सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1654, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1654

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ८५१

है। वही सत्ता वररूप होती है और वही सत्ता शापरूप होती है। जिस संकल्प की दृढ़ता होती है, उसी का अनुभव होता है। हे स्वामी! यह तुमसे सुना हुआ हम कहते हैं कि जीव को कोई बाहर का कर्म फलदायक नहीं होता, जो कुछ भीतर सार होता है, वही फल होता है। इनके भीतर तो वर का संकल्प दृढ़ है, और हमारा नहीं है। अब आप को हमारा नमस्कार है—अब हम जाते हैं।

हे कुन्ददन्त! इस प्रकार शाप आधिभौतिक शरीर त्यागकर अन्त-वाहक शरीर से अन्तर्धान हो जावेंगे। जैसे आकाश में भ्रम से तरुवर दिखें और सम्यक्ज्ञान से अन्तर्धान हो जावें, वैसे ही शाप अन्तर्धान हो जावेंगे। तब ब्रह्माजी कहेंगे, हे वर! तुम शीघ्र उनके पास जाओ। तब वह वर और दूसरा वर, जो उनकी स्त्रियों ने पाया था कि उनकी पुर्यष्टका अन्तःपुर में रहे, फिर पूछेंगे कि हे भगवन्! हमको क्या आज्ञा है? हमको तो उनको उसी मन्दिर में रखना है, उनको सप्तद्वीप पृथ्वी का राज्य भी भोगना है और दिग्विजय करना है। यह कैसे होगा? तब ब्रह्माजी कहेंगे, हे साधु! यह क्या है? जो उन्हें सप्तद्वीप की पृथ्वी का राज्य करना है तो उनका तुम्हारे साथ कुछ विरोध नहीं। तुमको उसी मन्दिर में उनकी पुर्यष्टका रखनी है और वहीं राज्य भोग कराना है, इसलिए जो कुछ तुम्हारा स्वभाव है, वही करना। कुन्ददन्त ने पूछा, हे भगवन्! इससे तो हमको यह बड़ा संशय उत्पन्न हुआ कि उसी मन्दिर में आठों भाई सप्तद्वीप पृथ्वी का राज्य कैसे करेंगे? इतनी पृथ्वी उस मन्दिर में क्योंकर समायगी, यही आश्चर्य है? जैसे कोई कहे कि कमल के फूल की कली में हाथी शयन करे, या उसमें हाथियों की पंक्ति है तो यह आश्चर्य होगा, वैसे ही यह भी आश्चर्य की बात है। ब्राह्मण बोले, हे साधु! आकाश ब्रह्मरूपी है। उसके अणु का जो सूक्ष्म अणु है, उसमें जो स्वप्न जगा है, वह हमारा जगत् है। यदि स्वप्न में यह सृष्टि समा रही है, तो उस मन्दिर में उसका समाना क्या आश्चर्य है?

हे साधु! यह सब जगत् स्वप्नमात्र है, और अहंत्व आदिक सब जगत्