योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1620, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें✺ निर्वाण प्रकरण ✺ =१७
जिसका प्रथम अनुभव होता है। सो अनुभव भी जगत् में होता है। पर जहाँ जगत् ही न उपजा हो तो अनुभव और स्मृति उसको कैसे हो?
इसलिए न अनुभव है और न स्मृति है। इस कल्पना को त्याग दो। जहाँ पृथ्वी होती है, वहाँ धूल भी होती है। पर जहाँ पृथ्वी से रहित आकाश ही हो, वहाँ धूल कैसे उड़े? इसी प्रकार जहाँ पदार्थ होते हैं, वहाँ स्मृति और अनुभव भी होता है, और जहाँ पदार्थ ही नहीं तो स्मृति और अनुभव कैसे हो? इससे दोनों का अभाव है। राम ने पूछा, हे ज्ञानवानों में श्रेष्ठ? स्मृति का अनुभव तो प्रत्यक्ष होता है। प्रथम पदार्थ का अनुभव होता है, पीछे उसकी स्मृति होती है और उस स्मृतिसंस्कार से फिर अनुभव होता है। तब ऐसे ही ब्रह्मादिक का क्यों नहीं होता? ये तो प्रत्यक्ष भासित होते हैं? तुम कैसे इनका अभाव कहते हो? और अभाव में विशेषता क्या है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! स्मृति से अनुभव वहाँ होता है, जहाँ कार्य-कारण भाव होता है। ब्रह्मा से लेकर काष्ठपर्यन्त सब जगत् जो तुमको दिखता है, वह सब आकाशरूप है। कुछ बना नहीं और अविद्यमान ही भ्रम से विद्यमान प्रतीत होता है। जैसे सूर्य की किरणों में जल का आभास अविद्यमान है, पर भ्रम से जल दिखता है, वैसे ही यह जगत् भ्रम से भासित होता है। स्मृति उसकी होती है, जिस पदार्थ का प्रथम अनुभव होता है। जो कहिये कि ब्रह्मादिक स्मृति संस्कार से उपजी है तो यह ठीक नहीं, क्योंकि प्रथम तो ज्ञानवान् स्मृति से नहीं होती, तब उनका स्मृति कारण कैसे कहिये? और दूसरे यह कि इस जगत् के आदि में कोई जगत् न था, जिसकी स्मृति मानिये। इस जगत् के आदि में केवल अद्वितीय आत्मसत्ता थी। उसमें स्मृति क्या और अनुभव क्या? इसलिए ब्रह्मादिक और जगत् किसी कारण-कार्यभाव से नहीं उपजे। अकारण हैं।
हे राम! प्रथम तो तुम यह देखो कि ज्ञानी को जगत् नहीं भासित होता, तब स्मृति किसको कहिये? उसको तो केवल ब्रह्मसत्ता ही भासित होती है। जैसे सूर्य को रात्रि की स्मृति नहीं होती, वैसे ही ज्ञानी को जगत् की स्मृति नहीं होती। मेरे निश्चय में तो यह है कि