योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1658, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ८५५
शीतलता है, वैसे ही आत्मा में जगत् है । चाहे कोई जगत् कहो अथवा ब्रह्म कहो, ब्रह्म और जगत् में भेद नहीं है । जैसे वृक्ष और तरु एक ही वस्तु के नाम हैं, वैसे ही ब्रह्म और जगत् एक ही वस्तु के दो नाम हैं । इन्द्रियों और मन से अतीत आत्मा को ही जगत् जानो । और जो इन तीनों का विषय है, वह भी आत्मा को जानो । दूसरी वस्तु कुछ नहीं है । नानारूप जो दिखता है, वह नानात्व नहीं हुआ दूसरा नहीं दिखता । जैसे स्वप्न में बड़े आरम्भ दिखते हैं । और सेना तथा नाना प्रकार के पदार्थ दिखते हैं, परन्तु कुछ हुए नहीं वैसे ही यह जगत् नाना प्रकार दिखता है, परन्तु कुछ हुआ नहीं सब चिदाकाशरूप है । जैसे एक निद्रा की दो वृत्तियाँ हैं-एक स्वप्न और दूसरी सुषुप्ति-स्वप्न में नानात्व भासित होता है और सुषुप्ति में एक सत्ता होती है, वैसे ही चित्तसंवित् के फुरने में नानात्व दिखता है और न फुरने में एक है ।
हे साधो ! वह तो सब काल में एकरूप है, परन्तु प्रमाद से भेद दिखता है । जैसे स्वप्न की सृष्टि अपना ही अनुभवरूप है, परन्तु प्रमाद से भिन्न-भिन्न दिखती है, वैसे ही यह जगत् है । हमको तो सर्वदा वही भासित होता है । जैसे पत्ते, फूल, फल, और टहनी एक ही वृक्ष के नाम हैं-जो वृक्ष का ज्ञाता है, उसको सब वृक्षरूप ही दिखते हैं-वैसे ही सब नामरूपों से हमको आत्मा ही दिखता है-आत्मा से भिन्न कुछ नहीं भासित होता । आदि स्फुरण में जैसा निश्चय हुआ है, वह और निश्चय पर्यन्त वैसा ही रहता है । यह सब विश्व संकल्परूप है और संकल्प का अधिष्ठान ब्रह्म है-ब्रह्म ही संकल्परूप होकर भासित होता है । संकल्प से जगत् दिखता है, सो सब ब्रह्मरूप है । ब्रह्म और जगत् में भेद नहीं-एक ही वस्तु के दो नाम हैं । जैसे वृक्ष और तरु दोनों एक वस्तु के दो नाम हैं, वैसे ही ब्रह्म और जगत् दोनों एक चैतन्य के नाम हैं । हे साधो ! जो वाणी से अकथ है उसको ब्रह्म जानो और जो शब्द व वाणी में आता है, उसको भी तुम ब्रह्म जानो-ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं । जो ज्ञानवान् है, उसको सब ब्रह्म ही दिखता है, पर अज्ञानी को नानात्व भासित होता है । जब अध्यात्म का अभ्यास करोगे, तब सब