भी सदा शान्तरूप है । हे मुनीश्वर ! अज्ञान मध्याह्न का सूर्य है और जगत् की सत्यता दिन है । जगत् के भाव-अभाव पदार्थ उसका प्रकाश है और तृष्णा मरुस्थल है, जिसमें अज्ञानी जीव पथिक हैं । उनको यह दिन और मार्ग निवृत्त नहीं होता । जो ज्ञानवान् स्वभाव में स्थित हैं, उनको न संसार का सत्यतारूपी दिन भासित होता है और न तृष्णारूपी मरुस्थल दिखता है । वे संसार की ओर से सो रहे हैं । ऐसी अद्वैतसत्ता उनको भास हुई है, जहाँ सत्य और असत्य, दोनों नहीं हैं, इस कारण उन्हें जगत् की कल्पना नहीं भासित होती । हे मुनीश्वर ! अब मैं जागा हूँ और सब जगत् मुझको अपना ही दिखता है । मैं निर्वाणरूप, निराकार, निरिच्छ और स्वभावसत्तारूप हूँ ? अब मुझको कोई दुःख नहीं है । हे मुनीश्वर ! उस पद को मैंने पाया है, जिसके पाने से तृष्णा कभी नहीं उपजती । जैसे पाषाण की शिला में प्राण नहीं उगते, वैसे ही मुझमें तृष्णा नहीं जगती । मुझको सब आत्मरूप ही भासित होता है । यह जो जीव है, उसमें जीवत्व कुछ नहीं है । जीवत्व भ्रान्ति सिद्ध है । सब आत्मस्वरूप है । मुझको तो निरालम्ब सत्ता अपनी ही भासित होती है ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे रामविश्रांतिवर्णनं नाम द्विशताधिकचतुःसप्ततिमस्सर्गः ॥ २०४ ॥

राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! आत्मा में अनन्तसृष्टि उपजती हैं । जैसे मेघ की बूँदों को गिनती नहीं होती, वैसे ही परमात्मा में सृष्टियों की गिनती नहीं हो सकती । जैसे एक रत्न की असंख्य किरणें होती हैं वैसे ही परमात्मा में असंख्य सृष्टियाँ हैं; कई परस्पर मिलती और कई नहीं मिलती हैं; परन्तु स्वरूप से सब एकरूप हैं । जैसे समुद्र में लहरें उठती हैं तो उनमें कई नूतन भिन्न-भिन्न और ही प्रकार की उठती हैं, कई परस्पर सदृश ज्ञात होती हैं और कई नहीं होतीं, और जैसे एक ही ज्वाला के बहुत दीपक होते हैं, उनमें कोई अन्योन्य परस्पर मिलते हैं और नहीं भी मिलते; पर स्वरूप से सब एकरूप हैं, वैसे ही आत्मा में

❇ निर्वाण प्रकरण ❇

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अनन्त जगत् फुरते हैं, परन्तु सब परस्पर एकरूप हैं। यदि नाना प्रकार का जगत् देख पड़ा तो उसमें वही रूप हुआ, और कोई कारण तो नहीं है? जैसे शून्य के आदि में निराकार सत्ता होती है और उर्मी में सूर्यादिक पदार्थ प्रकट होते हैं, सो वे भी वही रूप प्रकट भासित भी होते हैं, परन्तु निराकार होते हैं, वैसे ही यह जगत् भी अकारण निराकार है। हे मुनीश्वर ! अब मैंने ज्यों का त्यों जाना है। जैसे स्वप्न में मरे हुए बोलते हैं, जीते हुए मृतक देख पड़ते हैं, और सब पदार्थ विपरीत भासित होते हैं, परन्तु जब जाग उठे तब सब ज्यों के त्यों दिखते हैं, वैसे ही मैं जाग उठा हूँ, अब मुझको विपर्यय नहीं भासित होता—यथाभूतार्थ मुझको अब सब आत्मा ही भासित होता है। हे मुनीश्वर ! जो ज्ञानवान् पुरुष हैं, वे परमसमाधि में स्थित हैं। उनको उत्थान कदापि नहीं होता, अर्थात् स्वरूप से भिन्न नहीं भासित होता। वे व्यवहार करते दिखते हैं, परन्तु व्यवहार से रहित हैं, क्योंकि उनको कुछ अभिलाषा नहीं रहती। वे बिना अभिलाषा चेष्टा करते हैं, पर उनको हृदय से कुछ कर्तृत्व का अभिमान नहीं फुरता। इसी का नाम परम समाधि है। जब बोध की प्राप्ति होती है, तब कोई तृष्णा नहीं रहती, और सब पदार्थ नीरस हो जाते हैं, क्योंकि आत्मपद परमानन्दरूप और तृष्णा से रहित है। उर्मी का नाम मोक्ष और निर्वाण है, जिसमें उत्थान कोई नहीं।

हे मुनीश्वर ! आत्मानन्द ऐसा पद है, जिसके आनन्द की ओर ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि सभी ज्ञानवानों की वृत्ति सदा दौड़ती है, संसार के पदार्थों की ओर नहीं दौड़ती। जिस पुरुष को शान्त-शीतल स्थान प्राप्त हुआ है, वह फिर ज्येष्ठ-आषाढ़ की धूप नहीं चाहता कि मरुस्थल में दौड़े। वैसे ही ज्ञानवान् की वृत्ति अन्य किसी आनन्द की ओर नहीं जाती। हे मुनीश्वर ! मैंने निश्चय किया है कि तृष्णा का-सा ताप कोई नहीं, और अतृष्णा की-सी शान्ति कोई नहीं है। यदि कोई पुरुष परमेश्वर्य को प्राप्त हुआ हो, पर उसके हृदय में तृष्णा जलती हो तो वह कृपण, दरिद्री और आपदा का घर है। और जो निर्धन दिखता हो, परन्तु उसके हृदय में तृष्णा न हो तो वह परमेश्वर्य

८६० योगवाशिष्ट

से सम्पन्न और परम सम्पदा की खान है । बड़ा पण्डित हो परन्तु तृष्णा सहित हो, उसे परम मूर्ख जानिये । उसको बोध की प्राप्ति कदापि न होगी । जैसे चित्र की अग्नि शीत को नहीं दूर करती, वैसे ही उसकी मूर्खता को पण्डित भी नष्ट नहीं कर सकता । हे मुनीश्वर ! सहस्रों में कोई विरला पुरुष तृष्णा से रहित होता है । जैसे पिंजड़े में पड़ा सिंह पिंजड़े को तोड़कर निकले, वैसे कोई विरला ही तृष्णा के जाल को तोड़कर निकल पाता है । जो पण्डित स्वरूप का विचार कर वितृष्ण नहीं होता और अतीत होकर वितृष्ण नहीं होता तो वे पण्डित और अतीत, दोनों मूर्ख हैं । ज्यों-ज्यों तृष्णा को घटावेगा, त्यों-त्यों जाग्रतरूप बोध उदय होगा । जैसे ज्यों-ज्यों रात्रि क्षीण होती है, त्यों-त्यों दिन का प्रकाश होता है और ज्यों-ज्यों रात्रि की वृद्धि होती है, त्यों-त्यों दिन क्षीण होता है, वैसे ही ज्यों-ज्यों तृष्णा बढ़ती जायगी, त्यों-त्यों बोध की प्राप्ति कठिन होगी और ज्यों-ज्यों तृष्णा घटती जायगी, त्यों-त्यों बोध की प्राप्ति सुगम होगी । हे मुनीश्वर ! अब मैं उस पद को प्राप्त हुआ हूँ, जो अच्युत, निराकार और द्वैत था । एक की कल्पना से रहित है । उस पद को मैंने आत्मरूप जाना है और अब मैं निशङ्क हुआ हूँ । जिस पद के पाने से कोई इच्छा नहीं रहती, वही परमानन्दरूप आत्मपद है ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे रामविश्रान्तिवर्णनं- नाम द्विशताधिकपञ्चचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ २४५ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! बड़ा कल्याण हुआ, जो तुम आत्मज्ञान पाकर जागे हो । ऐसे परम पावन वचन तुमने कहे हैं, जिनको सुनने में पाप का नाश होता है । ये वचन अज्ञानरूपी अन्धकार के नाशक सूर्य हैं और तन-मन के ताप का नाश करनेवाली चन्द्रमा की किरणें हैं । हे राम ! जो पुरुष अपने स्वभाव में स्थित है, उनकी व्यवहार और समाधि में एक ही दशा होती है । वे अनेक प्रकार की चेष्टा करते भी देख पड़ते हैं, परन्तु उनके निश्चय में कर्तृत्व का अभिमान नहीं जगता । वे सदा परमध्यान में स्थित हैं । जैसे पत्थर की शिला में स्पन्दन नहीं

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ८६१

जगता, वैसे ही उनको कुछ कर्तृत्व बुद्धि नहीं उपजती, क्योंकि उनके हृदय में देहाभिमान नहीं रहा है और वे चिन्मात्र स्वरूप में स्थित हुए हैं। वह आत्मपद परम शान्तरूप और द्वैत-कलना से रहित, एक है। ऐसा जो पद है, उसे ज्ञानवान् आत्मज्ञान से जानता है। इसी को निर्वाण और इसी को मोक्ष कहते हैं। हे राम! ऐसा जो पद है, उसमें मैं सदा स्थित हूँ। ब्रह्मा, विष्णु आदि जो ज्ञानवान् हैं, वे भी उसी पद में स्थित हैं। वे नाना प्रकार की चेष्टा करते भी दिखते हैं, परन्तु सदा शान्तरूप हैं। उनको क्रिया और समाधि में एक ही आत्मपद का निश्चय रहता है। जैसे वायु स्पन्दन और निस्पन्द में एक ही है और जल और तरङ्ग ठहरने में एक ही है, वैसे ही ज्ञानी दोनों में सम है। जैसे आकाश और शून्यता में भेद नहीं वैसे ही आत्मा और जगत् में भेद नहीं है।

राम ने पूछा, हे भगवन्! तुम्हारी कृपा से मुझको कोई कलना नहीं फुरती। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र से लेकर तृण तक जो कुछ जगत् है, वह सब मुझको आकाशरूप भासित होता है। सर्वदा सब प्रकार में अपने आपमें स्थित, अच्युत और अद्वैतरूप हूँ। मुझमें जगत् की कलना कोई नहीं। चित्तसंवेदन द्वारा मैं ही जगतरूप भासित होता हूँ, पर स्वरूप से कभी चलायमान नहीं होता। मैं अचेत्य चिन्मात्र-स्वरूप हूँ। अपने से भिन्न मुझको कुछ नहीं भासित होता। वशिष्ठजी बोले, हे राम! मैं जानता हूँ कि तुम जागे हो, परन्तु अपने दृढ़बोध के लिए मुझसे फिर प्रश्न करो कि "यह जगत् है नहीं तो दिखता क्या है?" राम बोले, हे भगवन्! मैं तुमसे तो तब पूछूँ जो मुझको जगत् का आकार दिखता हो। मुझको तो जगत् कुछ दिखता ही नहीं। जैसे संकल्प का अभाव होने पर संकल्प की चेष्टा भी नहीं भासित होती; जैसे बाजीगर की माया का अभाव होने पर बाजी नहीं रहती; अथवा स्वप्न के अभाव होने पर स्वप्न की सृष्टि नहीं दिखती और भविष्यत्कथा के पुरुष नहीं भासित होते; वैसे ही मुझको जगत् नहीं दिखता; तब फिर मैं किसका संशय उठाऊँ? आदि में जो संवेदन फुरा है, वह विराट् पुरुष होकर स्थित हुआ है, और उसी ने आगे देश, काल, पदार्थ,

८६२ ☸ योगवासिष्ठ ☸

स्थावर-जङ्गम जगत् को रचा है—उसी के समष्टि शरीर का नाम विराट् है। जैसे स्वप्न का पर्वत हो, वैसे ही यह विराट् पुरुष आकाशरूप है। जब वह आप ही आकाशरूप है, तब उसका रचा जगत् मैं क्यों पूछूँ? जैसे स्वप्न की मृत्तिका आकाशरूप है, अर्थात् जो उपजी ही अनउपजी है, तो उसके पात्रों को मैं क्यों पूछूँ? इसलिए न कोई विराट् है और न उसका जगत् है, मिथ्या ही विराट् है और मिथ्या ही उसकी चेष्टा है। केवल आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। न कोई जगत् है और न कोई उसका विराट् है। जैसे स्वप्न का पर्वत आभासमात्र होता है, वैसे ही यह जगत् आकार दिखता है।

जैसे बीज से वृक्ष होता है, वैसे ही ब्रह्म से जगत् प्रकट हुआ है। बल्कि, यह भी कैसे कहिये? बीज तो साकार होता है और उसमें वृक्ष का सद्भाव रहता है, जो परिणाम से वृक्ष होता है, पर आत्मा ऐसे कैसे हो? वह तो निराकार है और उसमें जगत् नहीं है, क्योंकि वह निर्विकार, अद्वैत और निर्वेद है। उसको जगत् का कारण कैसे कहिये? न कोई जाग्रत है, न स्वप्न है और न सुषुप्ति है। ये अवस्थाएँ भी आकाशमात्र हैं। आत्मा परिणाम भाव को नहीं प्राप्त होता। वह तो सदा अपने आपमें स्थित है। हे मुनीश्वर! मैं, तुम, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, सब आकाशरूप हैं और अब मुझको सब आत्मा ही भासित होता है। हे मुनीश्वर! एक सविकल्पज्ञान है और दूसरा निर्विकल्पज्ञान। सो वह आकाश सदृश अचेत्य चिन्मात्र है। जो दृश्य के सम्बन्ध से रहित है, उसे आकाश-मा निर्मल जानो। वही निर्विकल्पज्ञान है। जिनको यह ज्ञान प्राप्त हुआ है, वे महापुरुष हैं, उनको मेरा नमस्कार है। और जिनको दृश्य का संयोग है, वे सविकल्प ज्ञानी हैं। वे संसारी हैं और उनकी विषमता सहित जगत् भिन्न-भिन्न दिखता है। परन्तु तो भी भिन्न कुछ नहीं है। जैसे समुद्र में नाना प्रकार के तरंग उठते हैं, वे सभी जल-स्वरूप होते हैं, वैसे ही भिन्न-भिन्न जीव और उनका ज्ञान है। तो भी मुझको अपना ही रूप भासित होता है।

जैसे अवयवी को सब अङ्ग अपने ही लगते हैं, वैसे ही सब जगत्

⚛ निर्वाण प्रकरण ⚛ ८६३

मुझको अपना ही केवल अद्वैतरूप भासित होता है, और जगत् की कोई कलना नहीं फुरती। जैसे स्वप्न से जागे को स्वप्न की सृष्टि नहीं फुरती, कल्पना से रहित आप ही अद्वैत भासित होता है, वैसे ही मुझको जगत् कल्पना से रहित अपना ही आप भासित होता है। हे मुनीश्वर ! निगम आदि जो शास्त्र में उनका उल्लंघन कर मैंने ये वचन कहे हैं, परन्तु जो मेरे हृदय में है वही कहा है। जो कुछ हृदय में होता है, वही बाहर वाणी से कहा जाता है। जैसे जो बीज बोया है, उसी का अंकुर निकलता है, बीज के बिना अंकुर नहीं निकलता, वैसे ही जो कुछ मेरे हृदय में है, वही वाणी से कहता हूँ। यह विद्या सब प्रमाणों से सिद्ध है। हे मुनीश्वर ! जिसको यह दशा प्राप्त है, वही इसे जानता है और कोई नहीं जान सकता। जैसे जिसने मद्यपान किया है, वही उन्मत्तता को जानता है, और कोई नहीं जान सकता, वैसे ही जो ज्ञानवान् है, वही आत्मरस को जानता है, और कोई नहीं जानता। उस आत्मरस के पाने से फिर कोई कल्पना नहीं रहती। हे मुनीश्वर ! मैं आत्मा, अजन्मा, अविनाशी और परमशान्तरूप हूँ। उभय-एक की कल्पना से रहित, अ-चेत, चिन्मात्र हूँ। जगद्रूप हुए की तरह भी मैं भासित होता हूँ, पर निराभास हूँ। मुझमें आभास की कोई वस्तु नहीं; क्योंकि निराकार हूँ। इस प्रकार मैंने अपने को यथार्थ चिन्मात्र जाना है।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे रामविश्रान्तिवर्णनं नाम द्विशताधिकषट्सप्ततितमसर्गः ॥ २७६ ॥

वाल्मीकिजी बोले, हे भरद्वाज ! इस प्रकार कहकर रामचन्द्र एक मुहूर्तभर चुप हो गये, अर्थात् उन्होंने परमात्मपद में विश्रान्ति पाई, उनकी इन्द्रियों की और मन की वृत्ति का आत्मपद में उपशम हुआ। उसके उपरान्त जान बूझकर कमलनयन राम ने लीला के लिए यों प्रश्न किया—हे संशयरूपी मेघ के नाशक शरत्काल ! मुझको एक हलका सा संशय हुआ है, उसे दूर करो । हे मुनीश्वर ! आत्मपद अव्यक्त और अचिन्त्य है, अर्थात् इन्द्रियों का और मन का विषय नहीं है। वह मन के चिन्तन में भी नहीं आता। जो बड़े महापुरुष हैं, वे

८६४ ❁ योगवाशिष्ठ ❁

भी उसे वाणी से कह नहीं सकते। तो ऐसा अ-चेत चिन्मात्र आत्मतत्त्व शास्त्र से कैसे जाना जा सकता है? शास्त्र तो अविच्छेद प्रतियोगी करके कहते हैं, सो वह सविकल्प है। पर सविकल्प से निर्विकल्प पद कैसे जाना जाता है? उसे फिर गुरु और शास्त्र से कैसे जानिये? विकल्परूप शास्त्र हैं। उनमें भी चार अर्थ मिलता है। परन्तु विकल्प परिच्छेद प्रतियोगी जो उसके साथ हैं, उनसे सर्वात्मा क्योंकर जानिये? वशिष्ठजी बोले, हे राम! वह न गुरु और शास्त्र से जाना जाता है और न गुरु और शास्त्र के बिना भी जाना जाता है। हे राम! नाना प्रकार के जो विकल्परूप शास्त्र हैं, उनसे निर्विकल्परूप कैसे जानता है, सो यह भी सुनो। हे राम! व्यवधान देश के किटक-जाति के कुछ लोग थे, जो गृहस्थी में रहते थे। निदान एक समय उन पर आपदा पड़ी और वे चिन्ता से दुर्बल होने लगे। उन्हें भोजन भी न जुरता। जैसे वसन्त-ऋतु की मञ्जरी ज्येष्ठ-आषाढ़ की धूप से सूख जाती है, जैसे जल से निकला कमल सूख जाता है, वैसे ही किटक सम्पदारूपी जल से निकलकर आपदारूपी धूप में सूख गये। तब उन्होंने विचार किया कि किसी प्रकार हमारा पेट भरे, इसलिए हम वन में जाकर लकड़ी चुनें, जिससे हमारा कष्ट दूर हो।

हे राम! यों विचार कर वे वन में गये और लकड़ियाँ ले आये। इसी प्रकार वे लकड़ियाँ ले आते और बाजार में बेचकर पेट भरते थे। जब कुछ काल व्यतीत हुआ, तब उनमें से किसी एक ने चन्दन की लकड़ी पहचानी और उससे विशेष द्रव्य पाया। इसी प्रकार एक को ढूँढ़ते-ढूँढ़ते रत्न प्राप्त हुए। इस प्रकार उनको विशेष ऐश्वर्य प्राप्त हुआ, इसलिए उन्होंने लकड़ी बेचना छोड़ दिया। वे फिर यह सोचकर और स्थान ढूँढ़ने लगे कि इस से भी विशेष कुछ फायदा मिले। वन की पृथ्वी को खोदते-खोदते उनको चिन्तामणि मिली, इसलिए वे बड़े ऐश्वर्य-शाली हो गये। जैसे ब्रह्मा, इन्द्रादिक हैं, वैसे ही हो गये। हे राम! जिन्होंने उद्यम करके वन का सेवन किया था, उनको बड़ा सुख प्राप्त हुआ। लकड़ियाँ उठाते-उठाते उनका उदर पूर्ण हुआ और दुःख निवृत्त

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ८६५

हुआ। जिनको चन्दन की लकड़ी प्राप्त हुई, उनका उदर पूर्ण होने से और भी सन्ताप मिटे। और जिनको चिन्तामणि प्राप्त हुई, उनके सब सन्ताप मिट गये और वे परमैश्वर्यमान् हुए। परन्तु सबको वन से प्राप्त हुआ और जो वन के निकट उद्यम करने न गये, घर ही बैठे रहे, उन्होंने दुःखित होकर प्राणों को त्याग दिया, परन्तु सुख न पाया।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे चिन्तामणिप्राप्तिर्नाम द्विशताधिकसप्तसप्ततितमस्सर्गः ॥ २२७ ॥

राम ने पूछा, हे भगवन् ! यह जो तुमने किटक का वृत्तान्त कहा उसका तात्पर्य मैंने कुछ न जाना। वे किटक कौन-कौन थे; वह वन क्या था और आपदा क्या थी, सो कृपा करके प्रकट कहो। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ये सब जीव जो तुम देखते हो, वे किटक हैं। उन पर अज्ञानरूपी आपदा पड़ी है। आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक तापों की चिन्ता से वे जलते हैं। आध्यात्मिक काम-क्रोधादिक मानस दुःख हैं। वात, पित्त, कफ आदिक आधिभौतिक देह के दुःख हैं। और आधिदैविक वे दुःख हैं, जो ग्रहों से अनिच्छित प्राप्त हैं। हे राम ! उनमें प्रयत्न करके जो जीव शास्त्ररूपी वन में गये वे सुखी हुए और जो अर्थी सुख के निमित्त शास्त्ररूपी वन को सेवते हैं, उनको सत्य कर्मरूपी लकड़ियाँ प्राप्त होती हैं, जिनसे नरकरूपी उदरपूर्ति का जो दुःख था, वह निवृत्त होता है और वे स्वर्गरूपी सुख पाते हैं। फिर शास्त्ररूपी वन का सेवन करते-करते उपासनारूपी चन्दनवृक्ष प्राप्त होता है, उससे और दुःख भी निवृत्त होते हैं और वे विशेष सुख पाते हैं। जब जीव अपने इष्टदेव की सेवा करता है, तब स्वर्गादिक विशेष सुख पाता है और अपने स्थान को प्राप्त होता है। फिर जब शास्त्ररूपी वन को ढूँढ़ता है, तब विचाररूपी रत्नविशेष पाता है। जब सत्य-असत्य का विचार प्राप्त होता है, तब सब दुःख नष्ट हो जाते हैं। यह जो सुख प्राप्त होता है, वह शास्त्र से ही होता है। जैसे चन्दन और लकड़ियाँ आदि पदार्थ वन में प्रकट थे और चिन्तामणि गुप्त थी, वैसे ही और शास्त्रों में धर्म, अर्थ और काम प्रकट है, पर ज्ञानरूपी चिन्तामणि गुप्त है। जब

८६६ ❊ योगवासिष्ठ ❊

जीव दूसरे शास्त्ररूपी वन को वैराग्य और अभ्यासरूपी यत्न से खोजे, तब आत्मज्ञानरूपी चिन्तामणि पाता है ।

हे राम ! वन में ही उसने चिन्तामणि पाई थी, क्योंकि वहाँ चिन्तामणि का वन था । परन्तु जब अभ्यास किया था, तब पाई थी और उसी वन में पाई थी । वैसे ही गुरु और शास्त्र का भी जब मिट्टी के खोदने के समान अभ्यास करता है, तब आप चिन्तामणि ही सदृश आत्मप्रकाश होता है । जैसे मिट्टी के खोदने से चिन्तामणि का प्रकाश नहीं उपजता, क्योंकि चिन्तामणि तो पहले ही प्रकाशरूप थी, खोदने से केवल आवरण दूर हुआ, तब आप ही निकल आई, वैसे ही गुरु और शास्त्रों के वचन के अभ्यास से अन्तःकरण जब शुद्ध होता है, तब आत्मसत्ता स्वतः प्रकट होती है । गुरु और शास्त्र हृदय की मलीनता दूर करते हैं, और जब मलिनता दूर होती है, तब आत्मसत्ता स्वाभाविक प्रकाशित होती है । इससे गुरु और शास्त्रों से मलीनता दूर होती है परन्तु इनकी कल्पना भी द्वैत में होती है । वह कल्पना द्वैत संसार का नाश करनेवाली है । परमार्थ की अपेक्षा शास्त्र और गुरु भी द्वैत कल्पना है, और अज्ञानी की अपेक्षा गुरु और शास्त्र कृतार्थ करते हैं और इनके अभ्यास से जीव आत्मपद पाता है । प्रथम अज्ञानी शास्त्र का भोग के निमित्त सेवन करते हैं और शास्त्र में भोग का अर्थ जानते हैं, जैसे लकड़ियों के लिए वे किटक वन का सेवन करते थे । शास्त्र में सब कुछ है । जैसा जिसको रुचि के अनुसार अभ्यास होता है वैसे ही पदार्थ उसको उससे प्राप्त होते हैं । शास्त्र एक ही है, परन्तु पदार्थों में भेद है । जैसे पौंड़े के रस से गुड़, शकर और मिसरी बनती है, वैसे ही शास्त्र एक है, उसमें पदार्थ भिन्न-भिन्न हैं । जिस-जिस अर्थ के पाने के लिए कोई यत्न करेगा, उसी को पावेगा । शास्त्र में भोग भी हैं और मोक्ष भी है । अज्ञानी भोग के निमित्त यत्न करते हैं, परन्तु वे भी धन्य हैं, क्योंकि शास्त्र का तो सेवन करने लगे । उन्हें कभी किसी काल में आत्मपदरूपी चिन्तामणि भी प्राप्त होगी । परन्तु आत्मपद पाने के लिए ही शास्त्र श्रवण करना चाहिए । सुन-सुनकर अभ्यास द्वारा आत्मपद